जीतेशकान्त पाण्डेय- आपने ‘पूर्वापर’ पत्रिका का एक मलयालम विषेशांक प्रकाशित किया। इसकी योजना कैसे बनी और इसका उद्देश्य क्या था?
डॉ0 सूर्यपाल सिंह- ‘पूर्वापर’ पत्रिका देश के विभिन्न भागों में जाती रही। कभी वित्तीय प्रतिफल की मैंने कामना नहीं की। यह पत्रिका ऑस्ट्रेलिया तक गई और वहाँ के हिंदी अध्यापक की रचना भी छपी। मेरी पत्रिका केरल भी जाती रही। कालीकट विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष इससे जुड़े हुए थे। जब उन्होंने अवकाश प्राप्त किया तो उनके घर का पता न मालूम होने के कारण पत्रिका नहीं भेजी जा सकी। उन्होंने कोरोना के समय एक चिट्ठी भेजकर यह पूछा कि क्या पत्रिका बंद हो गई है?
मैंने ‘पूर्वापर’ के कई अंक उनको भिजवाया और एक पत्र भी दिया कि मैं मलयालम विशेषांक निकालना चाहता हूँ, जिससे हिंदी-भाषी लोग भी मलयालम साहित्य के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकें। यदि आप अतिथि संपादक का कार्यभार संभाल लें तो यह विषेशांक निकाला जा सकता है। सुरेन्द्रन जी एक संस्था ‘भाषा समन्वय वेदी’ चलाते हैं। वे इसके संस्थापक अध्यक्ष हैं। सुरेन्द्रन जी के कैंसर का ऑपरेशन हुआ है। उन्हें निरन्तर दवा लेनी पड़ती है और काफी सावधानी बरतनी पड़ती है। फिर भी वे साहित्यिक क्रिया-कलापों में सक्रिय रहते हैं।
उन्होंने समन्वय वेदी के सदस्यों से चर्चा की और हमें पत्र लिखा कि हम लोग विशेषांक निकालने में सहायता करने के लिए तैयार हैं। उन्होंने ही एक समय-सीमा निर्धारित की जिसमें मलयालम साहित्यकारों के साहित्य का हिंदी अनुवाद उपलब्ध करवाया जाए। मैंने तुरन्त स्वीकृति भेज दी और उन्होंने सामग्री की एक रूपरेखा बनाकर मुझे प्रेषित किया। मैंने उसमें आवश्यक संशोधन करके फिर भेज दिया और वे सामग्री संकलन करवाने में लग गए। इसमें उनके सहयोगी तिरुवनन्तपुरम के अजय कुमार जी ने भी काफी सहयोग किया और दो महीने के अंदर सामग्री उपलब्ध होने लगी।
उसको अजय मिश्र ने टंकित करना शुरू किया। लगभग दो महीने में सबके सम्मिलित प्रयास से यह अंक तैयार हुआ। एकाध लेख बहुत बाद में मिले जिनमें समय पर संशोधन नहीं हो पाया। इसलिए उन लेखो में वर्तनी की कुछ त्रुटियां रह गयीं। मलयालम साहित्यकार अक्कितम का भी इस अंक को आशीर्वाद प्राप्त हुआ। सुरेन्द्रन जी ने भी सुझाव दिया की पत्रिका के विशेषांक को पुस्तक का रूप दे दिया जाए।
इसलिए ‘मलयालम साहित्य : प्रतीक और प्रतिमान’ नाम से इसे पुस्तकाकार छापा गया। इसलिए यह दोनों रूपों में उपलब्ध है। केरल ने हिंदी सीखने में पहल की, लोगों ने इसे एक अवसर के रूप में देखा। इसलिए केरल के विश्वविद्यालय और कॉलेजों में हिंदी का पठन-पाठन होता है। मलयालम भाषी हिंदी अध्यापकों, आचार्यों की एक पीढ़ी वहाँ अवकाश प्राप्त कर चुकी है। दूसरी पीढ़ी काम कर रही है। केरल में अर्जित भाषा के रूप में हिंदी काफी पढ़ी-लिखी जाती है। मलयालम के बहुत से साहित्यकार हिंदी और मलयालम दोनों में मौलिक लेखन कर रहे हैं। अनुवाद का काम भी वहाँ अधिक हो रहा है।
जीतेशकान्त पाण्डेय- आपको उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा 2018 में ‘साहित्य भूषण’ से सम्मानित किया गया था। सम्मान को आप किस दृष्टि से देखते हैं। क्या इससे सम्मान पाने वाला सरकार के प्रति कुछ नरम रवैया अपनाने लगता है?
डॉ0 सूर्यपाल सिंह- कोई भी समर्पित एवं सार्थक रचनाकार पुरस्कार पाने के लिए नहीं लिखता है। उसकी अंतरात्मा उसे लिखने के लिए विवश करती है इसलिए वह लिखता है। पुरस्कार से कुछ लोग प्रभावित होते हैं पर पुरस्कार से ही साहित्यकार का आकलन प्रायः नहीं हो पाता। उसकी रचनाएँ ही उसकी पहचान का माध्यम बनेंगी। फिर भी यदि पुरस्कार में कुछ राशि जुड़ी है तो उन रचनाकारों को इससे कुछ राहत मिलती है जिनकी नियमित आय के साधन नहीं हैं।
पुरस्कार से आदमी थोड़ा प्रोत्साहित तो होता है पर पुरस्कार से ही किसी साहित्यकार का आकलन नहीं किया जा सकता। इसलिए कभी-कभी कुछ साहित्यकार कहते हैं कि-
‘अर्थ और यश की कामना न जगे तो अच्छा है।’
जहाँ तक मेरा प्रश्न है मेरी आय के नियमित स्रोत हैं। पुरस्कार से थोड़ी प्रसन्नता तो हुई पर इससे लेखन में कोई अंतर नहीं आया। किसी भी सत्ता का अंधविरोध मैं प्रायः नहीं करता। यदि कहीं मुझे लगता है कि कुछ गलत हो रहा है तो उस पर उँगली रखने में न पहले संकोच था और न अब है। विरोध के लिए विरोध करना मेरा स्वभाव कभी नहीं रहा।जीतेशकान्त पाण्डेय- कोई भी सार्थक लेखक अपने समय की समस्याओं को भी ध्यान में रखता है। आपकी दृष्टि में वर्तमान की कौन-सी चुनौतियां साहित्यकार के सामने हैं और साहित्यकार किस प्रकार उन्हें अपने साहित्य में समाविष्ट करता है?
डॉ0 सूर्यपाल सिंह- प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में साहित्यकार अपने समय की चुनौतियों को ध्यान में रखकर साहित्य की रचना करता है। कभी-कभी साहित्यकार उन चुनौतियों पर अपनी स्पष्ट राय रखता है, एक तरह से वह चुनौतियों से मुठभेड़ करता है और कभी-कभी अप्रत्यक्ष रूप से संकेत में उसका उल्लेख करता है। आदिकाल से लेकर अब तक साहित्यकारों ने समय की चुनौतियाँ स्वीकार की है। प्रश्न उठता है कि वर्तमान में कौन-सी चुनौतियाँ साहित्यकार को उद्वेलित करती हैं?
कोई भी समाज आदर्श की चाहे जितनी बात करें, कुछ न कुछ कमियाँ साहित्यकार देख ही लेता है। सामाजिक, आर्थिक असमानता पहले भी साहित्यकारों को लिखने के लिए बाध्य करती थी और आज भी करती है। इन्हीं के बीच दलित और नारी लेखन के अंकुर फूटे। 1947 में भारत अंग्रेजी सत्ता से मुक्त हुआ। उस समय लगा था कि स्वतंत्र भारत में सब कुछ ठीक हो जाएगा पर ऐसा कहाँ हो सका? दस-पंद्रह वर्षों में ही मोहभंग होने लगा और साहित्य में मोह-भंग की रचनाएँ सामने आने लगीं। सामाजिक न्याय, आम-आदमियों का विकास, दलित और स्त्री की समस्याएँ मुखर होकर साहित्य में आने लगीं। दलितों ने स्वयं लेखन शुरू किया।
शिक्षा चाहे और कुछ न कर पायी हो पर उसने सवाल करना सिखाया। अस्मिता के संकट, आर्थिक और सामाजिक असमानताओं के चित्र साहित्य में उभरने लगे। अपनी कठिनाइयों को व्यक्त करने में लोग सक्षम होने लगे। इसीलिए दलित और स्त्रियों ने आत्मकथाएँ लिखीं। ओमप्रकाश वाल्मीकि ने ‘जूठन’ लिखा और फिर आत्मकथाओं की बाढ़ सी आ गयी। पहले लोग कमजोरों पर लिखते थे अब कमजोर स्वयं अपनी कठिनाइयाँ बयान करते हैं। उत्तर आधुनिक साहित्य में महान् वृतांतों पर प्रश्न उठाए गये। महान् भाषा की जगह सामान्य भाषा में सपाट ढंग से लेखन करते हुए प्रश्न उठाया जाने लगा।
इस समय एक युवा उप-संस्कृति विकसित हो रही है जो परम्पराओं से बहुत बँधना नहीं चाहती। साहित्य में इन सभी प्रश्नों को उठाया जा रहा है। दुनिया प्रायः तीन गुटों में बँटी हुई है। कई वे देश हैं जिन्होंने साम्यवादी चिंतन को अपने यहाँ उतारने की कोशिश की, पर वर्तमान में उनके यहाँ भी निजी भागीदारी का प्रयोग बढ़ा है। दूसरी ओर खुले समाज वाले देश हैं जो स्वतंत्रता को अधिक महत्व देते हैं। तीसरे गुट में वे लोग हैं जो इन दोनों में किसी गुट में शामिल तो नहीं हैं पर समय आने पर इनसे सहायता की अपेक्षा करते हैं।
साहित्य लेखन में भी वामपंथी और गैर वामपंथी खेमा काम करता रहा है। वामपंथी समाज में समानता और सबको काम पर विशेष स्थान दिया गया है पर स्वतंत्रता को सीमित कर दिया गया है। पिछली शताब्दी के सातवें-आठवें दशक में वामपंथ का प्रचार-प्रसार अधिक था और लेखकों की एक बड़ी संख्या वामपंथी विचारों से प्रभावित थी। खुले समाज में स्वतंत्रता को अधिक मूल्यवान समझा गया और व्यक्ति को स्वयं अपना व्यवसाय करने की छूट दी। गुटनिरपेक्ष देशों में प्रायः मिश्रित अर्थव्यवस्था काम करती रही।
साहित्यकार भी दोनों खेमे के मिलते रहे। पर बहुत से ऐसे साहित्यकार भी थे और हैं जो किसी खेमे से बँघे हुए नहीं रहे। वे स्वतंत्रता और समानता के बीच एक समन्वय करने में विश्वास रखते हैं। इसलिए वामपंथी खेमे में मार्क्सवादी रचनाओं को प्रश्रय मिला जबकि खुले समाज में स्वतंत्रता को अधिक सार्थक मूल्य में चित्रित किया गया। हर साहित्यकार के मन में समाज का एक बिंब होता है। अपने साहित्य में भी वह उसी को चित्रित करने की कोशिश करता है। वर्तमान कमियों पर उँगली रखते हुए नए समाज की कल्पना करता है। लेखन शैली और विधा भिन्न हो सकती है पर वह जिस समाज को फलते-फूलते देखना चाहता है, उसका चित्र उतारता है।
प्रजातांत्रिक समाज में स्वतंत्रता, समानता, हिस्सेदारी और मानवीय गरिमा चार महत्वपूर्ण मूल्य हैं जिनकी अभिव्यक्ति साहित्य में हो रही है। एक स्वतंत्रचेता साहित्यकार इनकी अभिव्यक्ति अपने ढंग से करता है। मेरे साहित्य में भी इन मूल्यों को व्यक्त होते देखा जा सकता है। मैं स्वयं किसी खेमे से जुड़ा नहीं रहा। मैं यह मानकर चलता हूँ कि भावी समाज के लिए हमें नए प्रारूप की तलाश करनी होगी। इसलिए मैं कहता रहा हूँ-
‘क्रांतियाँ अधूरी हुआ करती हैं’ तथा ‘कोई भी नया राम पुराने राम को दुहराता नहीं, नयी लीक गढ़ लेता है।’ सामाजिक न्याय के प्रश्न, वंचितों के दर्द तथा समाज के शाश्वत प्रश्न मेरी कविताओं और गद्य लेखन के केंद्र में होते हैं। इसलिए मैंने लिखा-‘कभी कोई बगावत पर उतरता क्यों जरा सोचो’ या ‘जिधर देखिए आज कोहरा घना है’ जैसी पंक्तियाँ इसी ओर इंगित करती हैं। स्त्री-पुरुष सम्बन्ध, घर के अस्तित्व की समस्याएँ, बच्चों और युवाओं की पीड़ा प्रायः साहित्य के केंद्र में रहती है।