सीप का मोती - भाग 1 shabd sarita द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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सीप का मोती - भाग 1

भाग १ 

कई सालों से मैं एक सपना देख रहा हूं। जहां सामने नीला पानी और किनारे पर फैली सुनहरी रेत... फिर एक पांव दिखता था सपने में जो हमेशा ना..आधा पानी में होता था और आधा किनारे पर। उस पांव की वह गोरी गुलाबी सी एड़ी...और उस एड़ी में एक नाज़ुक सी चांदी की पायल, जो उन लहरों पर तैरती हुई सी दिखती, फिर अचानक पानी की एक लहर पीछे हटती तो वह एड़ी ऐसे दिखती, जैसे सूरज की पहली किरण से निखर उठती हो। पानी की वो लहर उन गोरे तलवों के नीचे से रेत खींच ले जाती।

न मालूम कितने वर्षों तक मैंने वह सपना देखा है... पर कब देखा वह सपना...?? जवाब बस एक ही है...जब वह साथ थी तब..अब वो पांव मेरी जिंदगी से बाहर जा चुके हैं... अब भी मैं सपना देखता हूं मगर अब मुझे रेत पर सिर्फ उस एड़ी का गहरा निशान दिखता है और वो निशान मुझसे दूर जाता हुआ दिखता है, मेरी तरफ आता हुआ नहीं।अब मैं इंतजार कर रहा हूं उस वापसी के निशान के उभरने का, और उस वापसी के निशान के उभरने तक... सिर्फ उसके लिए अपनी जान बचाकर रखने की अंतिम कोशिश कर रहा हूं। 

मन में उमड़ते उन शब्दों को एक पन्ने पर बिखेर कर मैंने आंखें मूंद लीं। मेरे सामने एक किताब के सहारे शादी का एक निमंत्रण पत्र टिका कर रखा था... 

'तन्वी weds मुकेश '

सब कुछ खत्म हो गया था। एक युद्धभूमि युद्ध का कारण ही खत्म हो जाने की वजह से पूरी तरह खाली हो गई थी। और हारने वाले...?? हारने वाले मन में खोई हुई भावनाओं की रूपी सेना की जलती चिताओं की तपिश सहते बैठे थे। अचानक मन में सवाल कौंधा, क्या मुझे ऐसा कहना चाहिए...?? यह युद्ध था...?? या प्रेम...??

दिल ने कहा प्रेम को युद्ध का नाम क्यूं दिया जाय...?? सच पूछो तो प्रेम को समर्पण कहते हैं। 

 Every thing is fair in love and war ( मोहब्बत और जंग में सब कुछ जायज़ है ) ऐसा कहने वालों से मैं कहना चाहता हूं कि, यह सही नहीं है.. ऐसा नहीं होता.. युद्ध में तो शायद हो भी... लेकिन प्रेम में सब कुछ क्षमा योग्य नहीं होता। सामने वाले व्यक्ति की इच्छा का सम्मान करना होता है...उसका मन जानकर खुद का व्यवहार तय करना होता है। मैंने यह सब किया मेरा मन जानता है... लेकिन फिर भी..?? फिर भी शादी के निमंत्रण पत्र पर 'उसका' नाम...?? क्यूं..??.

मैंने तो शुरू से ही तनु को मन में रखकर  चल रहा हूं। उसका ख़याल रखता आया हूं। हमेशा उसका सहारा बना हूं। उसे जान से ज्यादा चाहा है मैंने... तो फिर उसे मुझ में कभी 'वह' क्यूं नहीं दिखाई दिया। क्या इस बात का विश्लेषण करने का यह सही समय है...?? लेकिन इसमें मैं अकेले ही कैसे अपने असफल प्रेम का विश्लेषण करूंगा...?? उसके लिए मुझे किसी और की भी जरूरत पड़ेगी ना क्या विश्लेषण के इस सफ़र में कोई और भी मेरे साथ शामिल होगा...??  अब मुझे यही देखना है। 

" ऐ मोटूsss!! यह पुकार पीछे से आई थी। मैं मुड़ा। तनु पीछे से दौड़ती हुई आ रही थी। मेरी ठुड्ढी पर पट्टी बंधी होने के कारण मैं पूरी तरह से मूंह खोलकर बोल नहीं पा रहा था, और ना ही हंस पा रहा था। इसलिए मैं एक फीकी सी मुस्कान के साथ रुक गया।

" अब हेलमेट ठीक है ना...?? अरे बाप रे कितनी सूजन थी।" उसने हांफते हुए कहा।

" हां ठीक है लेकिन मूंह ज्यादा हिलाते नहीं बन रहा ।"। उसकी उन भूरी आंखों झांकते हुए मैंने कहा जो मुझे हमेशा से ही बहुत पसंद थीं।

" हे भगवान!! कितना अनाड़ी है तु... तुझे सीधे चलते नहीं आता क्या...??  वो तो अच्छा हुआ... मैं वहां थी, वरना कितनी देर तक उस गड्ढे के पास उस जख्म को लेकर बैठे रहते..?? खून बह रहा था, फिर भी तुझे होश नहीं था। ऐसा कैसा है रे तू ..??? वह बोली।'वो तो अच्छा हुआ' कहने का उसका अंदाज मुझे बहुत पसंद था।

हुआ यूं था कि बारिश के दिन थे। अभी-अभी हमारी स्कूल शुरू हुई थी। हम दोनों सातवीं में थे। स्कूल जाते समय मैं कीचड़ में फिसल गया। पर मेरा संतुलन पीछे जाने की बजाय आगे की ओर झुका और मैं आगे की तरफ गिर गया। मेरी ठुड्ढी एक पत्थर पर टकराई। मुझे एक मिनट तक तो कुछ समझ नहीं आया। मैं एक बड़े से गड्ढे के सामने गिरा पडा हुआ था। उस गड्ढे में पानी भरा हुआ था, वो तो मेरी किस्मत अच्छी थी की मैं उस गड्ढे में नहीं गिरा। 

मैं बहुत मोटा था, इसलिए फुर्ती से मेरा दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था। पर तभी तनु आई उसने पीछे से देखा की मैं कीचड़ में पैर फैला कर बैठा हूं, इसलिए वह जल्दी से मेरे सामने आई तो उसने देखा सामने से मेरी शर्ट खून और कीचड़ से सनी हुई थी।

" हे भगवान मोटू sss!! कितनी चोट लगी है रे।"  वह चिंता भरे स्वर में बोली, उसकी आंखों में आंसू भर आए थे।

उसने तुरंत सूझबूझ दिखाई और मेरे मूंह पर रूमाल दबाकर रखा।वह जल्दी से मुझे वैसे ही पकड़ कर गांव के डॉक्टर श्रीवास्तव के पास ले गई और वैसे ही बारिश में भागते हुए जाकर मेरी मां को भी बुला लाई। तब तक डॉक्टर मुझे दो टांके लगा चुके थे। उसकी वजह से मेरे मुंह पर सूजन भी आ गई थी। पहरे से ही गोल मटोल मुंह ऊपर से सूजन,तनु यह देखकर बहुत दुखी नजर आ रही थी।

" डॉक्टर अंकल ये जल्दी ठीक तो हो जाएगा ना..?? " तनु ने पूछा। तनु जब डॉक्टर से पूछ रही थी तब मम्मी को भी चिंता हो रही थी। जब हम वहां से निकले तब...

" मोटू...तेरा चेहरा तो फूले हुए गुब्बारे की तरह दिख रहा है। अब तनु ने अपना रोना छोड़कर हंसीं दबाते हुए कहा। 

उसका यह धूप छांव जैसा मिजाज मेरे लिए कोई नई बात नहीं थी। हंसते-हंसते रोना और पल भर में रोना छोड़कर खुद को संभालना यह मैंने उसी से सीखा था। मेरा मज़ाक उड़ाना, मेरी चिंता करना, मेरी मदद करना, मेरे साथ हंसना, रोना, और हर हाल में मेरा साथ देने यह सब तनु ने हमेशा से किया था। हम एक-दूसरे के आदी हो चुके थे। उस दिन मैं तो स्कूल नहीं जा सका और तनु..??? वह भीगती भागती देर से स्कूल पहुंची उसने देर से आने का जो कारण बताए उसे सुनकर हमारी स्टीफन मॅम ने उसकी सराहना की। 

तनु सचमुच गुणों की खान है...किस वक्त क्या करना चाहिए यह जितना उसे सूझता था उतना तो मुझे भी कभी नहीं सूझा पर हां मैंने उससे सीख बहुत कुछ।

पता नहीं कैसे पर हमेशा ऐसा ही होता था मुझे मुश्किल में देखकर तनु तुरंत मेरी मदद के लिए दौड़ी चली आती थी। लेकिन मुझे यह करने का मौका कभी नहीं मिला। मैं अक्सर सोचता वो संकट में कभी क्यूं ही आएगी..?? क्यूंकि तनु के आसपास मंडराने वाली क्लेश कारक बातों को मैंने पहले से ही डरा रखा था। मेरा ध्यान हमेशा तनु की ओर तो रहता ही था साथ ही 'उसकी' ओर भी लेकिन फिर भी...

उस कोमल अनुराग की व्यक्तिगत भावना उसे पहली बार महसूस हुई वह मेरे लिए नहीं थी। उस भावना का प्रवाह मेरी तरफ था ही नहीं, वह प्रवाह उसकी तरफ चला गया। मुझ में न्याय परायणता शुरू से है शायद इसलिए मैंने कभी खुद को तनु पर थोपा नहीं। अगर वह मुक्त और सुखी होगी तो मैं भी मुक्त और सुखी रहूंगा। उसकी खुशी में ही मेरी खुशी है, पर कब तक..??

वह मेरे ना होते हुए भी यह गहरा बंधन अपनी तरफ से संभालना मेरे लिए कितना मुश्किल है। मैं इस बात को मानता हूं कि निस्वार्थ प्रेम होना चाहिए... पर मन कहे कि मुझे वो चाहिए तब निस्वार्थ बने रहना आग पर चलने जैसा है। वह अब पहले की तरफ मेरे पास नहीं आएगी यह मुझे महसूस हो रहा है। यह दिल चीर देने वाली तकलीफ मुझे क्यों हो रही है...??? वो तो ख़ुश है ना..?? फिर भी मुझे दर्द क्यों हो रहा है..??

मेरी सारी अपेक्षाएं व्यर्थ गई और जो कुछ भी मुझे उसके अंदर समाहित करना चाहिए था, वह उसने कर दिया। जो मुझे दिखाना चाहिए था वह उसने दिखा दिया। जो मुझे बताना चाहिए था वह उसने बता दिया। जो उसे मेरे बारे में जानना चाहिये था वह उसके बारे में जान गई। क्या इसलिए मुझे तकलीफ हो रही है...??

फिर तो मेरे जैसा पाखंडी व्यक्ति मैं ही ठहरा। नहीं... अब मुझे खुद को संभालना होगा, मुझे खुद को... जो कुछ भी होगा वह सहन करते हुए। अब तो मुझे ऐसा लग रहा है कि मैंने अगर दिल की हर धड़कन को तनु तनु करने की आदत लगाई ना होती तो शायद... हां शायद इतना दर्द नहीं होता।

उसकी आंखों में मेरे लिए आए आंसुओं को मुझे दोस्ती की करूणा ही समझना चाहिए था। उसका मेरे साथ हंसना रोना इस बात का संबंध मुझे किसी और भावना से नहीं जोड़ना चाहिए था। साथ रहते रहते तो जानवर से भी जुड़ाव हो जाता है पर हम उस पर जान तो नहीं लुटा देते। ये मुझे समझना चाहिए था। 

वो अजीब से वाकियात होते चले गए और मैं तनु के प्रति प्रेम में डूबता चला गया। अब खुद के लिए पछताऊं या तनु के लिए खुश होऊं यह ही समझ नहीं आ रहा। आज तक मेरे शारीरिक और मानसिक जख्मों को तनु ने ही हमेशा संभाला है, पर अब उसी के द्वारा दिया गया ज़ख्म मैं कैसे संभालू मुझे समझ नहीं आ रहा। 

🌿🌿🌿🌿

किस तरह इस दिल के ज़ख्म संभालू,

किस तरह यह ग़म का प्याला पी डालूं ,

तेरी खुशी में शामिल कर लूं खुद को पूरा ,

या अपने ही हाथों अपना कलेजा चीर डालूं।

क्रमशः 

शब्द सरिता