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Chapter 1: आख़िरी लोकल

रात के 11:52।

ट्रेन छूटने ही वाली थी।

अंगद दौड़ते हुए प्लेटफ़ॉर्म पर पहुँचा।
फोन कंधे और कान के बीच दबा हुआ—

“बस 2 मिनट… मैं train में हूँ… भेज दूँगा।”

दरवाज़े बंद होने लगे।

वो आख़िरी सेकंड में कूदकर अंदर घुसा।




अंदर घुसते ही—

तेज़ झटका

किसी से टक्कर हुई।

एक लड़की का हाथ उसके कंधे से टकराया…
उसका balance बिगड़ा।

वो सीधे दरवाज़े की तरफ गिरने लगी।




Reflex में—

 अंगद ने उसका हाथ पकड़ लिया।

ज़ोर से।




दो सेकंड।

बस दो सेकंड।




ट्रेन speed पकड़ चुकी थी।
बाहर अंधेरा दौड़ रहा था।

लड़की का आधा शरीर दरवाज़े की तरफ झुका हुआ…
हवा तेज़… खतरनाक।




“छोड़ना मत…” उसने धीमे से कहा।

आवाज़ शांत थी… पर अजीब तरह से steady।




अंगद ने उसे खींचकर अंदर कर लिया।

वो संभल गई।




कुछ सेकंड दोनों चुप।

सिर्फ ट्रेन की आवाज़।




“Thanks,” अंगद ने casually कहा, जैसे कुछ बड़ा हुआ ही नहीं।

लड़की ने उसकी तरफ देखा।

सीधा। बिना blink किए।




“इस बार पकड़ लिया…”




अंगद थोड़ा confused।

“मतलब?”

लड़की हल्का सा मुस्कुराई।

“कुछ नहीं।”




वो सामने वाली सीट पर बैठ गई।

अंगद ने भी खुद को normal दिखाने की कोशिश की।

फोन फिर कान पर—

“हाँ… बोलो…”




पर अब उसका ध्यान कॉल में नहीं था।




कुछ सेकंड बाद—

“तुम हमेशा late आते हो क्या?”

लड़की ने पूछा।


अंगद ने छोटा सा जवाब दिया—

“आज ही late हुआ हूँ।”

“नहीं,” उसने सिर हिलाया,

“तुम usually last moment पर ही चढ़ते हो।”




अंगद ने भौंहें सिकोड़ दीं।

“तुम्हें कैसे पता?”




लड़की खिड़की के बाहर देखने लगी।

“बस… देखा है।”




अंगद को अजीब लगा।

उसे याद नहीं कि उसने इसे पहले कभी देखा हो।




“वैसे मैं अंगद,” उसने कहा।

लड़की ने तुरंत जवाब नहीं दिया।

कुछ सेकंड बाद—

“मीरा।”




ट्रेन आगे बढ़ती रही।




दरवाज़े के पास फिर हलचल हुई।

किसी का पैर फिसला…
लोग चिल्लाए…
फिर सब normal।




मीरा की नज़र वहीं अटक गई।

इस बार ज़्यादा देर के लिए।




“हर बार यहीं होता है…” उसने धीरे से कहा।




अंगद ने सुना।

“क्या?”



मीरा ने उसकी तरफ देखा।

इस बार उसकी आँखों में वो शांति नहीं थी।

कुछ और था।



“कुछ नहीं।”



अगला स्टेशन आया।

ट्रेन धीमी हुई।

मीरा उठी।




दरवाज़े के पास पहुँचकर वो रुकी।

फिर पीछे मुड़ी।



“अंगद…”

“हाँ?”



“अगली बार…”


“थोड़ा पहले आना।”




दरवाज़े खुले।

भीड़ आई।

मीरा उसमें खो गई।




अंगद कुछ सेकंड वहीं खड़ा रहा।




फिर धीरे-धीरे बैठ गया।

फोन हाथ में था…

पर इस बार उसने call नहीं किया।




बस एक ही बात दिमाग में घूम रही थी—

 “इस बार पकड़ लिया…”




ट्रेन अंधेरे में आगे बढ़ती रही।

और इस बार…

कुछ सच में शुरू हो चुका था।



अंगद कुछ देर वैसे ही बैठा रहा।

ट्रेन आगे बढ़ रही थी…
पर उसका दिमाग पीछे अटका हुआ था।

 “इस बार पकड़ लिया…”

ये लाइन बार-बार repeat हो रही थी।


उसने खुद को झटका।

“Overthinking…” उसने मन ही मन कहा।

फोन फिर unlock किया।

Mail खोला… typing शुरू की—

पर 2 line लिखकर ही रुक गया।



दरवाज़े की तरफ देखा।

खाली।

सब normal।



“बस coincidence था…”

उसने खुद को convince किया।



अगला स्टेशन आया।

कुछ लोग उतरे… कुछ चढ़े।

एक बुज़ुर्ग आदमी उसके सामने वाली सीट पर बैठ गया।

सब कुछ… बिल्कुल normal।



पर फिर—
 वही लड़की अंदर आई।




अंगद का दिल एक सेकंड के लिए रुक सा गया।

“ये…?”



मीरा।



वो सीधे आई… और उसी सीट पर बैठ गई जहाँ पहले बैठी थी।

जैसे कुछ हुआ ही नहीं।


अंगद उसे घूरने लगा।

“तुम… उतरी नहीं थी?”




मीरा ने हल्का सा सिर तिरछा किया।

“कब?”



“अभी… अभी तो तुम—”

अंगद रुक गया।

उसे खुद अपनी बात अजीब लगने लगी।



मीरा ने बिना react किए पूछा—

“तुम ठीक हो?”



“हाँ… मैं—”

अंगद confused हो गया।

उसने तुरंत आसपास देखा।

कोई भी reaction नहीं।

जैसे कुछ हुआ ही नहीं।



“तुम्हारा stop नहीं था?” अंगद ने फिर पूछा।



“नहीं,” मीरा ने calmly कहा,
“मेरा stop अभी नहीं आया।”



Silence।



अंगद ने phone नीचे रख दिया।

अब ignore करना possible नहीं था।



“तुम पहले भी मिली हो ना मुझसे?”

उसने सीधा पूछा।



मीरा ने इस बार उसकी आँखों में देखा।

थोड़ा ज़्यादा देर तक।



“शायद,” उसने कहा।



“शायद मतलब?”




“तुम्हें क्या लगता है?” उसने उल्टा सवाल किया।



अंगद irritate हो गया।

“मुझे कुछ नहीं लगता, बस—”



ट्रेन अचानक ज़ोर से हिली।


दरवाज़े के पास—

 फिर वही scene

किसी का balance बिगड़ा
लोग चिल्लाए
एक सेकंड का chaos

फिर… सब normal


अंगद freeze हो गया।


“ये… अभी हुआ था…”

उसने धीरे से कहा।


मीरा उसे देख रही थी।

इस बार बिना मुस्कुराए।


“हाँ,” उसने कहा,
“हर बार होता है।”




अंगद का गला सूख गया।



“हर बार… मतलब?”



मीरा थोड़ा आगे झुकी।

उसकी आवाज़ धीमी थी—




“तुम notice करते हो…”

pause…

“पर react नहीं करते।”




अंगद के दिमाग में flash—

उसका हाथ
दरवाज़ा
वो गिरती हुई



उसने झटके से सिर हिलाया।

“नहीं… अभी तो मैंने—”



“हाँ,” मीरा ने बीच में रोका,
“इस बार किया।”



Silence।



ट्रेन tunnel में घुसी।

कुछ सेकंड के लिए पूरा अंधेरा।



और उसी अंधेरे में—

मीरा की आवाज़ आई:



“देखते हैं… अगली बार क्या करते हो।”



Light वापस आई।

अंगद ने तुरंत सामने देखा।


सीट खाली थी।




मीरा गायब।




इस बार—

कोई भीड़ नहीं आई थी।

कोई distraction नहीं।




बस…

वो थी… और अब नहीं थी।



अंगद धीरे-धीरे खड़ा हुआ।

दरवाज़े तक गया।

बाहर देखा।

अंधेरा।




दिल तेज़ धड़क रहा था।




“ये हो क्या रहा है…”




ट्रेन आगे बढ़ती रही।

और पहली बार—

 अंगद को लगा, ये रात normal नहीं है।