देर रात। कमरे में हल्की पीली रोशनी। बाहर हवा की धीमी आवाज़। Kabir बिस्तर पर पीठ घुमाकर लेटा है। उसके चेहरे पर खिंचाव और छुपा हुआ दर्द साफ़ दिखता है। Shreya उसकी तरफ पीठ करके लेटी है, पर नींद उसे छूकर निकल भी नहीं रही…।
Kabir अचानक थोड़ा सा कराहता है। सीने पर हाथ रखता है। दर्द बढ़ता है…
Kabir (धीमे मगर गुस्से में बड़बड़ाते हुए) बोला -
धत्त तेरे की… ये दर्द भी ख़त्म क्यों नहीं होता…।
आवाज़ धीमी थी पर गुस्सा तेज था। Shreya को सुनाई दे गया। वह सहमकर पलटती है।
Shreya (धीमी, डरते हुए) बोली -
क्या… क्या हुआ Kabir जी…?
Kabir झटके से उसकी तरफ न देखकर दूसरी ओर हो जाता है।
Kabir (चिढ़कर) बोला -
कुछ नहीं! सो जाओ।
Shreya अब बिल्कुल चुप। वही डर, वही सिहरन… जो उसने कभी Karan के साथ महसूस की थी। उसे याद आता है।
Flashback
Karan रात में बार-बार उठ जाता था। अक्सर गुस्से में खिड़की के पास खड़ा रहता। दवाई की शीशी खोलकर एक टैबलेट मुंह में डालता… और दीवार पर हाथ पटक देता।
Karan (गुस्से भरी आवाज़ में) बोलता -
ये दर्द… ये बेचैनी… क्यों नहीं खत्म होती!
Shreya डरकर चुप रहती। उस वक्त उसका डर उसकी आवाज़ छीन लेता था।
वर्तमान में लौटना
Flashback खत्म। Shreya Kabir की पीठ को देखती है। उसका दिल धक-धक करता है। उसे लगता है Kabir भी कहीं… किसी दर्द में उलझ न रहा हो।
वह धीरे से हाथ बढ़ाती है और Kabir को अपनी ओर खींचने की कोशिश करती है।
Shreya (धीमे, कंपकंपाती आवाज़ में) बोली -
Kabir जी… प्लीज़… मुड़िये मेरी तरफ…।
Kabir चिढ़कर हटने की कोशिश करता है।
Kabir (गुस्से में) बोला -
Shreya… प्लीज़ मुझे मत पकड़ो… मैं ठीक हूँ—
पर Shreya के हाथों की पकड़ नर्म थी लेकिन मजबूत। Kabir थककर हार गया। धीरे-धीरे वह पलटता है और उसका चेहरा दर्द से सिकुड़ा हुआ नज़र आता है। Shreya उसकी आँखों में देखती है। Kabir गुस्से के पीछे दर्द छुपाने की कोशिश कर रहा है।
Shreya (धीरे से उसका चेहरा पकड़ते हुए) बोली -
Kabir जी…आप दर्द में हो। मुझसे क्यों छुपा रहे हो…?
Kabir उसकी बात से असहज।
Kabir (नज़रें चुराकर) बोला -
ये मेरा मसला है, Shreya… तुम्हें परेशान नहीं करना चाहता।
Shreya दोनों हाथों से उसका चेहरा अपनी ओर करती है।
Shreya (टूटे हुए सुर में) बोली -
मुझे परेशानी मत कहिए… मैं आपकी पत्नी हूँ Kabir जी… आपका दर्द मेरा है।
Shreya उसकी छाती पर हाथ रखती है। Kabir की सांस भारी है। वह पहली बार संघर्ष छोड़ देता है…
Kabir (थोड़े टूटे हुए स्वर में) बोला -
कभी-कभी… लगता है… ये दर्द मेरे अंदर की किसी पुरानी लड़ाई जैसा है…मैं नहीं चाहता तुम मुझे इस हालत में देखो।
Shreya उसकी पलकों को छूती है।
Shreya बोली -
Kabir जी… इंसान दर्द छुपाता तभी है जब उसे डर होता है कि कोई उसे कमजोर समझेगा।
लेकिन मैं आपको… कभी कमजोर नहीं समझूंगी।
Kabir की आँखें नम हो जाती हैं… वह Shreya को अपनी ओर खींच लेता है।
Kabir (फुसफुसाते हुए) बोला -
बस… मेरे पास रहो Shreya।
Shreya उसे धीरे से अपने सीने से लगाती है।
Shreya बोली -
मैं हमेशा यहीं हूँ… चाहे आपका दर्द कितना भी गहरा क्यों न हो।
कमरे में सन्नाटा है… पर दोनों के बीच एक शांति उतरती है। पहले बार Kabir ने अपना डर, अपना दर्द किसी को दिखाया था…।
रात का वही वक्त, दो अलग कमरे, दो अलग किस्मतें
Kabir और Shreya के सीन से दूसरी दुनिया में जाते हैं।
एक कमरा, जहाँ हल्की ट्यूबलाइट झिलमिला रही है। माहौल अजीब-सा सन्नाटा लिए है।
Karan अकेला बिस्तर पर बैठा है। उसके चेहरे पर डर, थकान और बेचैनी की मोटी परतें हैं।
Karan (धीमे कराहते हुए) बोला -
हे भगवान… ये दर्द… ये अंदर से क्या काट रहा है मुझे…।
वह उठकर खड़ा होता है— लड़खड़ाते हुए दीवार का सहारा लेता है।
Karan अलमारी खोलता है, वही छोटी काली शीशी निकालता है।
वह झटके से कैप खोलता है, गोली निकालता है, पर हाथ कांप रहा है।
Karan(गुस्से और दर्द के बीच फँसी आवाज़ में)बोला-
उफ्फ… काश ये गोली कोई चमत्कार कर देती…
गोली खाते ही दीवार पर मुट्ठी मारता है।
Karan बोला -
क्यों नहीं खत्म होता ये दर्द!! क्यों!?
कमरा सूना है। उसकी आवाज़ दीवारों में गूंजकर वापस उसी पर गिरती है।
खालीपन, जो सबसे ज्यादा दर्द देता है
Karan खिड़की के पास जाता है। बाहर अँधेरा है, सड़क पर कुछ कुत्तों की दूर से आती आवाज़…।
उसकी आँखें खुद-ब-खुद बंद हो जाती हैं।
और दिमाग में एक ही चेहरा उभरता है— Shreya।
Soft flashback —
Shreya की मुस्कान, उसके हाथों का स्पर्श, उसका देखभाल करने का तरीका।
Karan (टूटी आवाज़ में खुद से) बोला -
Shreya होती… तो ये दर्द मुझे छू भी नहीं पाता…
वह पलटकर बिस्तर पर वापस बैठता है। हाथों से चेहरा ढक लेता है।
Split scene effect –
एक तरफ Kabir Shreya के सीने से लगा हुआ सो रहा है। उसके चेहरे पर थोड़ी राहत है। Shreya उसके बाल सहला रही है।
दूसरी तरफ—
Karan अकेला, दर्द से तड़पता हुआ, खाली कमरे में झूलता है।
दर्द दोनों को था…
फर्क सिर्फ इतना था—
Kabir के पास Shreya थी…
और Karan के पास किसी का भी कंधा नहीं था।
Karan गहरी सांस लेते हुए अपना सीना पकड़ता है।
Karan बोला -
आज… अगर कोई मेरी पीठ थपथपाता… कोई कहता कि ‘मैं यहाँ हूँ’…
तो शायद… शायद ये दर्द आधा हो जाता…
उसकी आँखों से आंसू बहने लगते हैं।
वह बिस्तर पर लेटता है, करवट बदलता है, पर आराम नहीं मिलता।
Karan बोला -
Shreya… तुम नहीं हो इसलिए ये रात… ये दर्द… दो गुना लगता है…
Kabir — Shreya की बाहों में,
Karan — अकेले अंधेरे में।
एक ही दर्द था…पर Shreya की मौजूदगी से Kabir का दर्द पिघलने लगा था।
जबकि Shreya की गैरमौजूदगी ने Karan के दर्द को और हथौड़े की तरह उसके दिल पर दे मारा…
सुबह का कमरा, Kabir अब ठीक हो चुका है
हल्की धूप कमरे में गिर रही है। Kabir अब पहले जैसा कमज़ोर नहीं लगता। उसकी साँसें सामान्य हैं। Shreya सामने अलमारी में कुछ रख रही है।
अचानक Shreya की चाल लड़खड़ाती है—
Kabir तुरंत नोटिस करता है।
Kabir (धीरे से) बोला -
Shreya… तुम्हें क्या हुआ?
Shreya (धीमे, शर्माते हुए) बोली -
वो… मेरे periods शुरू हो गए हैं…
Kabir की आँखों में एक पल की चिंता चमकती है।
Kabir बोला -
ठीक है… तुम बैठो। मैं संभालता हूँ।
Shreya थोड़ी हैरान— क्योंकि Kabir पहले ऐसे care नहीं करता था।
Kabir किचन में है। नींबू पानी बना रहा है। फिर हॉट वॉटर बैग भरता है।
वह कमरे में आता है—
Kabir बोला -
ये पकड़ो… पेट दर्द थोड़ा कम होगा।
Shreya हैरानी से Kabir को देखती है।
Shreya (धीरे से) बोली - प
आप… इतना खयाल क्यों रख रहे हैं?
Kabir थोड़ी देर चुप।
फिर वह इतना ही बोलता है—
क्योंकि ये तुम्हारी जरूरत है।
— और मुड़ जाता है।
Daytime शांति थी… असली संघर्ष अभी बाकी था।
रात। कमरे की लाइटें बंद। Shreya सोने की कोशिश कर रही है। Kabir एकदम stiff होकर लेटा है— Shreya से थोड़ा दूर।
दिन में care करना आसान था…
पर Kabir के लिए असली परीक्षा थी—
रात। वही रात… वही स्थिति… वही जिम्मेदारी…
जो कभी Karan ने निभाई थी।
Kabir करवट लेता है। सांस भारी है।
उसे खुद से सवाल उठता है—
Kabir (मन में) बोला -
क्या मैं कर पाऊँगा…?
क्या मैं उसके पास रह पाऊँगा बिना उसे परेशान किए…?
बिना गुस्सा किए…?
Shreya को तेज़ ऐंठन होती है और वह हल्की सी कराह उठती है।
Shreya बोली -
आह…
Kabir तुरंत उठ बैठता है।
Kabir बोला -
दर्द है?
Shreya (धीमे) बोली -
थोड़ा…
Kabir एक पल के लिए frozen—
वही पल जहाँ Karan fail नहीं हुआ था।
वही पल जहाँ Kabir खुद का डर महसूस करता है।
लेकिन इस बार Kabir भागता नहीं।
वह धीरे से Shreya को अपने पास खींच लेता है।
Shreya हैरान।
Shreya बोली -
Kabir Ji…?
Kabir (धीमी, टूटी हुई आवाज़ में) बोला -
डरो मत… बस… बस मेरे पास रहो…
शायद… शायद मैं भी कल से बेहतर बन जाऊँ…
Kabir Shreya के पेट पर हल्के हाथ से दबाव देता है, जैसे Karan करता था।
Shreya की सांसें सामान्य होने लगती हैं।
Kabir के मन में तूफान—
Kabir (मन में) बोला -
Karan ने तब ये सब कैसे संभाला होगा…
मैं तो खुद को संभाल नहीं पाता…
पर Shreya…वो अकेली क्यों सहे…?
Shreya उसका हाथ पकड़ लेती है।
Shreya (धीमे, भावुक होकर) बोली -
आप अच्छे हैं Kabir जी… बस खुद को समझ नहीं पाते।
Kabir की आँखों में पहली बार नरमी उतरती है।
कुछ देर बाद Shreya उसकी छाती पर सिर रखकर सो जाती है।
Kabir धीरे-धीरे उसकी पीठ सहलाता है — बिल्कुल उसी तरह जैसे Karan करता था।
एक पल के लिए Kabir ऊपर छत देखता है—
आँखें नम हो जाती हैं।
Kabir (फुसफुसाते हुए) बोला -
Karan भैया…
आज आपकी परीक्षा मैंने भी दी…
उम्मीद है… मैंने आपको निराश नहीं किया होगा…"