रात के सन्नाटे में जब शहर की रफ्तार धीमी पड़ जाती है। तब बहुत सी बातें ऐसी लगती हैं जो दिन की रोशनी में समझ नहीं आतीं। कुछ यादें। कुछ अनकहे एहसास। और कुछ चेहरे जो नींद के रास्ते दिल में उतर आते हैं।
दीपिका के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा था।
वह एक साधारण सी लड़की थी। उम्र करीब चौबीस साल। एक छोटे से प्राइवेट स्कूल में पढ़ाती थी। दिन भर बच्चों की आवाजें। टीचर रूम की बातें। घर की जिम्मेदारियां। मां की दवा। छोटे भाई की फीस। इन सबके बीच वह अपने लिए बहुत कम जीती थी। लेकिन रात होते ही उसका दूसरा संसार शुरू हो जाता था।
हर रात एक ही सपना।
एक अजनबी लड़का।
लंबा। शांत चेहरा। हल्की सी मुस्कान। आंखों में एक अजीब सी पहचान। जैसे वह उसे बहुत पहले से जानता हो। जैसे कोई भूला हुआ रिश्ता फिर से सांस ले रहा हो।
सपना भी हर बार लगभग एक जैसा होता था।
एक पुराना पार्क। पेड़ों की सरसराहट। पीली लाइट का एक खंभा। बेंच पर बैठा वह लड़का। और दीपिका। दोनों के बीच बहुत कम शब्द होते थे। लेकिन उनके मौन में बहुत कुछ कहा जा चुका होता था।
पहली बार दीपिका ने इस सपने को सिर्फ सपना समझा।
दूसरी बार उसने इसे मन का वहम माना।
तीसरी बार उसे बेचैनी हुई।
फिर यह सिलसिला रोज का हो गया।
कभी वह लड़का दूर से उसे देखता।
कभी बस इतना कहता। तुम आ गई।
कभी पूछता। आज देर क्यों हुई।
कभी वह मुस्कुराकर बस चुप रह जाती।
और कभी उसकी आंखों से अचानक आंसू निकल पड़ते। बिना वजह। बिना दुख के। बस जैसे कोई पुरानी पीड़ा भीतर से बह निकली हो।
दीपिका सुबह उठती तो सिर भारी होता। दिल खाली। और मन में एक अनजाना खिंचाव बना रहता। उसने बहुत बार कोशिश की कि इस सबको भूल जाए। लेकिन जो सपना बार बार लौटे वह भुलाया कहां जाता है।
एक दिन स्कूल में लंच के समय उसकी सहकर्मी नेहा ने उससे पूछा।
तू इतनी खोई खोई क्यों रहती है आजकल?
दीपिका ने मुस्कुराने की कोशिश की।
कुछ नहीं। बस नींद ठीक नहीं आ रही।
नेहा हंस पड़ी।
नींद ठीक नहीं आ रही या कोई सपना परेशान कर रहा है?
दीपिका ने उसे देखा।
क्यों?
नेहा ने आंखें नचाईं।
क्योंकि तेरा चेहरा वही बता रहा है जो तू बोल नहीं रही।
दीपिका चुप रही।
नेहा ने धीरे से कहा।
अगर कोई बात मन में हो तो बता दे। वैसे भी तू इतनी सीधी है कि झूठ बोलना तुझसे नहीं होता।
दीपिका ने लंबी सांस ली।
हर रात एक ही सपना आता है।
नेहा ने उत्सुकता से पूछा।
कैसा सपना?
दीपिका ने थोड़ा झिझकते हुए सब बता दिया। पार्क। बेंच। वह लड़का। उसकी बातें। और हर बार दिल में उठने वाला एक अजीब सा अपनापन।
नेहा कुछ देर चुप रही। फिर बोली।
यह तो बस कोई पुरानी सोच होगी। या फिल्मों का असर।
दीपिका ने सिर हिला दिया।
शायद।
लेकिन उसके भीतर वह जानती थी कि बात इतनी साधारण नहीं है।
क्योंकि जो चेहरा वह सपने में देखती थी। उसे वह किसी और की तरह नहीं लगता था। वह सिर्फ अच्छा नहीं था। उसमें एक ऐसी खामोशी थी जो उसके दिल की खामोशी से मिलती थी। जैसे दो अलग जगहों पर टूटी हुई चीजें आपस में जुड़ रही हों।
उस रात दीपिका ने तय किया कि वह कल से अपनी दिनचर्या बदलेगी। जल्दी सोएगी। मोबाइल कम देखेगी। दिमाग को थकाएगी। शायद सपना कम हो जाए।
लेकिन रात को जैसे ही वह सोई। वही पार्क। वही लाइट। वही बेंच।
और वही लड़का।
इस बार वह पहले से ज्यादा साफ दिख रहा था। हल्की नीली शर्ट। सफेद घड़ी। आंखों के नीचे छोटी सी थकान। लेकिन चेहरा फिर भी शांत।
वह बोला।
तुमने आने में बहुत देर कर दी।
दीपिका ने घबराकर पूछा।
तुम कौन हो?
वह मुस्कुराया।
इतनी जल्दी भूल गई?
मैं भूल जाऊं। यह कैसे हो सकता है?
उसकी आवाज में ऐसी पीड़ा थी कि दीपिका का दिल कांप गया।
उसने फिर पूछा।
मैं तुम्हें जानती हूं क्या?
लड़के ने बेंच से उठकर कहा।
शायद बहुत पहले से।
दीपिका ने एक कदम आगे बढ़ाया।
नाम बताओ।
वह कुछ पल चुप रहा। फिर बोला।
संतोष।
नाम सुनते ही दीपिका के भीतर एक अजीब सी कंपकंपी दौड़ गई। जैसे किसी ने बहुत दूर से उसके नाम की घंटी बजाई हो।
संतोष ने धीरे से कहा।
अब भी कुछ याद नहीं आया?
दीपिका ने माथा पकड़ लिया।
मुझे सच में समझ नहीं आ रहा।
संतोष ने पास आकर कहा।
समझना जरूरी नहीं। याद करना जरूरी है।
और फिर सपना टूट गया।
दीपिका हड़बड़ाकर उठ बैठी। रात के तीन बज रहे थे। कमरे में अंधेरा था। खिड़की से आती हवा परदे हिला रही थी। उसका दिल इतनी तेज धड़क रहा था जैसे अभी भी वह उस पार्क में खड़ी हो।
अगली सुबह उसने नाश्ता करते हुए मां से पूछा।
मां। हमारे घर के पास वाले पुराने पार्क का नाम क्या है?
मां ने हैरानी से देखा।
कौन सा पार्क?
वही जो बस स्टैंड के पीछे है।
मां सोच में पड़ गईं।
वह पुराना पार्क। हां। शिव पार्क। पर तू एकदम से क्यों पूछ रही है?
दीपिका ने जल्दी से कहा।
बस ऐसे ही।
मां ने उसे गौर से देखा। फिर बोलीं।
उस जगह से दूर ही रहना। वहां अब कोई ठीक से जाता भी नहीं।
क्यों?
मां ने हल्का सा चेहरा सिकोड़ा।
बहुत पुरानी बात है। कुछ साल पहले वहां एक लड़का दुर्घटना में मर गया था।
दीपिका के हाथ से चम्मच लगभग गिर गया।
क्या नाम था उसका?
मां ने याद करने की कोशिश की।
संतोष शायद। हां। संतोष नाम था।
दीपिका को लगा जैसे जमीन एक पल को हिल गई हो।
वह तुरंत खड़ी हो गई।
क्या हुआ? मां ने पूछा।
कुछ नहीं। स्कूल देर हो जाएगी।
वह बिना कुछ और बोले बाहर निकल गई।
रास्ते भर उसके दिमाग में सिर्फ एक ही नाम घूम रहा था। संतोष। वही नाम जो उसने सपने में सुना था। वही नाम जिसे सुनते ही उसके शरीर में अजीब सी सिहरन उठी थी।
क्या यह सिर्फ संयोग था?
या फिर उसका सपना किसी ऐसी सच्चाई से जुड़ा था जिसे वह अब तक भूल चुकी थी।
उस दिन स्कूल में पढ़ाते पढ़ाते उसका ध्यान बार बार भटकता रहा। बच्चों ने कई बार टोका। नेहा ने भी नोटिस किया।
तू ठीक है ना?
दीपिका ने बेमन से हां कहा।
लेकिन सच में वह ठीक नहीं थी।
शाम को घर लौटकर उसने सबसे पहले पुरानी अलमारी की दराजें खोलीं। बचपन की कॉपियां। पुराने कार्ड। कुछ फोटो। और एक धूल भरी डायरी।
वह डायरी उसकी कॉलेज के दिनों की थी। उसने उसे खोला। पहले कई पन्ने खाली थे। फिर एक जगह कुछ अजीब लिखावट दिखी। जैसे किसी ने हाल ही में नहीं बल्कि बहुत पहले जल्दी जल्दी लिखा हो।
उस पन्ने पर एक नाम था।
संतोष।
नीचे कुछ अधूरे वाक्य थे।
अगर वह सब कुछ याद कर ले तो शायद मैं भी जी सकूं।
उसने पन्ना पलटा। अगले पन्ने पर एक स्केच था। एक लड़के का चेहरा। वही चेहरा। वही आंखें। वही मुस्कान।
दीपिका की सांस रुक गई।
वह लड़खड़ाती हुई कुर्सी पर बैठ गई।
यह क्या था?
यह स्केच उसने कब बनाया?
और अगर बनाया था तो उसे क्यों याद नहीं?
उसी डायरी में कुछ और पन्ने थे। उनमें अलग अलग छोटी छोटी पंक्तियां थीं।
आज फिर वही सपना आया।
वह मुझे पहचान नहीं रही।
मैं उसे सब याद दिलाना चाहता हूं।
हम हमेशा साथ थे।
लेकिन एक हादसे ने सब तोड़ दिया।
और फिर एक पन्ने पर लिखा था।
अगर मेरी आवाज अब भी उसके भीतर बची है तो वह मुझे जरूर सुनेगी।
दीपिका के हाथ कांपने लगे।
वह और पन्ने पलटती गई।
कुछ जगह तारीखें थीं। कुछ जगह अधूरे नोट थे। एक जगह लिखा था।
संतोष मेरे बचपन का दोस्त था। नहीं। उससे भी बढ़कर। हम पड़ोसी थे। साथ बड़े हुए। एक ही स्कूल। एक ही मोहल्ला। हर शाम पार्क में मिलना। वह हमेशा कहता था कि एक दिन मैं शहर छोड़कर भी उसे याद करूंगी। लेकिन फिर एक हादसा हुआ। मैं बच गई। वह नहीं बचा।
दीपिका का सिर घूम गया।
यह सब कैसे भूल गई थी?
उसने आखिरी पन्ना खोला।
उस पर लिखा था।
अगर मैं मर भी जाऊं तो शायद मेरा कोई हिस्सा उसके सपनों में जिंदा रहे। अगर वह मुझे हर रात देख रही है तो इसका मतलब है कि हमारा रिश्ता खत्म नहीं हुआ।
दीपिका की आंखों से आंसू बहने लगे।
अब उसे कुछ याद आने लगा था। धुंधली तस्वीरें। बारिश वाला दिन। स्कूली बैग। मोहल्ले की गली। एक लड़का जो उसकी साइकिल पकड़कर दौड़ रहा था। पार्क की बेंच। और फिर एक तेज आवाज। चीख। अंधेरा।
उसके सिर में दर्द उठने लगा।
उसने हथेली से कनपटी दबाई।
अब याद आ रहा था।
वह और संतोष बचपन के दोस्त थे। बहुत अच्छे दोस्त। लेकिन धीरे धीरे वही दोस्ती किसी गहरे रिश्ते में बदल गई थी। दोनों ने कभी यह सब बड़े शब्दों में नहीं कहा था। लेकिन उनके व्यवहार में सब कुछ साफ था। संतोष उसके लिए इंतजार करता। वह उसकी किताबें समेटता। वह उसके गुस्से को मुस्कान से रोक देता। और दीपिका को उसकी मौजूदगी सबसे सुरक्षित लगती।
फिर एक दिन शहर में मेला लगा था।
दोनों शाम को पार्क से होकर घर लौट रहे थे।
बारिश शुरू हो गई थी।
संतोष ने दीपिका का हाथ पकड़ा।
भागो।
और वे दौड़े थे।
सड़क पर पानी। फिसलन। कार का तेज हॉर्न। एक मोड़। और फिर सब खत्म।
संतोष ने उसे धक्का दिया था।
खुद सामने आ गया था।
और एक तेज टक्कर में गिर पड़ा था।
दीपिका ने रोते हुए अपने सिर को दोनों हाथों में दबा लिया।
उस पल के बाद बहुत कुछ टूट गया था।
पर दिमाग ने बाकी सब छिपा दिया था। दर्द इतना गहरा था कि याददाश्त ने उसे बचाने के लिए ताले लगा दिए थे।
अब वर्षों बाद वे ताले सपनों के जरिए खुल रहे थे।
दीपिका सारी रात रोती रही।
सुबह होते ही वह उस पुराने पार्क में चली गई।
शिव पार्क।
वही जगह जहां उसका और संतोष का जीवन किसी मोड़ पर अधूरा रह गया था।
पार्क लगभग खाली था। कुछ बूढ़े लोग टहल रहे थे। बच्चे झूले पर थे। कोने में सूखे पत्ते जमा थे। बेंच पुरानी थी। लाइट का खंभा अब भी वहीं था। लेकिन सब कुछ पहले से ज्यादा धुंधला और उदास लग रहा था।
दीपिका बेंच के पास खड़ी रही।
दिल जोर जोर से धड़क रहा था।
और तभी उसे लगा जैसे हवा ठहर गई हो।
उसके पीछे किसी ने कहा।
तुम आ गई।
वह तेजी से पलटी।
संतोष।
वही चेहरा।
वही आंखें।
वही शांत दर्द।
दीपिका के होंठ कांप गए।
तुम... तुम हो?
संतोष हल्की मुस्कान के साथ बोला।
अब तो मान गई।
दीपिका की आंखों से आंसू बह निकले।
यह सच है। तुम सच में हो।
संतोष ने धीरे से कहा।
मैं सच था भी। और शायद अब भी हूं। बस एक अलग तरह से।
दीपिका रोते हुए बोली।
मैंने तुम्हें भूल कैसे गई?
संतोष ने नर्म आवाज में कहा।
तुमने नहीं। तुम्हें भुला दिया गया। तुम्हारे अपने मन ने। शायद तुम्हें बचाने के लिए।
दीपिका ने पूछा।
यह सब कैसे हो रहा है?
संतोष ने उस पुरानी बेंच की तरफ इशारा किया।
बैठो।
वह बैठ गई।
संतोष उसके सामने खड़ा रहा।
उसने कहा।
जिस रात हादसा हुआ था। तुम बच गई थी। लेकिन तुम्हारे भीतर का डर इतना गहरा था कि दिमाग ने सब कुछ अलग रख दिया। तुम्हारे सपने वह रास्ता बने जिससे मैं तुम तक पहुंच सका। मैं जानता था कि तुम पूरी तरह भूल जाओगी। इसलिए मैं हर रात आया। ताकि तुम मुझे खो न दो।
दीपिका ने सिर झुका लिया।
मैंने तुम्हें बहुत याद किया।
संतोष ने धीरे से कहा।
मैंने भी।
दीपिका ने पूछा।
तुम यहां क्यों हो? अभी भी क्यों?
संतोष ने आसमान की तरफ देखा।
क्योंकि कुछ रिश्ते सिर्फ सांसों से नहीं चलते। कुछ यादों से चलते हैं। कुछ लोगों को मरने के बाद भी किसी के मन से बाहर नहीं किया जा सकता। शायद मैं उन्हीं में से हूं।
दीपिका की आवाज टूट गई।
मैं तुम्हारे बिना जिंदा कैसे रही?
संतोष ने मुस्कुराकर कहा।
तुम जिंदा रही। यही काफी था।
दीपिका ने रोते हुए कहा।
नहीं। काफी नहीं था।
संतोष कुछ देर चुप रहा। फिर बोला।
मुझे पता है। लेकिन अब तुमने मुझे याद कर लिया है। यही मेरा लौट आना था।
दीपिका ने उसे ध्यान से देखा।
क्या तुम फिर जाोगे?
संतोष की आंखों में एक गहरी चमक आई।
यह शरीर नहीं है। यह बस एक आखिरी रूप है। एक आखिरी मुलाकात।
दीपिका कांप गई।
नहीं।
संतोष उसके पास आकर कहा।
दीपिका। सुनो।
उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया। दीपिका ने कांपते हाथों से उसका हाथ पकड़ लिया। उसका स्पर्श ठंडा नहीं था। बल्कि बहुत हल्का गर्म था। जैसे किसी सुबह की धूप का पहला छुआ हुआ हिस्सा।
संतोष ने कहा।
मैं चाहता था कि तुम डर के साथ न जियो। अपराधबोध के साथ न जियो। उस दिन जो हुआ उसमें तुम्हारी गलती नहीं थी। तुमने मुझे नहीं खोया। मैंने बस एक मोड़ पर तुम्हें आगे बढ़ने को मजबूर किया था। और वही मेरी मोहब्बत थी।
दीपिका ने रोते हुए पूछा।
तो क्या प्यार हमेशा ऐसा ही होता है?
संतोष ने कहा।
कुछ प्यार मिलकर जीते हैं। कुछ अलग होकर भी निभाते हैं।
यह सुनकर दीपिका के दिल में ऐसी पीड़ा उठी कि वह फूटकर रो पड़ी। वह चाहती थी कि समय पीछे लौट जाए। वह चाहती थी कि वे दोनों फिर से गली के उसी मोड़ पर खड़े हों। बारिश हो रही हो। संतोष उसका हाथ पकड़कर बोले। भागो। और वह फिर से उसके साथ दौड़ पड़े। इस बार कोई गाड़ी न आए। कोई टक्कर न हो। कोई मृत्यु न हो। कोई सपना न हो। सिर्फ जीवन हो।
लेकिन जीवन वैसे नहीं चलता।
संतोष ने उसके आंसू पोंछने के लिए हाथ बढ़ाया। फिर रुक गया। शायद उसकी सीमा वहीं तक थी।
उसने कहा।
मुझे याद रखो। पर दुख में नहीं। मुस्कान में।
दीपिका ने सिर हिला दिया।
मैं कैसे भूलूं?
संतोष ने बेंच के पीछे लगे पेड़ की तरफ इशारा किया।
वह देखो।
दीपिका ने देखा।
पेड़ की एक शाखा पर सफेद फूल खिले थे। सिर्फ वहीं। बाकी पेड़ सूखा था।
संतोष ने कहा।
हम दोनों ने एक बार कहा था कि अगर कभी कोई एक फूल भी सिर्फ सूखी शाखा पर खिल जाए तो समझना कोई अधूरी चीज भी पूरी हो सकती है।
दीपिका को वह पुरानी बात याद आई।
वह मुस्कुराई और बोली।
तुमने कभी नहीं बताया कि तुम्हें ऐसी बातें कैसे सूझती थीं।
संतोष ने हंसते हुए कहा।
क्योंकि तुम सुनती नहीं थी। सिर्फ महसूस करती थी।
दीपिका भी हल्का सा हंसी। और उसी पल उसे लगा जैसे वर्षों बाद उसकी छाती का बोझ थोड़ा कम हुआ हो।
संतोष धीरे धीरे पीछे हटने लगा।
दीपिका घबरा गई।
मत जाओ।
संतोष ने कहा।
जाना तो है।
नहीं।
दीपिका खड़ी हो गई।
मैं अब तुम्हें फिर खो नहीं सकती।
संतोष ने बहुत नरमी से कहा।
तुमने मुझे खोया नहीं था। तुमने मुझे अपने भीतर रख लिया था। और अब शायद मुझे जाने देना चाहिए।
दीपिका कांपती आवाज में बोली।
मैं क्या करूं अब?
संतोष ने मुस्कुराकर कहा।
जियो।
बस।
और अपनी जिंदगी को इतना खूबसूरत बनाओ कि अगर मैं कहीं से देखूं तो गर्व महसूस करूं।
दीपिका ने रोते हुए कहा।
मैं कोशिश करूंगी।
संतोष ने आखिरी बार उसकी तरफ देखा।
कोशिश नहीं। करोगी।
फिर उसका चेहरा हवा में हल्का होने लगा। जैसे सुबह की धुंध धूप में घुलती है। उसकी आकृति धीरे धीरे फीकी पड़ने लगी।
दीपिका चीख उठी।
संतोष।
आवाज गूंजती रही।
संतोष ने बहुत दूर से आखिरी बार कहा।
अब मैं तुम्हारे सपनों में नहीं आऊंगा। क्योंकि अब तुम्हें मेरी जरूरत नहीं। अब तुम खुद को याद कर चुकी हो।
और वह गायब हो गया।
पार्क में फिर वही आम सा शोर लौट आया। बच्चों की हंसी। पत्तों की सरसराहट। दूर किसी रिक्शे की घंटी। दीपिका बेंच पर बैठ गई। उसके हाथ में कुछ नहीं था। लेकिन दिल में बहुत कुछ था।
दोपहर होने तक वह वहीं बैठी रही।
फिर घर लौटी।
मां ने पूछा।
इतनी देर कहां रह गई थी?
दीपिका ने मुस्कुराकर कहा।
पुराने पार्क में।
मां घबरा गईं।
अकेले?
दीपिका ने सिर हिलाया।
हां। लेकिन अब सब ठीक है।
मां ने उसकी आंखों को देखा। पहली बार उन्हें लगा कि उनकी बेटी के भीतर कोई भारी बोझ कम हो गया है।
कुछ दिन बीते।
दीपिका के सपने बंद हो गए।
पहले उसे डर लगा।
फिर खालीपन।
फिर धीरे धीरे उसने समझा कि खालीपन और शांति में फर्क होता है। यह खालीपन नहीं था। यह शांति थी।
उसने फिर से पढ़ाना शुरू किया।
बच्चों पर ध्यान देने लगी।
नेहा ने एक दिन पूछा।
अब तू पहले जैसी लग रही है। क्या हुआ?
दीपिका ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा।
कभी कभी कुछ लोग हमारे जीवन में इतने गहरे उतर जाते हैं कि वे चले जाने के बाद भी हमें जीना सिखाते रहते हैं।
नेहा ने उसकी तरफ देखा।
यह तो बहुत भारी बात बोल दी तूने।
दीपिका हल्के से मुस्कुराई।
भारी नहीं। बस सच।
उसने अपनी डायरी फिर से खोली। इस बार उसने पुराने पन्नों के बाद एक नया पन्ना लिखा।
संतोष।
आज मैं तुम्हें डर के साथ नहीं याद कर रही। आज मैं तुम्हें प्यार के साथ याद कर रही हूं। तुम मेरे सपनों में आए। मेरे भीतर की टूटी जगहों को जोड़ा। और फिर चुपचाप चले गए। लेकिन तुम सच में गए नहीं। तुम अब भी उस हवा में हो जो मेरे चेहरे को छूती है। उस बेंच में हो जहां हम मिले थे। उस फूल में हो जो सूखी शाखा पर खिल गया। और शायद मेरे हर उस हंसी में हो जो अब मैं बिना डर के जी पाऊंगी।
उसने पेन रखा।
खिड़की से बाहर देखा।
शाम की हल्की रोशनी कमरे में फैल रही थी।
और उसे लगा जैसे कहीं बहुत दूर कोई मुस्कुरा रहा है।
उस रात दीपिका जल्दी सो गई।
इस बार कोई सपना नहीं आया।
लेकिन नींद में उसे एक हल्की सी आवाज सुनाई दी।
तुम आ गई।
वह मुस्कुराई।
और मन ही मन बोली।
हां। अब मैं आ गई हूं। पूरी तरह से।
कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
कभी कभी असली प्रेम वही होता है जो मिलने के बाद भी किसी व्यक्ति को जीना सिखाए। और जो चला जाए वह भी भीतर एक रोशनी छोड़ जाता है।
दीपिका ने उस रोशनी को अपनी जिंदगी बना लिया।
और इस तरह एक सपना। एक अजनबी चेहरा। और एक अधूरी मुलाकात। उसकी पूरी जिंदगी का सबसे सच्चा प्यार बन गए।