श्रापित एक प्रेम कहानी - 75 CHIRANJIT TEWARY द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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श्रापित एक प्रेम कहानी - 75

एकांश वर्शाली की हाथ को पकड़कर अपने कंधे पर रख देता है। 

और कहता है। 

> ये भी तो तुम्हारा ही है वर्शाली !

 एकांश के मुह ये इतना सुनने के बाद वर्शाली सरमाने लगती है दौनो ही एक दुसरे को बाईक के शिशे मे दैखता है। दौनो ही एक दुसरे को दैखकर सरमाने लगता है और तब एकांश बाईक को धिरे धीरे आगे की और बड़ाने लगता है। उधर मिरा एकांश के कमरे मे शिशे मे अपने आपको दैखकर बस यही सौच रही थी के आज इस शिशे मे ऐसा क्या हो गया के ये शिशा मुझे भ्रम मे डाल रहा था। 

मैं जो देखी थी वो कोई सपना या भ्रम तो नही था क्योकी मैंने खुद उन दोनो को यहां दैखी थी। 

मिरा इतना सोच ही रही थी के तभी वहां पर सत्यजित भी मिरा को ढुंढते हूए आ जाता है । और आकर मिरा के पिछे खड़ा हो जाता है। मिरा एक बार फिर आईने मे दैखती है तो इस बार मिरा को सत्यजीत दिखाई देता है। जिसे देखकर मिरा कहती है।

> ये क्या ! अब इसमे आप भी दिखाई देने लगे। 

मिरा डरते हुए कहती है। 

> अच्छा तो ये बात है। मुझे लगता है के इस कमरे कोई चुड़ेल आ गई है जो बार बार सबका रुप लेकर मुझे डराने की कोशिश कर रही है। प..प.रर म ...मैं भी क...कह देती हूँ म...मम मैं ड..ड...डरने वाली नही हूँ । चाहे तुम कितना भी कोशिश करलो चुड़ेल मैं तुमसे डरने वाली नही हूँ । 

मिरा के मुह से बार बार चुड़ेल का नाम सुनकर सत्यजीत अपने आप से कहता है।

> ये मिरा शिशे मे किसे देखकर बात कर रही है और ये चुड़ेल किसे कह रही है ?

मिरा को आईने ने देखकर सत्यजीत हल्की मुस्कान देता है। जिसे देखकर मिरा फिर कहती है। 

> अच्छा तो तुझे मेरी बात पर हंसी आ रही है। तुझे क्या लगता है के मैं तुझसे डर जाऊगीं तो ये तेरा वहम है। अब दैख तु चुड़ेल मैं तेरे साथ अब क्या करती हूँ। 

मिरा को आईने के सामने बार बार ऐसे बड़बड़ाते दैख कर सत्यजीत हैरान था । 

> ये मिरा को आज हो गया है। कही इसपर किसी चुड़ेल का साया तो नही आ आया है। 

तभी मिरा कोने मे रखी एक डंडे को उठाकर लाती है। तो सत्यजीत मिरा से कहती है ।

> क्या हुआ मिरा ये तुम क्या बड़बड़ा रही हो। 

सत्यजीत के इतना बोलते ही मिरा के जैसे पैरो तले से जमीन खिसक गयी़ मिरा के हाथ से डंडा अपने आप से छुट जाता है। मिरा डर ये थर थर कांप रही थी उसकी आंखे डर से बड़ी बड़ी और लाल थी उसे ये लगने लगा था के चुड़ेल सत्यजीत का रुप लेकर आई है और अब बोलने लग गई है। सत्यजीत की आवाज पर मिरा धिरे धिरे पिछे पलटने लगती है। 

और राम राम का जाप करती हूई कहती है। 

> हे भगवान ये चुड़ेल तो अब बोलने भी लग गयी है। 

इतना बोलकर मिरा डर से धिरे धिरे सत्यजीत की और मुड़ने लगती है। और मुड़कर हैरानी से सत्यजीत को दैखती रहती है। और कहती है ।

> क...कक ...कौन हो तुम ! और क्या चाहते हो ? 

इतना बोलकर मिरा सत्यजीत को डर से दैखती है। सत्यजीत मिरा को इस तरह से दैखकर चौंक जाता है। और जैसे ही मिरा के करीब जाने की कोशिश करता है के मिरा सत्यजीत को अपने करीब आता दैखकर और डर जाती है और मिरा डर से चिल्लाती है। 

> भ...भभ...भूत ! भूत ! 

इससे पहले के सत्यजीत कुछ बोल पाता मिरा डर से भूत भूत चिल्ला कर उस कमरे से बाहर निकल जाती है। मिरा के इस तरह के बरताव से सत्यजीत हक्का बक्का रह जाता है। और कहता है--

> भूत और मैं ..! 

सत्यजीत आईने के पास जाकर अपनी शक्ल को दैखकर कहता है।

> मेरा चेहरा तो ठिक ही है। थोड़ा सा जरावना है पर इतना भी डरावना नही है। 

पर मिरा को मेरे अंदर भूत कहां से दिख गया ? जाकर उसीसे पूछता हूँ । 

इतना बोलकर सत्यजीत भी एकांश के कमरे से बाहर आ जाता है। इधर वर्शाली और एकांश दौनो बाइक से घर की और ही आ रहे थे। तभी एकांश वर्शाली से पूछता है। 

> अच्छा वर्शाली एक पूछूं ? हां पूछीये । 

वर्शाली जवाब देकर कहती है। 

एकांश कहता है। 

> तुम्हे मेरे इस बाइक पर बैठकर कैसा लग रहा है।  

वर्शाली कहती है। 

> आप ऐसा क्यूं पूछ रहे हो। 

एकांश थोड़ा घमंड से कहता है । 

> वो इसिलिए क्योकी इस तरह का वाहन तो तुम्हारे 
लोक मे नही है ना। ये तो हम मानवो का आविष्कार है। इसिलिए मैने तुमसे पूछा ! 

एकांश की बात को सुनकर वर्शाली हल्की मुस्कान के साथ कहती है। 

> हमारे लौक मे तो ऐसी बेकार वस्तु का क्या काम।  

वर्शाली के ऐसी कहने पर एकांश वर्शाली पर चिड़कर कहता है। 

> बेकार वस्तु ! तो ये तुम्हे बेकार वस्तु लग रहा है। 

वर्शाली कहती है। 

> और नही तो क्या आप ही बताओ ऐसी क्या खास बात है आपके इस वाहन मे जो मैं इसे बेकार नही कहुँ ।

 एकांश वर्शाली से कहता है। 

> ये हमे एक जगह से दुसरे जगह तक आसानी से और जल्दी पहुंचा देता है। और इसमे थकान भी कम होती है। 

एकांश बात सुनकर वर्शाली कहती है।

> इतने समय मे तो मैं आपको पूरे संसार मे कही से भी घुमाकर लेकर आती ।

वर्शाली की बात सुनकर एकांश चुप हो जाता है। क्योकी वह जानता था के वर्शाली सच मे ऐसा कर सकती है। जिसका झलक वर्शाली एकांश को कुछ दैर पहले दिखा चुकी थी । 

वर्शाली एकांश से कहती है --

> परतुं इस वाहन की एक बात मुझे बहोत पसंद आई। 

एकांश झट से पूछता है ।

> वो क्या वर्शाली ?

 वर्शाली कहती है--

> वो ये के इस वाहन के वजह से मैं आपके साथ कुछ क्षण तक व्यतित कर पा रहा हूँ । जो मुझे बहोत अच्छा लग रहा है। 

एकांश वर्शाली वकी बात पर मन ही मन बहोत खूश हो रहा था। और फिर वर्शाली से पूछता है। 

> वर्शाली ये जो तुम्हारी लेंग्वेज है ना मेरा मतलब है के तुम्हारी भाषा जब तुम बोलती हो तो ऐसा लगता है जैसे के तुम आज के नही बल्की बहोत पुराने समय से आई हो । क्योकी ऐसी भाषा तो मैने सिर्फ़ रामायण और महाभारत के युग मे सुनी है। और अब ये तुम्हारे मुख से सुन रहा हूँ । जब तुम बोलती हो तो ऐसा लगता है के जैसे तुम उसी युग से आयी हो। 

एकांश की बात को सुनकर वर्शाली कहती है । 

> तो क्या आप रामायण या महाभारत युग के हो एकांश जी ? 

वर्शाली की बात सुनकर एकाश कहता है

वर्शाली की बात सुनकर एकाश कहता है।

> नही तो । पागल हो वो तो कई हजार साल पहले की बात है। पर तुम ऐसे क्यों पूछ रही हो ? 

वर्शाली झट से कहती है । 

> वो इसिलिए क्योकी आपको ये कैसे पता के रामायण या महाभारत मे कौन सी भाषा बोली जाती थी।  

एकांश कहता है । 

> वो इसिलिए क्योकी मैने महाभारत और रामायण दौनो ग्रंथ को पड़ा है और उसी ग्रंथ से कई चलचित्र भी बनी है। 

एकांश वर्शाली से पूछता है। 

> चलचित्र तो पता है ना तुम्हें ? 

वर्शाली कहती है। 

> हां एकांश जी पता है मुझे । मैं इतनी सिघ्रता से कैसे भुल सकती हूँ । इतनी भी भुलने वाली नही हूँ मैं ।


 एकांश वर्शाली से कहता है--

> हां उसी चलचित्र मे रामायण और महाभारत मे घटीत घचनाओ को लोग उस कैरेक्टर ... उफ क्या कहते है हिन्दी मे ...! 

वर्शाली झट से कहती है। 

> समझ गयी एकांश जी। के मानव राम जी सिता और रावन का रुप लेकर उस समय की घटित क्षण को दर्शाता है। है ना एकांश जी ? 

वर्शाली की बात को सुनकर एकाश हँसते हुए कहता है। 


> हां वर्शाली बिल्कुल सही कहा तुमने। पर वर्शाली एक बात की चिंता मुझे हो रही है। 

वो क्या एकाश जी ? 

वर्शाली एकाश से पूछती है। 

एकांश कहता है। 

> यही के मेरे घर वाले तुम्हारी ये भाषा को सुनकर कैसे रियक्ट करेगें मतलब क्या करेगें। वही मैं सौच रही हूँ । 

वर्शाली कहती है।

> उसमे मैं क्या करूं एकांश जी मेरी भाषा तो ऐसी ही है। जो मुझे आती है मैं तो वही कहूँगी ना और आप ही तो मुझे अपने घर ले जाने की जिद कर रहे हो।


 एकांश कहता है। 

> अरे वो बात नही है। तुम्हे जैसी बोली आती है तुम 
वैसे ही बोलना । बाकी मैं सब संभाल लुगां। 

उधर मिरा हॉल मे बैठकर उस कमरे के मे हुए घटना के बारे मे सौच रही थी। तभी वहां पर सत्यजीत आ जाता है। और मिरा से कहता है। 

> मिरा तुम कमरे से भाग कर क्यों आ गई और तुम ये भुत - भुत करके भागी क्यों । 

मिरा हैरानी से कहती है। 

> आ.…आप वहां गए थे क्या ? 

सत्यजीत अपनी एक भोंहे उपर करते कहता है। 

> गए थे ..! गए थे का क्या मतलब मिरा। मैं तो वही था। और तुम मुझे दैखकर ऐसी भागी जैसे मैं तुम्हारा पति नही बल्की मैं कोई भूत हूँ। और फिर तुम वहां से भूत भूत चिल्ला कर क्यों भागी थी ?

To be continue....1191