एक अधूरी खता Payal patidar द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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एक अधूरी खता

मुंबई की भागती-दौड़ती ज़िंदगी के बीच, शहर के एक बेहद आलीशान और बड़े से बंगले के एक कमरे में गहरी खामोशी छाई हुई थी। कमरे की बड़ी सी कांच की खिड़की से बाहर का खूबसूरत नज़ारा दिख रहा था, लेकिन वहाँ बैठी लड़की का पूरा ध्यान सिर्फ और आठ उसके लैपटॉप की स्क्रीन पर था।
यह लड़की कोई और नहीं, अंशिका प्रताप थी। अंशिका बड़ी ही संजीदगी और कॉन्फिडेंस के साथ अपने लैपटॉप पर एक बेहद ज़रूरी प्रोजेक्ट पर काम कर रही थी। लैपटॉप की स्क्रीन पर एक वीडियो कॉल चल रही थी, जिसमें दूसरी तरफ कुछ लोग बैठे हुए थे। उनके बात करने का तरीका, उनका पहनावा और उनका अंदाज़ साफ बता रहा था कि वे सब विदेशी क्लाइंट्स थे। अंशिका पिछले काफी समय से उन्हें अपनी कंपनी का एक नया बिजनेस आइडिया समझा रही थी। जैसे-जैसे अंशिका अपनी बात रख रही थी, सामने बैठे विदेशी लोगों के चेहरों पर एक संतुष्टि और अचरज के भाव साफ देखे जा सकते थे। उन्हें अंशिका का काम करने का तरीका और उसका विज़न बेहद पसंद आ रहा था।
पूरी प्रेज़ेंटेशन ध्यान से देखने के बाद, मीटिंग में मौजूद एक विदेशी क्लाइंट ने मुस्कुराते हुए अपनी जगह से उठकर सीधे कैमरे की तरफ देखा। उसने बेहद प्रभावित होते हुए कहा, "Miss Anshika Pratap, we absolutely loved your idea. We are ready to work with you."
उसकी बात सुनकर अंशिका के चेहरे पर एक राहत भरी और प्यारी सी मुस्कान तैर गई। उसकी हफ्तों की मेहनत आज रंग लाई थी। इसके बाद उस क्लाइंट ने आगे की फॉर्मेलिटीज़ की बात करते हुए कहा, "From now on, we will work together on this project."
इस आखिरी लाइन के साथ ही दोनों तरफ से औपचारिकताएं पूरी हुईं, सबने एक-दूसरे को धन्यवाद दिया और वह ज़रूरी मीटिंग वहीं खत्म हो गई। जैसे ही वीडियो कॉल कट हुई, अंशिका ने एक लंबी और गहरी सांस ली। वह पिछले कई घंटों से लगातार बिना रुके काम कर रही थी। अपनी थकान मिटाने और खुद को थोड़ा रिलैक्स करने के लिए, उसने अपनी कुर्सी को पीछे की तरफ झुकाया। उसने अपने सिर को आराम से चेयर के ऊपरी हिस्से पर टिका दिया और अपनी दोनों आंखें धीरे से बंद कर लीं। बंद आंखों के पीछे जैसे ही वह खुद को शांत करने की कोशिश करने लगी, तभी कमरे की खामोशी को चीरती हुई उसके फोन की रिंगटोन बज उठी।
अंशिका ने बिना आंखें खोले ही टेबल पर हाथ मारकर अपना फोन ढूंढा और बिना स्क्रीन देखे ही कॉल रिसीव करके फोन कान से लगा लिया। जैसे ही उसने फोन उठाया, दूसरी तरफ से एक बेहद जानी-पहचानी, लेकिन जानबूझकर बनाई गई नाराजगी भरी आवाज़ गूंजी, "क्यों मैडम! जब से मुंबई गई हो, हमें तो पूरी तरह भूल ही गई हो ना? अब तुम्हारी लाइफ में हमारी क्या जगह!"
यह आवाज़ सुनते ही अंशिका के चेहरे की पूरी थकान जैसे एक पल में गायब हो गई। उसने तुरंत अपनी आंखें खोलीं और चेहरे पर एक बेहद प्यारी मुस्कान के साथ कहा, "भाई! आपको पता है ना, मैं आपको कभी भी नहीं भूल सकती। आपको क्या, मैं आप दोनों को कभी भी नहीं भूल सकती हूँ। और वैसे भी, आपके और दीदी के अलावा इस दुनिया में मेरा है ही कौन? सच बताऊं भाई, तो मैंने आप दोनों को बहुत ज़्यादा मिस किया है।"
अंशिका की इस प्यारी और भावुक बात का दूसरी तरफ बैठे उसके भाई पर कोई खास असर नहीं हुआ। उसने अपनी पुरानी मज़ाकिया टोन में लौटते हुए चिढ़ाने वाले अंदाज़ में कहा, "चल झूठी! अगर तुझे हमारी इतनी ही याद आ रही होती, तो तू खुद से हमें कम से कम एक फोन तो लगा ही देती। लेकिन नहीं, मैडम के पास तो बड़ी-बड़ी मीटिंग्स से फुर्सत मिले तब ना!"
अपने भाई की इस बात पर अंशिका ने प्यार से अपनी आँखें घुमाईं और हंसते हुए बोली, "अच्छा बाबा, मान लिया मेरी गलती है। अब प्लीज अपनी यह डांट बंद करो। अब भाई, यह सब पुरानी बातें छोड़ो और मुझे सच-सच बताओ कि आज अचानक आपने मुझे इस वक्त क्यों फोन लगाया है? कोई खास वजह?"
अंशिका की बात सुनते ही दूसरी तरफ उसका भाई जैसे हड़बड़ा गया। उसने अपने सिर पर हाथ मारते हुए कहा, "अरे हां यार! मैं तो बिल्कुल भूल ही गया था। मैं तुझसे जिस ज़रूरी बात को करने के लिए फोन मिलाया था, इन सब बातों के चक्कर में वो तो मेरे दिमाग से ही निकल गया।"
अंशिका ने उत्सुकता से पूछा, "क्या हुआ भाई? ऐसी कौन सी बात है?"
उसके भाई ने दूसरी तरफ से चहकते हुए और बेहद खुशी भरे लहजे में कहा, "अरे, अरमान की शादी फिक्स हो गई है! हाँ, अरमान की शादी है, इसलिए अब तू जल्दी से अपना सारा बोरिया-बिस्तर समेट और सीधे जयपुर आजा। याद रखना, तुझे हर हाल में जयपुर आना ही है!"
**

अपने भाई रुद्राक्ष के मुंह से अरमान की शादी की बात सुनते ही अंशिका के चेहरे की वो प्यारी सी मुस्कान जैसे एक झटके में गायब हो गई। उसके होंठ जैसे आपस में सिल गए और वह पूरी तरीके से खामोश हो गई। उसके गले में एक अजीब सा दर्द उमड़ आया, जिसकी वजह से वह कुछ भी नहीं बोल पा रही थी। कमरे में फिर से वही भारी सन्नाटा पसर गया था, जिसे अब सिर्फ अंशिका की रुंधी हुई सांसें ही तोड़ रही थीं।
फोन की दूसरी तरफ से रुद्राक्ष को जब कोई जवाब नहीं मिला, तो उसकी आवाज़ में भी एक अजीब सी गंभीरता और उदासी छा गई। उसने एक गहरी सांस ली और बेहद धीमे स्वर में कहा, "अंशिका... मैं जानता हूँ कि तू जयपुर छोड़कर इतनी दूर मुंबई क्यों गई थी। लेकिन आज मैं तुझसे कह रहा हूँ कि तू उसी की वजह से, और उसी की शादी में वापस जयपुर आएगी।"
रुद्राक्ष की यह बात सीधे अंशिका के दिल पर जाकर लगी। उसने अपनी कांपती हुई आवाज़ को समेटने की कोशिश की, लेकिन उसके आंसू अब उसकी पलकों को भिगोने लगे थे। उसने रोते हुए बेहद दबी आवाज़ में कहा, "नहीं भाई... मैं नहीं आऊंगी। मैं वहां वापस कभी नहीं आ सकती।"
अंशिका का यह साफ़ इनकार सुनकर रुद्राक्ष का दिल भी भर आया, लेकिन इस बार उसने खुद को सख्त किया। उसने थोड़े गुस्से और बेहद भावुक अंदाज़ में कहा, "क्यों नहीं आएगी अंशिका? सिर्फ उस एक इंसान की वजह से? उस एक इंसान ने जो किया, उसके लिए तूने खुद को सज़ा दे दी। पर तूने मेरे बारे में, अपने इस भाई के बारे में एक बार भी सोचा जो तुझसे इतना प्यार करता है? तू उस एक इंसान की नफ़रत और उसकी गलती की वजह से हम सबसे इतनी दूर चली गई। इतना ही नहीं अंशिका, तूने जाते-जाते मुझे अपनी कसम दे दी कि मैं कभी भी अरमान को सच न बताऊँ। तूने तो मुझसे यह तक छुपाने को कहा कि उस दिन असल में क्या हुआ था। तूने तो हमसे, और यहाँ तक कि प्रियांशी दीदी से भी झूठ बोलने को कह दिया!"
दरअसल, यह चार भाई-बहन थे। इनमें सबसे बड़ा भाई रुद्राक्ष था, जो हमेशा पूरे परिवार को संभालकर रखता था। उसके बाद दूसरे नंबर पर अरमान था, जिसकी शादी की बात चल रही थी। अरमान के बाद उनकी बड़ी बहन प्रियांशी थी, जो अंशिका से बहुत प्यार करती थी, और इन सबमें सबसे छोटी और सबकी लाडली अंशिका थी।
रुद्राक्ष ने अपनी बात जारी रखते हुए थोड़े भारी मन से कहा, "तेरी दी हुई उसी कसम की वजह से मैंने आज तक किसी को कुछ भी नहीं बताया है अंशिका। उस दिन तेरे साथ क्या हुआ था, वो भयानक सच सिर्फ और सिर्फ मुझे पता है। आज से ठीक 3 महीने पहले, तेरे साथ जो कुछ भी हुआ था, जो दर्दनाक हादसा हुआ था... सिर्फ उसी की वजह से तू इस जयपुर शहर को, अपने इस घर को छोड़कर इतनी दूर चली गई थी। लेकिन अब और नहीं!"
भाई की बातें सुनकर अंशिका की आँखों से आँसू लगातार बहने लगे। वह एक शब्द भी नहीं बोल पा रही थी। उसकी आँखों के सामने 3 महीने पहले का वो पूरा मंज़र घूमने लगा था। वह अच्छी तरह जान गई थी कि उसका भाई रुद्राक्ष इस वक्त कितना ज़्यादा इमोशनल हो रहा है और उसका दिल कितना दुख रहा है। अंशिका ने रोते हुए अपने भाई से गुज़ारिश की, "भाई... प्लीज, आप इस वक्त ये सब बातें मत करो। मुझसे ये सब और नहीं सुना जाता।"
रूद्र ने रोने जैसी आवाज़ में कहा, "तो फिर मैं क्या करूँ अंशिका? तू खुद सोच, तू वहां वापस आने को तैयार नहीं है। सिर्फ उस एक इंसान के डर या नफ़रत की वजह से? तेरा पूरा परिवार, तेरे भाई-बहन, सब यहाँ जयपुर में रहते हैं, और तू वहां मुंबई में इतनी बड़ी दुनिया में अकेली रहती है। क्यों रह रही है तू वहां अकेली? सिर्फ उन 3 महीनों के दर्द की वजह से? उस एक हादसे की वजह से?"
रुद्राक्ष इससे ज़्यादा कुछ और नहीं बोल पाया। उसका गला पूरी तरह रुंध चुका था। उसने अपनी आवाज़ को संभालते हुए आखिरी बार कहा, "मैं कुछ नहीं जानता अंशिका... मैं बस जयपुर में तेरा इंतज़ार करूँगा। तू आएगी।" और इतना कहते ही उसने बिना अंशिका का जवाब सुने फोन को काट दिया।
कॉल कटने के बाद अंशिका वैसे ही जड़ बनी बैठी रही। कमरे में सिर्फ उसके रोने की सिसकियां गूंज रही थीं। वह थोड़ी देर तक घुटनों में सिर रखकर बहुत रोई और कुछ गहरी सोच में डूबी रही। अपने भाई की बेबसी और उसका प्यार देखकर आखिरकार उसने एक बड़ा फैसला लिया। उसने कांपते हाथों से अपना फोन फिर से उठाया और रुद्राक्ष के चैट बॉक्स पर जाकर एक छोटा सा मैसेज टाइप किया: **"मैं आ रही हूँ भाई।"**
यह मैसेज सेंड करते ही उसने एक लंबी सांस ली और तुरंत फोन को बंद करके टेबल पर रख दिया। अंशिका ने अपनी चेयर को थोड़ा पीछे खिसकाया और सोफे के पिछले हिस्से पर अपना सिर टिकाकर अपनी आँखें बंद कर लीं। लेकिन जैसे ही उसने आँखें बंद कीं, कमरे की शांति के बीच उसे अतीत की वो यादें फिर से घेरने लगीं। वो यादें, जो उसके दिल को आज भी चीर देती थीं...
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उधर दूसरी तरफ, जयपुर शहर के एक बेहद पॉश इलाके में स्थित एक बड़ी और आलीशान ऑफिस की बिल्डिंग के सबसे ऊपरी फ्लोर पर माहौल बिल्कुल अलग था। दिन का समय था, बाहर सूरज पूरी शिद्दत से चमक रहा था, लेकिन इस आलीशान बिल्डिंग के एक खास केबिन के अंदर पूरी तरीके से खामोशी और अंधेरा छाया हुआ था। कमरे की बड़ी-बड़ी खिड़कियों पर गहरे रंग के मोटे पर्दे इस तरह गिराए गए थे कि बाहर की धूप की एक किरण भी अंदर कदम नहीं रख सकती थी। बाहर दिन का उजाला था, पर उस केबिन को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे वहाँ काली आधी रात हो रही हो।
कमरे के बीचों-बीच रखी एक बड़ी सी आलीशान चेयर पर एक लड़का बैठा हुआ था। कमरे के उस धुंधले अंधेरे में उसके चेहरे के हाव-भाव साफ नजर नहीं आ रहे थे, लेकिन उसके हाथ में सुलगती हुई सिगरेट की लाल चिंगारी साफ चमक रही थी। वह लड़का लगातार सिगरेट के कश खींच रहा था, जिसकी वजह से सिगरेट का गाढ़ा धुंआ पूरे कमरे में हवा के झोंकों की तरह तैर रहा था और केबिन में एक अजीब सी घुटन पैदा कर रहा था।
उस लड़के के ठीक सामने, दीवार पर एक बहुत बड़ी और बेहद खूबसूरत लड़की की तस्वीर लगी हुई थी। तस्वीर में दिख रही लड़की इतनी मासूम और प्यारी थी कि कोई भी उसकी सादगी पर दिल हार बैठे। वह लड़का अपनी गहरी, जादुई नीली आँखों से बिना पलक झपकाए बस उसी लड़की की फोटो को लगातार घूरे जा रहा था। उसकी नीली आँखों में गुस्सा, नफरत और एक अजीब सा दर्द साफ झलक रहा था, जो उस तस्वीर को देखते ही और गहरा हो जाता था।
तभी अचानक उस शांत और अंधेरे कमरे का दरवाजा एक झटके के साथ खुलता है। बाहर की थोड़ी सी रोशनी केबिन के अंदर आती है। केबिन का दरवाजा खोलकर एक दूसरा लड़का अंदर दाखिल होता है। अंदर का यह नज़ारा और सिगरेट के धुएं की बदबू महसूस करते ही वह लड़का बुरी तरह चौंक जाता है। वह तेजी से आगे बढ़ता है और बड़ी फिक्र के साथ बोलता है, "भाई! यह आपने अपनी क्या हालत बना रखी है? दिन के उजाले में इस अंधेरे कमरे में क्यों बैठे हो?"
कुर्सी पर बैठा वह नीली आँखों वाला लड़का कुछ भी नहीं बोलता। वह अपनी जगह से टस से मस नहीं होता और उसकी आँखें अब भी दीवार पर टंगी उस लड़की की तस्वीर पर ही टिकी रहती हैं।
आने वाला लड़का उसके इस रवैये से परेशान होकर फिर से बोलता है, "भाई, प्लीज अब घर चलो। आप पिछले कई दिनों से लगातार इसी ऑफिस में बंद हो, न ठीक से सोए हो और न खाया है। घर चलो भाई, घर पर पापा आपका कब से इंतजार कर रहे हैं। उन्हें आपकी बहुत फिक्र हो रही है। आपको अपनी इस हालत का अंदाज़ा भी है कि आपने खुद को क्या बना लिया है? और वैसे भी, अब तो घर में खुशियों का माहौल है। हमारी आरोही की शादी होने वाली है, आपको याद तो है ना? अपनी लाडली प्रिंसेस की शादी है भाई!"
प्रिंसेस और शादी का नाम सुनते ही उस नीली आँखों वाले लड़के के जबड़े भींच गए। उसने अपने हाथ में पकड़ी सिगरेट को वहीं एशट्रे में बड़ी बेरहमी से कुचल दिया। उसने अपनी ठंडी और भारी आवाज़ में सामने वाले लड़के की तरफ देखे बिना कहा, "वो सिर्फ मेरी नहीं, तुम्हारी भी बहन है।"
सामने खड़ा लड़का एक ठंडी सांस लेता है और बेहद गुस्से व नफ़रत से भरकर बोलता है, "हाँ भाई, जानता हूँ। और यही तो सबसे बड़ी वजह है कि मुझे अपनी उस बहन से और भी ज़्यादा नफ़रत होती है! वो मेरी भी सगी बहन है, पर उसकी वजह से... उसकी सिर्फ एक गलती की वजह से किसी की पूरी लाइफ बर्बाद हो गई। किसी मासूम की पूरी जिंदगी तबाह हो गई। मैं उससे कभी माफ़ नहीं करूँगा!"
केबिन में आया वह लड़का अपनी बहन के लिए अपनी नफ़रत पूरी तरह बयां करता, उससे पहले ही नीली आँखों वाले लड़के ने खड़े होकर उसे बीच में ही रोक दिया। उसकी आँखों में दर्द और तड़प की आग और तेज़ हो गई थी, जो यह साफ़ बता रही थी कि इस कहानी के तार बहुत गहरे और दर्दनाक अतीत से जुड़े हुए हैं।

वह नीली आँखों वाला लड़का आखिर कौन है? केबिन में आया उसका भाई अपनी ही सगी बहन आरोही से इतनी नफ़रत क्यों करता है? और 3 महीने पहले अंशिका के साथ ऐसा क्या हादसा हुआ था, जिसने उसकी पूरी जिंदगी बदल दी?
क्या जयपुर वापस आने के बाद अंशिका और इस रहस्यमयी इंसान की मुलाकात होगी? और अगर दोनों का सामना हुआ, तो आगे क्या अंजाम होगा? इन सभी सवालों के जवाब जानने के लिए सुनते रहिए हमारी नई ऑडियो सीरीज **"एक अधूरी खता"**!