सूरज की हल्की रोशनी पर्दों से छनकर कमरे में आ रही है।
श्रेया जागी-बैठी है, आँखें सूजी हुईं… रात की थकान अब भी चेहरे पर दिख रही है।
करण नींद से उठता है।
वो कुछ पलों तक उसे देखता रहता है—शांत… बिना गुस्से के।
उसकी निगाहें नरम हैं, जैसे रात का गुस्सा कहीं गायब हो गया हो।
करण (धीरे, पास आते हुए) बोला -
श्रेया… रात को जो हुआ… मैं बस परेशान था।
तुम जानती हो न, मैं जान-बूझकर तुम्हें दुख नहीं देता।
वो उसके बिल्कुल करीब आ बैठता है।
श्रेया हल्के से पीछे हटती है—ज्यादा नहीं—बस थोड़ा सा।
पर करण ये नोटिस कर लेता है।
करण (थोड़ा रुककर) बोला -
डरती हो मुझसे?
श्रेया उसकी तरफ देखती है—
आँखों में प्यार भी है… डर भी… उलझन भी।
श्रेया(धीरे, काँपती आवाज़ में) बोली -
नहीं… मैं बस…
मैंने आपको पहले कभी ऐसे गुस्से में नहीं देखा था, करण जी।
श्रेया सच बोल रही थी।
करण के touch से उसे कोई परेशानी नहीं होती थी—
वो तो उसका पति था, उसका अधिकार था।
पर उसका वो फटना… वो चिल्लाना…
उसने श्रेया के भीतर एक नया डर बसा दिया था।
(श्रेया के दिल की आवाज़ – वॉइसओवर) —
मुझे उसके पास रहकर भी डर लगता है…
और दूर रहकर भी।
मैं उसके गुस्से से डरती हूँ,
उसके स्पर्श से नहीं।
पर वो कैसे समझेगा ये फर्क?
करण उसके पास झुकता है,
उसके बालों को कान के पीछे करता है,
बहुत धीरे… बहुत नर्म तरीके से।
उसकी आँखों में सिर्फ प्यार है।
लेकिन श्रेया का दिल फिर भी तेज़ धड़कता है—
गुस्से की याद अभी ताज़ा है।
करण (धीरे से) बोला -
Shreya… मैं तुम्हारे क़रीब आना चाहता हूँ।
तुमसे बात करना चाहता हूँ।
तुम्हें महसूस करना चाहता हूँ।
पर अगर तुम्हें असहज लगे… तो मैं रुक जाऊँगा।
ये सुनकर श्रेया की आँखें एक पल को भर आती हैं।
ये वही करण था जिससे वो प्यार करती है…
पर वही करण है जिसने रात को उसे डरा भी दिया था।
श्रेया (हिचकते हुए) बोली -
मैं uncomfortable नहीं हूँ…
बस थोड़ी-सी घबराहट होती है…
करण उसका हाथ पकड़ लेता है।
श्रेया हल्के से चौक जाती है, पर हाथ नहीं छुड़ाती।
करण(बहुत नर्मी से) बोला -
मैं तुम्हें कभी hurt नहीं करूँगा, Shreya।
कभी नहीं।
चाहे पूरी दुनिया ही क्यों न टूट जाए।
वो उसके माथे पर हल्की सी kiss करता है।
श्रेया की साँसें रुक सी जाती हैं—
डर नहीं… बस भावनाओं की वजह से।
श्रेया खुद को संभाल नहीं पाती और करण की छाती से लग जाती है।
वो करवट लेते हुए उसे अपने सीने से और करीब कर लेता है।
श्रेया को करण के छूने से कोई दिक्कत नहीं थी।
पर उसका गुस्सा…
वो श्रेया की आत्मा तक में दरार डाल गया था।
इसलिए अब जब करण पास आता था,
उसके दिल में हल्की-हल्की कंपकंपी उठती थी—
प्यार की नहीं… डर की।
और उसे खुद ये फर्क समझ नहीं आ रहा था।
INT. KABIR’S ROOM – EARLY MORNING
कबीर रात भर सो नहीं पाया।
कभी दाएँ मुड़ता… कभी बाएँ…
उसके हाथ अनजाने में कभी करण को ढूँढते,
कभी श्रेया को…
पर दोनों ही नहीं थे।
(वॉइसओवर – कबीर) —
अकेले सोने की आदत कभी थी ही नहीं…
और आज भी दोनों मेरे ही हैं…
बस कमरे बदल गए हैं।
उसकी आँखें लाल हैं, नींद से नहीं… रोने से।
INT. KITCHEN – MORNING
श्रेया चुपचाप खिचड़ी बना रही है।
आँखें सुर्ख… चेहरा बुझा हुआ।
रात वाली उथल-पुथल अभी भी दिल पर बोझ है।
कबीर दूर से खड़ा हो कर उसे देखता है—बस देखता ही रह जाता है।
उसे उसके पास जाना है…
पर करण की शर्त कानों में हथकड़ी की तरह बंधी हुई है।
वो अपने होंठ भींचते हुए चुपचाप पीछे हट जाता है।
INT. DINING AREA – CONTINUOUS
करण टेबल के पास बैठा है।
कबीर जाकर उसके बगल में बैठता है—जैसे हमेशा बैठता था।
दोनों के चेहरे तने हुए हैं।
करण और कबीर
(एक-दूसरे को देखते हुए)
"…."
उनकी आँखों में गुस्सा भी है, चोट भी… और दर्द भी।
दो सेकंड…
चार सेकंड…
छह सेकंड—
पर जैसे ही उनकी नज़र श्रेया पर जाती है,
दोनों खामोश होकर नज़रें झुका लेते हैं।
INT. KITCHEN – CONTINUOUS
श्रेया खिचड़ी का बर्तन रखती है।
उसके चेहरे पर आज कोई भाव नहीं है…
ना हँसी…
ना गुस्सा…
ना ही शिकायत।
सिर्फ… थकान।
वो प्लेट निकालती है, सामने टेबल पर रखती है।
करण हल्की आवाज़ में पूछता है—
करण (नरमी से) बोला -
Shreya… कुछ खा लो।
सुबह से तुमने कुछ भी नहीं खाया है।
श्रेया उसकी तरफ देखती भी नहीं।
श्रेया(बहुत धीमे, टूटी आवाज़ में) बोली -
मुझे भूख नहीं है।
वो पीछे मुड़कर चली जाती है।
धीरे… बहुत धीरे। जैसे उसके पैरों में भारी पत्थर बंधे हों।
कमरे से बाहर जाते-जाते उसकी आँख से एक आँसू टपकता है—
पर वो किसीने नहीं देखा…
या शायद… दोनों ने देखा, पर जताया नहीं।
INT. DINING AREA – CONTINUOUS
कबीर प्लेट उठाता है… नहीं, वापस रख देता है।
वो एक लंबी साँस लेता है और उठ जाता है।
करण(थोड़ा हैरान होकर) बोला -
खाने नहीं बैठेगा?
कबीर (धीरे, गुस्सा दबाते हुए) बोला -
Shreya नहीं खा रही… तो मैं कैसे खा लूँ?
वो बिना कुछ बोले चला जाता है।
करण पलभर उसे देखता है…
फिर नीचे रखी प्लेट को।
थोड़ी देर तक सोचता रहता है।
फिर धीरे-धीरे प्लेट किनारे कर देता है।
करण(अपने आप से, टूटे दिल से) बोला -
अगर वो नहीं खा रहा… तो मैं भी नहीं।
INT. HOUSE – DIFFERENT ROOMS – LATER
घर में आज अजीब सा सन्नाटा है।
INT. ROOM – SHREYA
श्रेया अकेली बैठी है, खिड़की के पास।
घुटनों को गले लगाकर रो रही है…
पर आवाज़ दबाकर—ताकि कोई सुन न ले।
INT. KABIR’S ROOM
कबीर बिस्तर के कोने पर बैठा है।
चेहरा हथेलियों में छुपा हुआ।
वह जोर से नहीं रोता…
बस आँसू बहते रहते हैं।
INT. KARAN’S ROOM
करण दीवार से टिककर खड़ा है।
आँखें बंद।
वो किसी से लड़ नहीं रहा…
वो खुद से लड़ रहा है।
आज घर में तीन लोग थे…
तीन रोटियाँ बन सकती थीं…
पर तीनों ने कुछ नहीं खाया।
क्योंकि तीनों एक-दूसरे के बिल्कुल पास रहते थे…
और आज तीनों अलग-अलग दर्द में डूब गए थे।
तीनों अपने-अपने कमरों में बैठे हुए—
एक जैसा दर्द लिए हुए—
पर किसी के पास किसी को मनाने की हिम्मत नहीं।
INT. HOUSE – MORNING TO EVENING – MONTAGE
तीनों एक-दूसरे से खफा हैं।
पर तीनों के दिल… बस एक-दूसरे को पुकारते हैं।
INT. KABIR’S ROOM – EVENING
कमरे में हल्का अंधेरा।
कबीर जमीन पर बैठा है, पीठ दीवार से टिकी हुई।
उसकी आँखें थकी हुई, पर दिल उससे भी ज्यादा।
वो फोन उठाता है…
श्रेया का नंबर दिखता है।
उँगली “CALL” बटन पर जाती है—
पर फिर वो फोन वापस रख देता है।
(वॉइसओवर – कबीर) —
Shreya रो रही होगी…
पर मैं भी तो रो रहा हूँ।
काश मैं उसे गले लगा पाता…
पर ego… ये ego मुझे रोक लेता है।
वो एक गहरी साँस लेता है।
उसकी आँखों में अपने बड़े भाई करण की तस्वीर तैरती है—
बचपन के पल…करण द्वारा उसे स्कूल से लाना…
होमवर्क में मदद… गिर जाए तो पहला हाथ करण का ही होता था।
कबीर की आँखें नम हो जाती हैं।
INT. SHREYA’S ROOM – SAME TIME
श्रेया आईने के सामने बैठी है।
चेहरा उतरा हुआ।
दरवाज़ा धीरे से खुलता है—
करण अंदर आता है।
उसके कदम भारी हैं… पर दिल सॉफ्ट।
वो चुपचाप श्रेया के पास बैठता है।
कुछ बोलता नहीं…
बस उसे देखता रहता है।
करण(धीमी, भारी आवाज़ में) बोला -
Shreya… रो मत। मैं यहीं हूँ।
श्रेया उसे देखती है।
पर उसके चेहरे पर डर सा है।
करण यह नोटिस करता है—
उसका चेहरा थोड़ा गिर जाता है।
करण (थोड़ा दुखी, नरमी से) बोला -
मुझसे डर लग रहा है…?
श्रेया धीमी सी हिचकी लेती है।
सिर नहीं हिलाती… पर उसके चेहरे पर जवाब साफ लिखा है—
हाँ, उसे करण के गुस्से ने डरा दिया है।
करण गहरी साँस लेता है।
उसके अंदर पछतावा उमड़ता है।
करण (थोड़ा करीब झुकते हुए, फुसफुसाहट में) बोला-
Shreya… मैं तुम पर गुस्सा नहीं कर सकता।
कल रात जो हुआ… वो मेरी गलती थी।
श्रेया नीचे देखती है।
दिल कहता है— करण सही है।
पर दिमाग अभी भी उस गुस्से को याद करता है।
करण धीरे से उसका हाथ पकड़ता है।
श्रेया झटके से नहीं हटती…
बस थोड़ा सिहर जाती है।
करण बात समझ जाता है।
वो उसका हाथ तुरंत छोड़ देता है।
करण (बहुत धीरे, कॉन्फेस करते हुए) बोला -
मैं तुम्हें फ़ोर्स नहीं करूँगा।
बस… तुम मेरे पास बैठ जाओ।
मेरे लिए उतना ही काफ़ी है।
श्रेया धीरे-धीरे उसके पास सरककर बैठ जाती है।
पर उसे छूती नहीं।
बस थोड़ी दूरी बनाकर।
जैसे वो उसकी मौजूदगी चाहती भी है और डरती भी है।
करण मुस्कुराता है— हल्की सी, टूटी हुई।
INT. KABIR’S ROOM – SAME TIME
कबीर करवट लेता है।
आँखें बंद करता है, पर बेचैनी बढ़ती जाती है।
(वॉइसओवर – कबीर) —
भाई… श्रेया… तुम दोनों मेरे बिना सच में ठीक हो?
या बस दिखावा कर रहे हो?
कबीर अपने तकिये को कसकर पकड़ लेता है।
उसकी सांसें भारी हो जाती हैं।
INT. HALL – LATER
श्रेया और करण नीचे आए हैं।
करण उसके पीछे-पीछे चलता है।
श्रेया धीरे-धीरे चल रही है, जैसे मन कहीं और अटका हो।
कबीर सीढ़ियों से उतरता है और दोनों को साथ देख लेता है।
उसका दिल कस जाता है…
पर चेहरा सख़्त रखता है।
तीनों एक पल के लिए आमने-सामने—
तीनों खफा… पर तीनों टूटे हुए।
कभी‑कभी रिश्ते प्यार से नहीं…
गुस्से, ईगो और दर्द से परखे जाते हैं।
और जो इन इम्तिहानों में भी टिक जाए…
वही रिश्ता सच में अपना कहलाता है।