श्रापित एक प्रेम कहानी - 82 CHIRANJIT TEWARY द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

श्रापित एक प्रेम कहानी - 82

अघोरी कहता है"

" हम्म्..! ठीक है । दक्ष ये बात मेरे और तुम्हारे बिच ही रहनी चाहिए इस बारे मे चेतन को पता नही चलनी चाहिए ।"

 दक्षराज हैरानी से कहता है:

" पर चेतन तो आपका ...! "

इतना बोलकर दक्षराज रुक जाता है , अघोरी कहता है:

" दक्ष तुम्हे जितना कहा गया हो उतना ही करों । जी जी बाबा ..!"

दक्षराज कहता है:

 अघोरी कुछ सौचते हूए कहता है:

" अब मुझे ही इस बात का पता लगाना होगा के वो 
मणी किसके पास है। क्योकी अब देत्य यहां आने लगे है और अगर वो मणी हमे नही मिला तो वो देत्य इस पुरे पृथ्वी पुरे मानव जाति का अंत कर देगा।"

 इधर चेतन एकांश और वर्शाली को ढुंड रहा था और ढुंडते ढुंडते वो थक जाता है:

" उफ्फ ! हर जगह दैख लिया ये एकांश और वर्शाली का कोई खबर नही । पता नही ये दोनो कहां गायब हो गए । और मुझे प्यास भी लग रही है। परतुं यहां पर तो पानी पिने का कोई प्रबंध भी नही है ।"

चेतन इधर उधऱ दैखता है तो कुछ दुरी पर उसे कुछ दुकाने दिखाई देता है । जिसे दैखकर चेतन उसी और जाने लगता है। जैसे ही चेतन दुकान के पास पहूँचा है। वो दैखता है। के वहां पर आलोक , गुणा , चतुर और वृन्दा बैठकर चाय पी रही है। 

चेतन उन सबको दैखकर वही पर छुप जाता है:

" उफ्फ ! मैं जहां जा रहा हूँ ये सभी वही पर मिल जाते है। लगता है ये मेरा पिछा नही छोड़ेगा। अब मैं यहां ज्यादा दैर तक नही रह सकता । क्योकी अगर इसमे से किसी ने भी मुझे यहां पर दैख लिया तो मुस्किल हो जाएगा। "

इतना बोलकर चेतन वहां से जाने के लिए जैसे ही मुड़ता है के गुणा का नजर चेतन पर पड़ता है। ये बात चेतन को भी पता चल जाता है के गुणा ने उसे दैख लिया है। इसिलिए चेतन जल्दी जल्दी अपना वापस कदम बड़ा रहा था । 

चेतन को दैखकर गुणा झट से खड़ा हो जाता है। गुणा को ऐसे अचानक खड़ा होता दैखकर आलोक पूछता है:

" क्या हूआ तु यूं अचानक खड़ा क्यों गया?"


गुणा चेतन की और इशारा करते हूए गुणा कहता है:

" मैने वहा पर चेतन को दैखा ।"

 चेतन का नाम सुनकर आलोक कहता है:

" क्या ! चेतन को दैखा पर कहां ?"

 गुणा से चेतन का नाम सुनकर सभी चोक गया था। सभी गुणा के बताए दिशा की और जाने लगता है। गुणा चेतन को दैखकर सभी को उसकी और इशारा करते हूए दिखाता है।

 आलोक , वृन्दां और बाकी सभी चेकन की और भागता है। चेतन भी बड़ी फुर्ती के साथ भाग रहा था । उधर से एकांश और वर्शाली दौनो ही बाईक से आ रहे थे। चेकन भागते भागते एकांश के बाईक से टकराता जाता है और वही पर गिर जाता है। 

एकांश हड़बड़ाहट से बाईक और वर्शाली को संभालते हूए रुकता है। उधर से आलोत एकांश को चिल्लाकर कहता है:

" एकांश उसे पकड़े रहना भागने मत देना । "

एकांश दैखता है के आलोक वृन्दां और बाकी सभी भागते हूए आ रहा था। चेतन वहां से उठकर भागने की कोशिश करता है पर बड़ी फुर्ती के साथ एकांश उसे पकड़ लेता है। 

चेतन एकांश के पकड़ से भागने ती कोशिश करता है। पर नो भाग नही पाता तभी चेतन की नजर वहा पर मौजुद वर्शाली पर जाती है। वर्शाली को दैखकर चेतन एक दम से शांत हो जाता है। अब छटपटाना बंद कर देता है और वर्शाली को घुरने रहता है। 

तभी सभी वहां पर भागते हूए पहूँच जाता है। आलोक चेतन के पास आकर चेतन से कहता है:

" बहोत भाग लिया बेटा अब बस बहोत हो गया । अब तेरा सारा खेल खतम ।"

 गुणा गुस्से से चेतन के शर्ट के कॉलर को पकड़ता है और उससे कहता है:

" क्यों बे बहोत होशियार बनता है । साले कौन है तु और यूं हमारा पिछा क्यूं कर रहा है ? किसने भेजा है तुझे है तुझे बता ! बता वरना यही जिंदा गाड़ दुगां !!"

गुणा के इतना कहने पर भी चेतन पर कोई फर्क नही पड़ता है। वो बस सबकी और दैखकर मुस्कुराऐ जा रहा था और वर्शाली को घुरे जा रहा था। चेतन के यूँ मुस्कुराने से चतुर आग बबुला हो जाता है। और चेतन को पकड़कर कहता है:

" ये ऐसै नही मानेगा यार । इसे अपने अड्डे पर से कर चलो । दौ तिन झापड़ पड़ेगा ना तो ये हसना भूल जाएगा और तोते की तरह सब कुछ टर टर करते हूए उगल देगा।"

सभी चतुर की बात पर सहमत होकर चेतन को ले जाने लगता है। कुछ जाने के बाद चेतन अपने हाथ को हवा मे उछालता है जिससे एक सफेद रंग का कुछ हवा मे मिल जाता है जिससे सभी को कमजोरी महसुस होने लगती है और चेतन वहा से भागने लगता है। 

सभी चेतन को भागता हुआ दैख रहा था पर सभी इतना कमजोर हो चुका था के चाह कर भी कोई उठ नही पा रहा था। वर्शाली जैसे तैसे अपनो आपको संभालते हूए एकांश के पास जाती है और एकांश को पकड़ कर रास्ते को किनारे पर जाकर बैठ जाती है। 

लगभग 15 मिनट बित चुके थे । सभी अभी भी उसी तरह हिरे पड़े थे । चतुर गुण, वृन्दां औक आलोक सभी धिरे धिरे सड़क के किनारे पर आकर बैठ जाता है। सभी को ऐसा लग रहा था जैसे उसके शरीर मे जान ही नही है। और उसके पूरे शरीर मे लकवा मार दिया है। सभी चाह कर भी अपने घर को हिला नही पा रहा था। तभी वर्शाली को उस रात वाली घटना याद आ जाती है जब दौ आदमी मिलकर उसके साथ जबर्दस्ती करना चाहते थे और एकांश ने उसे आकर बचाया था।

वर्शाली भी उस रात को ऐसे ही कमजोरी महसुस कर रही थी जैसे की वह आज कर रही है। वर्शाली मन ही मन कहती है:

" उस रात्री को भी ऐसे ही किसी मानव मुझे विवश और शक्ती हीन कर दिया था । इसका अर्थ ये हूआ के यही वो मानव है जिसके पास मेरे बहन की मणी है।"

इतना बोलकर वर्शाली लड़खड़ाते हुऐ उठती है और धिरे धिरे अपने कदमो को चेतन की और बड़ाने की कोशीश करती है। पर वर्शाली को चेतन कही भी नजर नही आता है। क्योकी चेतन वहां से जा चुका था। वर्शाली अपने लड़खड़ाते हूए कदम आगे बड़ाए जा रही थी और अपनी थकी हूई आवाज मे कहती है:

" रुक जाओ दुष्ट मैने तुम्हें पहचान लिया है । वो तुम्ही हो जिसने मेरी बहन काे मारा है और उसका मणी लेकर भाग गये थे । रुक जाओ । मुझे मेरा मणी लौटा दो ।"

वर्शाली की आवाज वहीं पर दबी रह जाती है। जिसे सिर्फ एकांश ही सुन पाता है। एकांश वहां से उठने की कोशिश कर रहा था पर वो उठ नही पा रहा था। एकांश वर्शाली को आवाज देकर बुलाता है:

" वर्शाली ।"

 वर्शाली एकांश की आवाज पाकर वो एकांश के पास आ जाती है और एकांश से कहती है:

" एकांश जी ये...ये वही मानव है एकांश जी जिससे आपने मेरी उस रात को रक्षा किये थे । इसी के पास मेरी बहन हर्शाली की मणी है एकांश जी। सिघ्र चलिए एकांश जी अन्यथा वो ...वो दुष्ट भाग जाएगा।"

 वर्शाली की बात को सुनकर एकांश हैरान था। वर्शाली की बात पर एकांश उठने का प्रयास करता है पर उठ नही पाता । एकांश उठता है और फिर लड़खड़ाते हूए वही पर गिर जाता है। वर्शाली समझ जाती है के इस समय एकांश बहोत कमजोर है।

 वर्शाली एकांश के तरफ अपनी आंशु भरी आंखो से एक आशा लिए दैखती है एकांश वर्शाली से धिरे से कहता है:

" वर्शाली ...! मैं अभी भले ही कमजोर हूँ पर मैं उस चेतन को पकड़ कर ही रहूँगां और उससे तुम्हारी बहन की मणी को भी छिन लुगां। चाहे वो कही भी रहे मैं उसे ढुंड निकाल लुगां। "

कुछ दैर तक अचेत रहने के बाद सभी धिरे धिरे फिर से नॉरमल होने लगते है। आलोक खांसते हूए एकांश के पास आता है और खासते हूए कहता है: 

" आहुह । आहुह ! यार ये क्या था कैसा जादु था। जो कुछ दैर के हम लोग ऐसे कमजोर और शक्तीहीन र
कर दिया ?ये कैसा जादु था यार ? क्या यह कोई बेहोशी का दवाई था ? "

 एकांश कहता है:

 पता नही यार इस तरह के दवाई के बारे मे मुझे कोई नॉलेज नही है। ये बेहोशी की दवाई थी क्योकी अगर ये बेहोशी की दवाई क्लोरोफॉर्म या एनेस्थीसिया होती तो हम बेहोश हो जाते मगर हम बेहोश नही हूए हम सब कुछ दैख और समझ सकते थे।"


To be continue....1292