सीप का मोती - 4 manasvi Manu द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

सीप का मोती - 4

भाग ४


" अगर दोबारा ऐसी हरकत हुई तो हमें सख्त कार्रवाई करनी पड़ेगी। एक होशियार और गुणवान लड़की के रूप में पहचान है आपकी लड़की की। उससे इस तरह की हरकत की उम्मीद नही है ।उस लडके की मम्मी पापा को हमने जो कुछ भी हुआ वह प्रकरण ठीक तरह से बताया ही है, पर आप लोग सुनी को भी समझाये दोबारा माफी नही मिलेगी।" प्रिन्सिपल के ऑफिस मे मेरे पापा और सुनी के पापा हमारे सामने खडे होकर प्रिन्सिपल की डाट खा रहे थे।

पहली बार ही उसकी शिकायत सुनने के लिए उसके पापा को बुलाया गया था, क्योंकि सुनी ने कांड ही ऐसा किया था। उसके द्वारा ऐसी हरकत मेरी सोच से परे थी ही ऊपर से उसने जो किया उसकी वजह मैं था। सुनी ने पल भर में मेरे मन के डर का निवारण कर दिया था। मुझसे ज्यादा महत्वपूर्ण पूरे स्कूल में उसके लिए कोई नहीं था। पर गलती सिर्फ उसी की ही थी ऐसा नहीं था। उसे गुस्सा आया उसकी वजह थी...
🍁🍁🍁🍁

स्कूल शुरू हुए अब 2 महीने हो चुके थे। एक बार रिमझिम- रिमझिम बारिश हो रही थी। मैं उस दिन अकेले ही स्कूल से घर जा रहा था। सुनी उसकी सहेलियों के ग्रुप के साथ निकाली होगी शायद। जब मैं सड़क से जा रहा था, तभी सड़क का वह हिस्सा आया, जहां ईंट भट्टी थी। रास्ते में गड्ढे थे, इसलिए जाने के लिए जगह नहीं थी। मैं किसी तरह किनारे चल रहा था। रास्ते पर भट्टी का लाल मिट्टी के कीचड़ वाला पानी पड़ा हुआ था।
मैं थोड़ा बचता हुआ अपनी धुन में चल रहा था, तभी अचानक ठंडे पानी की बौछार मुझ पर पड़ने लगी।

मैं रास्ते में इकट्ठे हुए पानी के पास आया ही था।  चार लोगों ने पानी के बगल से साइकिल टिकाई थी। मेरी तरफ पीछे के टायर करते हुए उन्होंने खड़ी साइकिल के पैडल मारना शुरू कर दिया दो H सेक्शन के और दो मेरे अभी के सेक्शन के  समर, अभिजीत मेरी तरफ पलट कर देखते हुए मेरी खिल्ली उड़ाते हुए हंस रहे थे।

" मोटा... हाथी...भीग गया" वह झट से कूद कर साइकिल पर बैठे और चले गए।

मेरी आइब्रो से भी कीचड़ का पानी टपक रहा था। बदमाशी,ये एक प्रकार है,समझ सकता हूं । पर उसके लिए दो अलग क्लास के लड़के एक साथ आकर मुझ अकेले को ही निशाना बनाएं यह मुझे कुछ अलग लग रहा था । मैं कुछ क्षण वहां स्तब्ध सा खड़ा रहा ।थोड़ी देर बाद डबल स्टैंड की साइकिल पर जाने वाला सचिन मुझे देखते हुए हल्के से हंसता हुआ धीरे-धीरे मेरे सामने से चला गया। उसने मेरे ऊपर पानी नहीं उड़ाया,पर चीढ़ का अदृश्य कीचड़ उड़ते हुए तो मैं उसे देख रहा था
🍁🍁🍁🍁

मैं घर आया। आते ही मम्मी से डांट खाई। मेरा हुलिया कीचड़ में सने हुए भैंसे जैसा लग रहा है। ऐसा मेरी मम्मी ने कहा सर से लेकर पैर तक शरीर, कपड़े और बैग देखकर मेरी मम्मी ने माथा पीट लिया।

ट्यूशन का समय हुआ। पर मुझे उस दिन ट्यूशन जाने की इच्छा नहीं थी। बहुत छींके आ रही थी। एक तो धूल की एलर्जी थी मुझे ऊपर से नाक और मुंह में कीचड़ जाने की वजह से छींक का अटैक आने लगा। वह रुका ही नहीं । मैं परेशान हो गया था, आंख ,नाक मुंह सब छींक - छींक कर लाल हो गए थे।

सुनी मुझे बुलाने आई। मैं अपने रूम में जैसे-तैसे अपने होमवर्क की कॉपी खत्म करने में लगा था। मेरा बैग धोकर सूखने लगाया था। सारी किताबें कॉपीयां भी फॅन के नीचे सूख रही थीं । उन पर भी कुछ जगह मिट्टी लगी हुई थी।

" मोटू चल" जैसे ही उसकी आवाज आई वैसे ही मैंने उसकी तरफ देखा। 

"अरे आज नहीं... मैं नहीं जाऊंगा मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं।" मैंने कहा

" क्यों क्या हुआ..?? ठीक तो लग रहा है ...चल ना।" वह बोली 

मैं कुछ कहता इतने में माता श्री आ गई रूम में  "अच्छा अंजलि भर कीचड़ का पानी मुंह में भर के आया था आज स्कूल से। कहां लोटता फिरता है भगवान ही जाने। तबीयत तो खराब होनी है। जरा ध्यान रखा कर इस मुर्ख का।" मम्मी बोली।

" पर तू स्कूल से निकला था, तब तो ok  था। मैं ज्यादा से ज्यादा पाॅंच मिनट पीछे थी। इतनी देर में इतने सारे कीचड़ में कहां लोट लगा आया तू...सच-सच बता मोटू ।" सुनी बोली

"अरे कोई तो पानी उड़ा कर गया है, बोल रहा था। मुझे नहीं लगता । बैठा होगा कीचड़ में खेलते। पता है ना कि कीचड़ मिट्टी सहन नहीं होती खुद को। तो फिर इस तरह की मस्ती करने की क्या जरूरत। फिर छींकते बैठा। मेरा तो जीना मुहाल कर दिया है इस लड़के ने।खुद तो कीचड़ से नहाया वह ठीक है, पर बैग गंदा होने तक समझ नहीं आया इसे??  इतना कैसे मंदबुद्धि है यह। मम्मी ने दोबारा भड़ास निकाली।

सुनी का तिरछी आंखों से शंका भरी नजरों से मेरी तरफ देखना मुझे सच्चाई छुपाना मुश्किल कर रहा था। जैसे ही मम्मी बाहर गई सुनी मेरे पास आई।

" ओए....क्या हुआ..??  किसने उड़ाया कीचड़...??सच-सच बात।" उसने पूछा

"अरे ऐसे क्या पूछती है...??  बारिश के दिनों में पानी उड़ता ही है। ना जाने कितने लोग साइकिल से जाते हैं। मैं क्या किसी की तरफ देखते बैठूं । गया कीचड़ उड़ा के उड़ने वाला।" मैंने कहा

" ये... इतना भीगने तक..?? सायकिल उड़ाती है क्या इतना पानी...?? " वह बोली 

मैं चुपचाप बैठ रहा। मुझे चुप बैठा देखकर वह चली गई। 

दूसरे दिन में स्कूल गया। ग्राउंड में कीचड़ के कारण प्रार्थना नहीं हो रही थी, इसलिए सब सीधे क्लास में ही आ गए थे। सुनी उस दिन मुझे आई हुई दिखाई नहीं दी। मैं जैसे ही क्लास में पहुंचा, समर और अभिजीत मेरी तरफ देखकर हंसने लगे । मैं सीधे अपनी जगह आया और बेंच पर बैठने ही लगा था कि उतने में स्कूल के बगीचे के काम में आने वाली भारी सी बाल्टी लेकर सुनी जल्दी-जल्दी अंदर आई। सब शांत हो गए। उसके चेहरे की कठोरता देखकर मैं भी घबरा गया। ना जाने यह क्या करने वाली है..??

कुछ ही देर में वह सीधे समर के पास गई, और उसके सिर पर पूरा कीचड़ उडेल दिया। उससे बचने के लिए सभी लोग वहां से दूर हो गए। फिर भी अभिजीत और सचिन के शरीर पर सुनी के फैलाए हुए राबड़े के छींटें गिर ही गए। सभी ऐसे स्तब्ध थे ,जैसे 440 वोल्ट का झटका लगा हो।

" दोबारा अगर उसे परेशान किया ना, तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा... बताई देती हूं। सुनी ने खाली बाल्टी समर को मारने के लिए उठाते हुए कहा। समर के शरीर पर, कान, नाक, आंख और सारी बेंच पर और आसपास कीचड़ फैला हुआ था। सुनी को पल्लवी और स्नेहा  ने पकड़ रखा था, तो समर को सचिन और अभिजीत ने पकड़ रखा था। उन दोनों पर भी कीचड़ लगा हुआ था।

सुनी के गोरे मगर अभी गुस्से से लाल हुए चेहरे पर बहुत गुस्से के भाव थे। गुस्से में उसके माथे की नसें उभर आईं थीं।

"खुन्नस निकालनी हो तो सीधे निकाल ना... मेरे दोस्त को बीच में क्यों लेता है। बदतमीज...मुंह तोड़ दूंगी, दोबारा उसकी तरफ देखा भी तो।" सुनी का मुंह बंद ही नहीं हो रहा था । वह बड़बड़ाती हुई बाहर गई और बाल्टी फेंक आई।

मेरे साथ हुई घटना को सुनी ने अपने दिल पर ले लिया था। उसने बहुत छानबीन करके मेरे साथ हुआ क्या, यह ढूंढ निकाला। मैं उसे कुछ नहीं बताऊंगा यह समझने जितना तो वह मुझे पहचानती थी। मुझे इस बात की खुशी थी। पर उसकी यह अतिवादी प्रतिक्रिया डरावनी थी। यह सब बस वही कर सकती थी।

फिर क्या था, अगली कार्यवाही के लिए घर पर लेटर गए, और घर वालों को बुलाया गया। हमारी दोस्ती जग जाहिर होने की वजह से घर वालों को बहुत कुछ बताने की जरूरत नहीं थी। पर सुनी की इस हरकत के कारण उसे डांट तो पढ़नी ही थी।

"वह तो अच्छा हुआ... सिर्फ कीचड़ उड़ाया उन्होंने। मोटू को हाथ लगाया होता ना तो वह कीचड़ वाली बाल्टी सर पर दे मरती।" इस सारे फसाद का अंत सुनी के इस सुवाक्य से हुआ।
🍁🍁🍁🍁

तेरी नाराजगी का ही जब इतना गहरा असर होगा ,
तो तेरी मोहब्बत का सुकून कैसा मंजर होगा।
यह जो जलाल ए  इश्क है..क्या बस मेरे लिए ??
तेरे वजूद के आसमां पर क्या बस मेरा ही रंग तर होगा..??

क्रमशः 

मूल लेखक:- शब्द भ्रमर 
अनुवाद कर्ता :- शब्द सरिता