शक्तिपीठ देवबंद Ritin Pundir द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

शक्तिपीठ देवबंद



सहारनपुर जनपद में दिल्ली-सहारनपुर रेल मार्ग (उत्तरी रेलवे) पर मुज़फ़्फ़रनगर से सहारनपुर (उत्तर) की ओर लगभग 25 कि०मी० की दूरी पर देवबन्द कस्बा स्थित है। देवबन्द नाम का उत्तरांश (बन्द शब्द) वन का बिगड़ा हुआा रूप है। कहते हैं यहाँ सहस्रों वर्ष पूर्व एक गहन सघन वन था। देवी दुर्गा के निवास के कारण इस वन को देवी का वन अथवा देवीवन कहा जाने लगा, जो कालान्तर में मुसलमानी शासन के प्रभाव में देवीबन्द और फिर देवबन्द कहा जाने लगा।
       दूसरे मत मत के अनुसार दुर्ग नाम के एक बहुत उद्धत असुर का इसी स्थान पर संहार करने के कारण दुर्गा कहलाने वाली देवी की अनेक देवताओं ने यहीं भूरि-भूरि वन्दना की थी। अतः जन-सुर-त्राणकारिणी देवी की वन्दना के कारण इस स्थान का नाम देवी-वन्दन-स्थल पड़ गया, जो बाद को देवी-वन्दन या देवीबन्द हो गया। एक अन्य मत के अनुसार इस क्षेत्र में देवताओं का एक बहुसंख्यक वर्ग निवास करता था, जिसके कारण इस स्थान को देव-वृन्द कहा गया और फिर मुस्लिम संस्कृति के प्रभाव से यह शब्द घिस-पिट कर देवबन्द कहलाने लगा। देवबन्द नगरी को राधा-वल्लभ सम्प्रदाय के प्रवर्तक गोस्वामी हित हरिवंश जी की जन्मस्थली होने का गौरव भी प्राप्त है। अरबी-फारसी शिक्षा का विश्व-प्रसिद्ध केन्द्र 'दारुल उलूम' भी इसी नगरी में स्थित है।

देवबन्द के पूर्व की ओर लगभग अठारह हजार वर्ग गज लम्बे-चौड़े क्षेत्र में एक बहुत प्राचीन सरोवर है, जिसे देवी-कुण्ड के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि जहाँ यह कुण्ड है, वहीं पर देवी ने दुर्ग नामक महाअसुर का संहार किया था। इसी स्मृति में देवी-कुण्ड के किनारे पर त्रिपुर बाला मुन्दरी (दुर्गा का एक नाम) का एक मन्दिर निमित है, जो शक्ति के उपासकों की श्रद्धा-भक्ति का विशेष केन्द्र है। इस मन्दिर में दुर्गा की एक नग्न प्रतिमा स्थापित है, जो सदैव एक कांस्य-निर्मित गिलासनुमा पाव से आवृत्त रहती है। इस मन्दिर के द्वार पर पाये गये शिला-लेख के सन्देश को आज तक भी न पढ़ा जा सकना मन्दिर की प्राचीनता का प्रबल प्रमाण है। देवी कुण्ड के समीप ही त्रिपुर बाला सुन्दरी के मन्दिर के बाएँ पाश्र्व में एकादशमुखी महादेव एवं शाकम्भरी देवी के मन्दिर स्थित है तथा दायीं ओर एक प्राचीन संस्कृत महाविद्यालय है। यहाँ के एक लोक-विश्वास के अनुसार शाकम्भरी- तीर्थ में स्थित देवी को देवीवन में स्थित देवी की बहन माना जाता है। भगवती त्रिपुर बाला सुन्दरी के मन्दिर में प्रतिवर्ष चैत्र शुक्ल चतुर्दशी को विराट् मेला लगता है, जो 10-12 दिनों तक चलता है। दूर-दूर से आये असंख्य श्रद्धालु नर-नारी देवी कुण्ड में स्नान करके देवी दुर्गा की अर्चना करते हैं।

देवी कुण्ड के समीप ही औरंगजेब के समय का एक सतियों का स्मारक भी है। देवबन्द के अवकाश-प्राप्त वयोवृद्ध विद्वान् प्राध्यापक कवि श्री बनवारीलाल शर्मा ने हमें बताया था कि देववन्द के एक साहसी ब्राह्मण श्री सोल्हड़ मिश्र ने तत्कालीन शासक औरंगजेब के मृत्यु-कर के आदेश की अवहेलना करके अपनी माता का शव-दाह कर दिया था, जिसके परिणामस्वरूप औरंगजेब की सेना की एक टुकड़ी तथा सोल्हड़ मिश्र के समर्थकों के बीच घमासान संघर्ष हुआ था। इस संघर्ष में देवबन्द के बहुत लोग मारे गये थे। उन सभी की पत्नियाँ उनकी चिताओं पर सती हो गयी थीं। उन्हीं पतिप्राणा-उत्सर्गशीला नारियों की पुष्य स्मृति में यह सती-स्मारक बनाया गया था। दुर्गा की भक्ति करते हुए प्राणोत्सर्ग करने बाले धानू भगत का नाम भी यहाँ दुर्गा पूजा के समय श्रद्धा के साथ स्मरण किया जाता है। कहते हैं कि धानू नाम के किसी बनजारे ने भगवती की आराधना करते हुए अपना सिर काटकर अर्पण कर दिया था। इसीलिए मेले के समय यहाँ परम्परा यह है कि धानू भगत की पूजा के बाद ही देवी की आराधना आरम्भ की जाती है।

देवबन्द के देवी-कुण्ड और उसके समीपस्थ त्रिपुर बालासुन्दरी के मन्दिर को सहारनपुर जनपद के दो शक्ति- पीठों में से एक माना जाता है। विद्वानों का मत है कि इस शक्तिपीठ की प्राचीनता के प्रमाण तो 'मार्कण्डेय पुराण' तथा 'देवी भागवत्' आदि ग्रंथ जुटाते हैं, लेकिन यहाँ स्थित मन्दिरों की प्राचीनता के विषय में तो शिल्प और स्थापत्य कला के मर्मज्ञ ही आश्वस्ति के साथ कुछ कह सकते हैं।
देवबंद में क्षत्रिय समाज का पहला परिवार मलखान सिंह जी एडवोकेट का बसा था और उसके बाद ठाकुर महिपाल सिंह शास्त्री वैद्य सन 1947 में पैतृक गांव बुड्ढा खेड़ा मुजफ्फरनगर से देवबंद आए थे। आज परमपिता परमेश्वर की कृपा से देवबंद में लगभग 300 परिवार क्षत्रिय समाज के रह रहे हैं।