राधा का बचपन किसी धुंधली सुबह जैसा था, जहाँ रोशनी तो थी पर गर्माहट नहीं। सात भाई-बहनों के उस बड़े और गरीब परिवार में राधा तीसरे नंबर पर थी। उसका बचपन खेल-कूद में नहीं, बल्कि चूल्हे की आग और घर के कामों में बीता। राधा बाकी बहनों से अलग थी—शांत और सहमी हुई। उसके हाथ में हमेशा एक पुराना सा तावीज़ बंधा रहता, जो उसकी माँ ने उसे "उन सायों" से बचाने के लिए पहनाया था जो राधा के बचपन से ही उसके इर्द-गिर्द मंडराते रहते थे। राधा को हमेशा लगता कि कोई अदृश्य दुख उसका पीछा कर रहा है।
जब राधा जवान हुई, तो उसकी पहली शादी एक बहुत बड़े और अमीर घर में पूरी तैयारी के साथ हुई। लगा कि अब किस्मत पलटेगी, पर नसीब को कुछ और ही मंज़ूर था। वो अमीर घर सिर्फ दिखावा था। वहाँ राधा को बहू नहीं, एक गुलाम समझा गया। दो ही दिनों में उस पर वो ज़ुल्म हुए कि वो डर के मारे अपने मायके लौट आई।
लेकिन मायका अब पहले जैसा सुकून का ठिकाना नहीं रहा था। लौटी हुई बेटी को देख कर भाइयों के तेवर बदल गए और माँ-बाप की नज़रें झुक गईं। रोज़ के ताने और मानसिक प्रताड़ना (torture) ने राधा को इतना अकेला कर दिया कि उसे लगने लगा कि शायद वो एक बोझ है।
तभी एक नया रिश्ता आया। लड़का उम्र में राधा से काफी बड़ा था, दो शादियाँ पहले कर चुका था और चार बच्चों का बाप था। उसने कोई दहेज नहीं माँगा, और बस इसी एक बात ने राधा के घरवालो को मना लिया। उन्होंने राधा से पूछा तक नहीं और उसे एक ऐसे रिश्ते में बाँध दिया जहाँ उसे "पत्नी" से ज़्यादा एक "आया" (caretaker) बन कर जाना था।
शादी के बाद जब राधा अपने नए घर पहुँची, तो उसकी उम्र सिर्फ 16 साल थी। उसका पति, सूरज, और उसके बीच उम्र का इतना बड़ा फासला था कि दोनों की सोच कभी मिल ही नहीं पाती थी। सूरज को सिर्फ अपने बच्चों की देखभाल से मतलब था, राधा के जज़्बातों से नहीं।
16 साल की राधा के नन्हे हाथों में अब चार बच्चों की ज़िम्मेदारी थी। वो बच्चे जो उसे नफरत से देखते थे। राधा उन्हें संभालने की कोशिश करती, पर वो बुरी तरह थक जाती। और इसी थकान और कमज़ोरी के बीच, एक दिन कुछ अजीब हुआ।
सूरज की पहली पत्नी, जो मर चुकी थी, उसका साया राधा के शरीर पर हावी होने लगा। राधा अचानक से बदली-बदली दिखने लगती। कभी वो बहुत प्यार करती, तो कभी उसकी आवाज़ और ढंग बिल्कुल उस मरी हुई पत्नी जैसा हो जाता। वो साया राधा के शरीर को एक घर की तरह इस्तेमाल करने लगा था।
एक शाम, जब घर में क्लेश हुआ, राधा ने रोते हुए सूरज से कहा, "सूरज जी, सब मुझे सौतेली कहते हैं। इन बच्चों में मेरा कोई हिस्सा नहीं है। क्या मेरे नसीब में कभी खुद की कोख का सुख नहीं लिखा? क्या आप नहीं चाहते कि हमारा अपना एक बच्चा हो?"
सूरज ने राधा की तरफ देखा, उसकी आँखों में एक अजीब कशमकश थी। राधा को समझ नहीं आ रहा था कि उसके पीछे मंडराते वो पुराने साये उसे दुख दे रहे हैं, या उसके अपने ही लोग।
क्या सूरज, राधा की "अपना बच्चा" पाने की ख्वाहिश पूरी करेगा?
सूरज की पहली पत्नी का साया राधा के शरीर से क्या चाहता है?
कैसे राधा उन चार बच्चों का दिल जीतेगी, जबकि वह खुद अभी एक बच्ची है?