दक्षराज अघोरी बाबा से कहता है--
> ठिक है ठिक है आप पहले सांत हो जाईए और आप अंदर आईए हम आराम से बात करते है। आप भी काफी थके हुए से लग रहे हैं । आइए अंदर आइए।
इतना बोलकर दक्षऱाज दयाल और अघोरी बाबा अदर चला जाता है। मातंक और त्रिजला ये सब दैख रहा था । त्रिजला कहती है --
> स्वामी अब ये मानव कौन है जो इस प्रकार से विलाप कर रहा था और ये दक्षराज इतना दयालु कैसे हो गया जो उस मानव को अपने हवेली के अंदर ले कर चला जाता है।
त्रिजली की बात पर मांतक कहता है--
> हां त्रिजला मै भी यही सौच रहा था के ये दक्षराज जो इतना दुष्ट और कुटिल है वो अचानक से उस मानव को हवेली से बाहर ना करके उसे सम्मान के साथ घर के भितर कैसे ले कर गया । जबकी वह कह रहा था के इसे बाहर निकालो। त्रिजला हमे इस दक्षराज और इससे जुड़ी सभी मानवो पर दृष्टी रखनी होगी।
त्रिजला कहती है--
हां स्वामी आप यथार्थ कह रहे है। हमे इस दक्षराज पर दृष्टी अवश्य रखनी चाहिए हो ना हो इसी के पास उस मणी का कुछ ज्ञान होगा। परंतु स्वामी वो लोग क्या बाते कर रहे है हमे चल कर सुनना चाहिए ।
मांतक त्रिजला की बात को मानते हुए दोनो ही उड़ कर हवेली के अदर चला जाता है। जहां पर दोनो दैखता है के धोती कुर्ता पहने मानव कागज पर कुछ लिख रहा था। लिखने के बाद अघोरी ने वो कागज दक्षराज को थमा देता है।। जिसे दक्षराज बड़े ध्यान से पड़ रहा था और पड़ते पड़ते वो घबरा जाता है जिससे की उसके माथे से पसीने की बूंदे गिरने लगती है। दक्षराज कागज मे लिखा को पड़कर बहुत घबरा जाता है। पर अपनी घबराहट को दक्षराज छुपाते हुए अघोरी से कहता है--
> आप बिल्कुल भी चिंता ना करें मैं आपका काम कर
दुगां अब आप निश्चंत होकर अपने घर जाईए । अब आपकी परेशानी मतलब मेरी परेसानी मैं सिघ्र ही आपसे मिलुगा।
दक्षराज के इतना कहने पर अघोरी दक्षराज के आगे हाथ जौड़कर कहता है--
> बड़ी कृपा होगी आपकी मालिक ।
इतना बोलकर अघोरी वहां से चला जाता है। अघोरी के जाने के बाद दयाल दक्षराज से पूछता है--
> मालिक कौन था ये आदमी जो इस तरह से आपने उसे अपने हवेली के अंदर आने दिया और आपको उसने ऐसी क्या लिख कर दिया जिसे पड़कर आपके पसीने छुटने लगे ?
दक्षराज बिना कुछ बोले वो कागज जिसमे अघोरी का लिखा हुआ संदेश था दयाल को दे देता है। दयाल कागज को लेकर उसे पड़ने लगता है। कागज को पड़कर दयाल के भी होश उड़ जाता है और वे भी घबरा कर पसीना पसीना हो जाता है। दयाल हकलाते हुए दक्षराज से कहता है---
> म्म म .! मालिक य य...! ये क्या है।
दक्षराज दयाल को इशारे से कुछ भी बोलने से मना करता है । दक्षराज और दयाल हवेली से बाहर आता है और अपनी डर और घबराहट को छुपाते हुए पक्षी रुपी मांतक और त्रिजला को इधर- उधर दैखने लगता है। पर कही पर भी कुछ दिखाई नही देता है। तभी अचानक दक्षराज दैखता है के हवेली के उपर दो पक्षी बैठा है। जिसकी आंखे लाल लाल थी ।
जो दक्षराज और दयाल को ही घुर रहा था । जिसे दैखकर दयाल और दक्षराज अंदर से डर से कांपने लगता है। दक्षराज अपनी डर को काबु मे करते हुए दयाल से कहता है--
> दयाल तु जरा बाजार जा और वहां से कुछ मिट
या मछली जो मिले लेकर आ। काफी दिन हो गए मिट मछली खायै हुए ।
दक्षराज दयाल को बाजार जाने को कहता है। पर दयाल का पैर अकेले जाने के डर से आगे नही बड़ रहा था । पर जैसे ही दयाल कुछ कदम आगे बड़ाता है ! दक्षराज को अकेले रहने का डर सताने लगता है। दक्षराज दयाल को रौकते हुए कहता है--
दयाल रुक जा जरा मैं भी तेरे साथ मे चलता हूँ । मुझे भी कुछ काम याद आ गया ।
इतना बोलकर दौनो ही वहां से बाजार की और चली जाता है़ । रास्ते मे दयाल दक्षराज से पूछता है़ ---
> मालिक ये सब क्या हो रहा है। अब ये नया देत्य हम पर ही अपनी नजर क्यों रख रहा है। जबकी आपके पास तो देत्य का मणी नही बल्की परी का मणी है। तो फिर ये देत्य क्यो हमारा पिछा कर रहा है ? और वो कौन थे जो आपको कागज पर ये बता गए । और लिख कर ये कहा के कल सुबह सिघ्र ही मेरे गुफा पर आ जाना । ये किस गुफा की बात कर रहे थे।
दक्षराज दयाल पर गुस्सा होकर कहता है--
> अरे मुर्ख और कितने गुफा मे मैं और तुम जाते है।
दक्षराज की बात सुनकर दयाल हैरानी से कहता है--
> अच्छा तो इसका मतलब ये चेतन था जो कलके जैसा भेस बदलकर आया था और कल हमे अघोरी बाबा से मिलने को कहा ?
दयाल की बात पर दक्षराज भिन्नाकर कहता है --
> उफ कैसा पागल से पाला पड़ा है। अरे जो अभी अपना भेस बदलकर आया था वो चेतन नही अघोरी बाबा थे । अगर वो अपने असली भेस मे आते तो पक्षी बन कर हम पर नजर रखने वाले देत्य का जो शक हमपर हे़ै वो विश्वास मे बदल जाता और हम सब मारे जाते । अघोरी बाबा का हम पर बड़ी कृपा है के जब उन्हें चेतन से ये सब पता चला तो वे स्वयंम ही मेरे पास मुझसे मिलने चले आए और इस खतरे से अवगत कराया। अब कल ही इसका समाधान वे जरुर करेगें। और इसिलिए मैं हवेली से दुर तुम्हारे साथ बहाने से यहां आ गया ताकी कुछ दैर के लिए हम उस देत्यों से दुर रहे।
दयाल अघोरी बाबा का नाम सुनकर हैरान हो जाता है क्योकी वह उन्हें बिलकुल भी पहचान नही पाया था। उधर हवेली के उपर बैठे मांतक और त्रिजला से कहता है--
> त्रिजला मुझे इस मानव पर शंका हो रहा है जिस तरह से सबसे बात करती है ऐसा लगता है जेसे इसके
पास ना जाने कितने राज छुपा है और इससे मिलने आने वाला सभी मानव भी उसी तरह है। और आज जो आए थे उसे दैखकर तो ऐसा लग रहा था जैसे वह कोई साधारण मानव नही बल्की कोई साधक थे । मुझे उन्हें दैखकर ऐसा आभास हुआ ।
मांतक कि बात बात पर त्रिजला कहती है---
> अगर आपको ऐसा आभास हुआ तो वो सत्य ही होगा । वो जरूर कौई साधक या योगी मानव ही होंगे।
इसिलिए मैं आपसे कहती हूँ के इस मानव को उठाकर लेकर चलते है और उससे डरा कर पूछेगें तो वो जरुर बता देगा।
त्रिजला की बात पर मातंक भी अपनी सहमती देते हुए कहता है --
> हां त्रिजला मुझे ऐसा ही लगता है परंतु हम कुछ करे इससे पहले हमे इसकी सुचना मित्र कुंम्भन को देना पड़ेगा । उसके बाद ही हम कुछ करेगें ।
त्रिजला मांतक की बात का समर्थन करते हुए कहती है--
> जैसी आपकी इच्छा स्वामी । तब हमे और विलम्ब नही करना चाहीए और आपके मित्र के पास सिघ्र ही जाकर मिलना पड़ेगा। ताकी हम अपना कार्य पूर्ण कर सके ।
> ठीक है तो फिर सिघ्र चलो ।
मांतक के इतना बोलने के बाद दौनो ही वहा से गायब हो जाता है। उधर जंगल मे कुंम्भन वर्शाली के शक्ती प्रहार से अभी तक ठीक नही हो पाया था । तो कुंम्भन अपनी शक्ती को और बड़ाने के लिए राक्षसी यज्ञ करने की तैयारी कर रहा था। जिसके लिए वह सामग्री जुटा रहा था।
सामग्री जुटा लेने के बाद कुम्भन यज्ञ कुण्ड के पास बैठ जाता है। कुंम्भन पहले सामने रखी लाल मिर्च और मानव के हड्डी से बनी माला को धारण करता है। यज्ञ कुण्ड के एक तरफ मानव के रक्त रखा था , मानव कंकाल , मानव खोपड़ी , कुछ जानवर के हड्डी और खोपड़ियां । कुंम्भन पहले अपने माथे पर काला तिलक करता है।
और फिर पास मे रखी एक धारदार चाकु उठाता है और अपनी दाहिना हाथ के अंगूठे पर चाकु से एक घांव लगाता है जिससे कुंम्भन के हाथ से रक्त बहने लगता है । और कुंम्भन अपने बहते रक्त को यज्ञ कुण्ड पर कुछ बूंदे गिरा कर कुछ मंत्र कहता है --
"ॐ रक्ताग्नि स्वाहा, दैत्य शक्ति जागृतम्।
मम बलिदानेन, सर्वविघ्न विनाशाय प्रकट्यताम्॥"
"ॐ काली रुधिर शक्ति, मम रक्ते समाहित।
यज्ञाग्नौ स्वीकुरु, दैत्य बलं प्रकट्यताम्॥"
"ॐ रुधिरं मम अर्पितम्, अग्नि साक्षी भव।
अंधकार शक्ति उद्भव, मम आदेशे जागृत भव॥"
जिससे यञ कुण्ड मे अग्नी प्रज्जवलित हो जाता है। कुंम्भन पहले मानव खोपडयी को लेकर उस यज्ञ कुण्ड के चारों तरफ घुमाता है और फिर मानव रक्त को उस खोपड़ी के उपर धिरे धिरे डालने लगता है। जिससे उस मानव खोपड़ी मे जान आ जाती है। और वो खोपड़ी सारा रक्त पी जाता है। और खिटखिटा कर हंसने लगता है।
कुंम्भन बिना रुके मंत्र बोले जा रहा था। और जैसे ही अपनी अंगुठे के रक्त का कुछ बूंदे उस खोपड़ी के उपर डालता है तो वह खोपड़ी अगारे जैसा लाल दहकने लगता है और वो खोपड़ी हवा मे उठकर लटकने लगता है और यज्ञ कुण्ड के चारों और तेज गती से घुमने लगता है।
वह इतना तेजी से घुम रहा था के उसके घुमने से हवा मे सांय सांय जैसी आवाज आने लगता है और फिर वो खोपड़ी अचानक से रुक जाता है और कुंम्भन के मुख के पास आकर जोर जोर से खोफनाक हसी से हंसने लगता है और बोलने लगता है।
> हा हा हा हा ....! महाराज कुंम्भन की सेवा मे नारंग देत्य प्रस्तुत है मेरे मालिक ! क्या हुआ मेरे मालिक ! आपने मुझे क्यो याद किया ? आप मुझे सिघ्र ही बताए मैं आपका सेवा करने के लिए व्याकुल हो रहा हूँ मालिक । बताईए मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ ।
To be continue....1094