रिद्धि एक पुरानी दीवार के पीछे छूपी हुई थी। और वह अपने हाथों से अपने कानों को बंद किए हुए थी ।
तभी, उसे दूर कहीं उस 'कुत्ते-राक्षस' के भारी कदमों की आवाज़ सुनाई दी। वह राक्षस जानबूझकर धीरे-धीरे चल रहा था, जैसे वह इस खेल का मज़ा ले रहा हो। उसे पता था कि समीर का खेल खत्म हो चुका है, लेकिन शिकार को तड़पाने में जो आनंद था, वह उसे छोड़ना नहीं चाहता था।
दूसरी तरफ, विक्की गुफा के अंधेरे में खुद को कोस रहा था। लेकिन बाहर जंगल में ढूंढते-ढूंढते उस राक्षस की नज़र उस पत्थर पर पड़ गई जहाँ विक्की छिपा था। राक्षस ने विक्की को भी ढूंढ निकाला।
विक्की की आँखों में डर नहीं, बल्कि गुस्सा था। जैसे ही उनकी नज़रें मिलीं, विक्की बिजली की फुर्ती से वहाँ से भागा। उसकी आँखों में आँसू थे और दिल में बस समीर को बचाने की तड़प। वह चिल्लाते हुए समीर को खोजने के लिए जंगल की गहराइयों में दौड़ पड़ा।
विक्रम के हुक्म के मुताबिक जब कबीर, अंजलि, विक्की और रिद्धि वापस उसी पुरानी जगह पर पहुँचे, तो उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं। सामने ज़मीन पर समीर की बेजान लाश पड़ी थी। विक्की समीर की लाश देखकर वहीं घुटनों के बल बैठ गया,
तभी उस घने अंधेरे में से विक्रम की विशाल परछाईं आगे बढ़ी। उसने बिना समीर की लाश को उठाया और जाने के लिए मुड़ा। जाने से पहले, उसने अपनी भारी आवाज़ में बच्चों से कहा, "रोने-धोने का वक़्त नहीं है... थोड़ी देर में 'राउंड 2' शुरू होने वाला है। तब तक के लिए यह लो।",
विक्रम ने उनके आगे कुछ खाने-पीने का सामान फेंका और घने पेड़ों के पीछे गायब हो गया। लेकिन वहां पड़े खाने को किसी ने हाथ तक नहीं लगाया। अपने सामने अपने ही दोस्त को इस बेरहमी से मरते हुए देखकर भला किसके गले से खाना नीचे उतरता?
तभी विक्की का सब्र का बांध टूट गया। उसने गुस्से से रिद्धि की तरफ देखा और चिल्लाते हुए कहा, "यह सब तुम्हारी वजह से हुआ है रिद्धि! सिर्फ तुम्हारी वजह से!
अगर तुमने घूमने का यह बकवास प्लान नहीं बनाया होता... तो आज मेरा भाई समीर ज़िंदा होता!"
रिद्धि डर से पीछे हटी और रोते हुए बोली, "मुझे माफ़ कर दो विक्की... मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था... मुझे माफ़ कर दो!"
"बस करो विक्की!" अंजलि विक्की पर चिल्लाई, "इसमें अकेले रिद्धि की क्या गलती है? जब प्लान बना था, तो क्या तुमने और समीर ने हाँ नहीं कहा था? हम सब अपनी मर्ज़ी से आए थे!"
तुम चुप रहो अंजलि! तुम उसकी साइड मत लो!" विक्की गुस्से में पागल हो रहा था और दोनों आपस में बुरी तरह लड़ने लगे। जंगल का वो खौफनाक माहौल उनकी आपसी लड़ाई से और ज़्यादा डरावना हो गया था।
बंद करो यह बकवास!" कबीर ने बीच में आकर दोनों को झटके से अलग किया। कबीर की आवाज़ में गुस्सा और डर दोनों था। उसने हांफते हुए कहा, "अब इन सब बातों का कोई फ़ायदा नहीं है। लड़ने से समीर वापस नहीं आएगा। हमें इस लड़ाई को छोड़कर पहले यहाँ से बाहर निकलने का रास्ता खोजना होगा... वरना भगवान जाने, इस अगले राउंड में हम में से कौन मारा जाएगा!"
यह कहते-कहते कबीर अचानक रुका। उसने अपनी जेब में हाथ डाला और एक चमकीली चीज़ बाहर निकाली। उसकी आँखों में गहरी उलझन और खौफ था।
उसने हथेली खोलकर सबको दिखाते हुए कहा, यह देखो!
झाड़ियों के पास मुझे यह लॉकेट गिरा हुआ मिला।"
अंजलि, विक्की और रिद्धि ने आंसू पोंछते हुए कबीर की हथेली की तरफ देखा। वहाँ सोने का एक पुराना, अजीब नक्काशी वाला लॉकेट रखा था।
कबीर की आवाज़ थरथराई, "यह लॉकेट... यह मेरे पापा का है! बिल्कुल ऐसा ही एक लॉकेट मेरे दादाजी के पास था, और एक मेरे पास भी है। यह हमारे परिवार की निशानी है। लेकिन मेरे पापा का लॉकेट इस जंगल में, इस ज़मीन पर क्या कर रहा है? मुझे... मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा..."
कबीर की बात सुनकर विक्की की आँखें फटी की फटी रह गईं और अंजलि के मुंह से बस इतना निकला, "कयाअअ?!"
इंस्पेक्टर नैतिक अपने केबिन में बैठा हुआ था। टेबल की पीली रोशनी सीधे समीर की पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर पड़ रही थी। रिपोर्ट के पन्नों को पलटते हुए नैतिक ने कहा,
यह किसी आम इंसान का काम नहीं है..."
गले पर उंगलियों के जो निशान थे, वो असाधारण रूप से बहुत बड़े थे। किसी बहुत चौड़े और भारी हाथ ने समीर का गला दबाया था
कातिल कोई आम कद-काठी का इंसान नहीं, बल्कि कोई दैत्य जैसा भारी-भरकम शख्स था।
नैतिक ने तुरंत अपने जूनियर्स को आवाज़ दी और वो फाइल उनके हाथ में थमाते हुए कहा, "इस रिपोर्ट को ध्यान से देखो। हमें किसी ऐसे आदमी की तलाश करनी है जिसका हाथ और कद आम लोगों से बहुत बड़ा हो। शहर के और आस-पास के सभी थानों में रिकॉर्ड चेक करो तुम लोग लोग इस केस की बारीकी से जांच करो।"
जूनियर ने हैरान होकर पूछा, "सर, लेकिन आप खुद इस पर आगे काम क्यों नहीं कर रहे?"
नैतिक ने गंभीर होकर बोला, "क्योंकि समीर वाले केस से पहले मुझे जो केस मिला था, मैं उस पर ध्यान दूंगा। शहर के कुछ गरीब छोटे बच्चे पिछले कुछ दिनों से लगातार लापता हैं। वो मासूम हैं, उनके पीछे आवाज़ उठाने वाला कोई अमीर बाप नहीं है। मैं पहले उन गरीब बच्चों का केस सुलझाऊंगा।"
अभी नैतिक केबिन से बाहर निकलने ही वाला था कि पुलिस स्टेशन का दरवाज़ा झटके से खुला। कबीर के पापा रुद्र, अंजलि की मां वैदेही अंदर आए।
वैदेही रोते हुए हाथ जोड़कर बोली,"प्लीज,जल्दी कुछ करिए... वरना हमारे बच्चों का भी वही हाल होगा जो समीर का..." यह बोलते-बोलते वह फूट-फूटकर रोने लगीं।
नैतिक ने उन्हें सांत्वना देते हुए कुर्सी पर बैठाया और कहा, "आप लोग हिम्मत रखिए, हमारी पूरी टीम काम पर लगी है। हम जल्द ही उन्हें ढूंढ लेंगे। लेकिन मुझे आपसे कुछ ज़रूरी सवाल पूछने हैं।"
"क्या आप सबके बच्चे एक ही दिन से लापता हुए हैं? और क्या गायब होने से पहले उन्होंने आपसे कुछ कहा था? क्या कोई उन्हें परेशान कर रहा था या उनके बर्ताव में कोई बदलाव आया था?"
रुद्र ने आंसू पोंछते हुए सिर हिलाया और कहा, "नहीं इंस्पेक्टर, ऐसा कुछ भी अजीब नहीं था। सब कुछ बिल्कुल नॉर्मल था। उन सबने बस एक साथ मिलकर बाहर घूमने का प्लान बनाया था... और उसके बाद से वो वापस ही नहीं आए।"
कहानी अचानक 25 साल पीछे, अतीत में चली जाती है...,
19 साल का विक्रम एक गहरे तालाब के किनारे,खड़ा था और एकटक उस पानी को देख रहा था। ,उसके चेहरे पर एक गहरा, कभी न खत्म होने वाला दुख था।
वह धीरे-धीरे अपने आप से ही बिना कुछ जाने सोचने लगा, "मेरे पास इस दुनिया में जीने के लिए आखिर बचा ही क्या है? ना मेरे पास इतने पैसे हैं,और ऊपर से"मैं अपने नाना-नानी पर और बोझ नहीं बनना चाहता"मैं तो पढ़ाई-लिखाई में भी अच्छा नहीं हूँ। मेरी इस ज़रूरत से ज़्यादा बड़ी हाइट की बीमारी की वजह से कोई मुझसे बात तक नहीं करता, सब मेरा मज़ाक उड़ाते हैं... ऐसे में मैं किस वजह से जिऊँ भला?"
यह बोलते-बोलते विक्रम की आँखों से आँसू छलक पड़े और वह भारी कदमों से उस गहरे तालाब की तरफ बढ़ने लगा। वह खुद को खत्म करने ही वाला था।
तभी अचानक पीछे से उसके कुत्ते के भौंकने की आवाज़ गूंजी—"भौं... भौं...!"