नकल से कहीं क्रांति नहीं हुई - 20 Dr. Suryapal Singh द्वारा जीवनी में हिंदी पीडीएफ

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नकल से कहीं क्रांति नहीं हुई - 20

जीतेशकान्त पाण्डेय-  ‘रात साक्षी है’ आपकी एक भिन्न प्रकार की रचना है। इसमें सीता तथा उनसे सम्बद्ध लोगों की मनोदशा एक ही समय में क्या है, इसका चित्रण आठ सर्गों में किया गया है। समय है सीता की अन्तिम रात। इसमें काल भी एक पात्र के रूप में उपस्थित होता है। इसकी रचना-प्रक्रिया के बारे में बताएँ। 


डॉ0 सूर्यपाल सिंह- राम कथा में सीता एक महत्वपूर्ण चरित्र हैं। इनको विभिन्न लोगों ने अलग-अलग ढंग से चित्रित करने की कोशिश की है। लोकगीतों की सीता मानस की सीता से भिन्न दिखाई देती हैं। सीता का जीवन अत्यन्त संघर्षमय रहा। वे एक पतिव्रता नारी के रूप में प्रतिष्ठित रहीं, पर उन्हें कष्ट भी बहुत उठाना पड़ा। लंका से अयोध्या लौटने पर भी वे राम के साथ बहुत दिनों तक नहीं रह पाइंर्। उन्हें वाल्मीकि आश्रम में शरण लेनी पड़ी। सीता केवल एक पात्र नहीं हैं, वे नारी समाज की प्रतिनिधि भी हैं। ‘रात साक्षी है’ में सीता के अंतिम रात की कथा है। उनसे कहा गया कि प्रातः वे परीक्षा देने के लिए उपस्थित हों।

महर्षि वाल्मीकि भी यह संदेश देते हुए विह्वल हो जाते हैं। वे सीता पर ही छोड़ देते हैं कि वे विचार कर लें। यद्यपि वे संकेत करते हैं केवल तुम्हें प्रकट होना है। पर सीता का मन हाहाकार कर उठता है। वे अपने बचपन को याद करते हुए अपनी माँ से पूछती है- ‘माँ मेरी अब तू ही बोल’ और फिर माँ के साथ बिताए दिनों को याद करती हैं। जब कोई कष्ट में होता है तो सबसे पहले माँ ही याद आती है। सीता भी याद करती हैं- ‘सोन चिरैया माँ कहती थी’। माँ के बाद वे धरती माँ को याद करती हैं और कह उठती हैं- ‘धरती माँ बोलो तो’।

अपने जीवन के विविध पक्षों को याद करते हुए उन्हें यह तय करना है कि परीक्षा में वह किस तरह प्रकट होंगी। वह प्रकट तो हुईं पर अयोध्या लौटी नहीं। उस रात राम, लक्ष्मण, हनुमान क्या सोचते रहे। काल क्या चुनौती लेकर आता है। कुश और लव उस रात क्या करते रहे। इन सभी बिंदुओं को ‘रात साक्षी है’ में उठाया गया है। ‘रात साक्षी है’ घर के अघर होने की कथा है। सीता के जाने के बाद राम का घर भी घर कहाँ रह पाया?  

 ‘रात साक्षी है’ में कुल आठ सर्ग है- ‘निशीथ’, ‘संकेत’, ‘मंथन’, ’जागरण’, ‘घर के पृष्ठ’, ‘कौन बैठा है?’, ‘दीप लौ’ और ‘ईंगुरी दिनकर’। यह कथा रात की है। रात में ही सभी विचार-विमर्श करते हैं। इसलिए प्रथम सर्ग में निशीथ का ही चित्रण है। कहा भी गया है- 

यह कथा निशीथ विमर्शों की, 

अनकहे शब्द के अर्थों की।

कथा मौन की।

‘संकेत’ में वाल्मीकि सीता को अगली सुबह परीक्षा के लिए प्रकट होने का संकेत करते हैं। वे अनेक तरह से सीता को समझाने की कोशिश करते हैं कि उन्हें केवल प्रकट भर होना है- ‘बच्चों को भी घर मिल जाए।’ पर सीता तत्काल कोई उत्तर नहीं दे पातीं। उनका विह्वल मन देखकर वाल्मीकि भी विचलित हो जाते हैं। वे कहते हैं कि- बेटी चार प्रहर का अभी समय है, तुम सोच लो। निर्णय तुम्हें ही लेना है। सीता की आंखों में- 

छिपते हैं, दिखते हैं बादल।

मंथन में सीता विचार करती हैं। पहले वे माँ को स्मरण करती हैं। उससे पूछती हैं फिर धरती माँ से पूछती हैं-

नीड़ों को बुनते ही बीत गए दिन,

तीर तीर चलते ही बीत गए दिन

धरती माँ बोलो तो। 

फिर वे अपनी जीवन-यात्रा को स्मरण करते हुए गोदावरी तट पर पहुँचती हैं। फिर शुचिता एवं पवित्रता के बहाने नारियों पर जो अत्याचार हुए उस पर उनकी दृष्टि जाती है। नारी ही क्यों अपावन हो जाती है। अहल्या ही क्यों दंडित होती है?- 

‘बनती नारि अपावन, सब कुछ बदले क्षण में।

ऐसा नियम गढ़ा है,किसने अपने पण में?’

सीता के मन में पुनः एक प्रश्न उठता है-

 ‘सीने वालों का क्या?ताप भोगती नारी। 

कितना ही मल धोए,

छुटे न कालिख कारी।’ 

इसी तरह का प्रश्न लव भी करते हैं-

 ‘राजकुमार राम त्राता बन,

गौतम नारी शाप मिटाते।

पर वे ही निष्कासित करते 

निज पत्नी जब राज चलाते 

संगति क्या दोनों कर्मों में?

मैंने पूछा था माँ गुरु से।

हुए चकित, उँगली मस्तक पर, 

आँखें खोजी उठीं, संभलते।’

सीता हमेशा मर्यादाओं का पालन करती रहीं। वे कहती हैं-

अनसूया माँ तेरा बाना, 

जीवन में अक्षरशः माना।

कितने द्वार दिशाएँ देखी, 

क्या मैं छद्म लिए पलती थी?

उनके मन में अनेक प्रश्न उभरते हैं। उन्हें बच्चों की भी चिंता है कि वे समाज द्वारा कहीं दंडित न हो-

नई पौध को दण्ड न देना,

अकलुष जीवन जीने देना।

साधा अपने को कितना ही

छवि की साख कहाँ बच पाई?

धीरे-धीरे वे संकल्पबद्ध होती हैं-

पद्मासन से वज्रासन में,

कब बैठीं वे? स्वयं न जाना

सीता केवल एक नारी ही नहीं, वे नारी समाज की प्रतिनिधि भी हैं। उनके कर्मों का फल आने वाली पीढ़ियाँ भुगतेंगी। इसीलिए वे परीक्षा के लिए प्रकट तो होती हैं पर वे अयोध्या लौटी नहीं। एक तरह से यह उनका प्रतिरोध है। सीता हर अन्याय सहने के लिए प्रस्तुत नहीं है। सीता का मंथन देखकर काल भी राम के डेरे की ओर खिसक लेता है।

चतुर्थ सर्ग ‘जागरण’ में राम जागते हुए सीता वनवास के औचित्य पर विचार करते हैं। राम का राजस मन और आंतरिक मन दोनों आपस में अपना-अपना पक्ष रखते हैं। इसमें न्याय एक मुख्य बिंदु है- 

न्याय सुलभ हो, न्याय पूर्ण हो, 

जन को लगे कि न्याय हुआ। 

न्याय कर्म से ही समाज मर्यादित होता है- 

‘संशय उसमें विघ्न डालता 

माहुर कढ़ी बनाता है।’ 

राम भी जागते ही रहे। काल भी राम को आँखें बंद कर जगे हुए देखता है। आँखों में सीता की छवि बंद है। प्रभु राम को चिंतित देखकर काल भी विचारों में खो जाता है। 

पंचम सर्ग ‘घर के पृष्ठ’ राम के घर की समस्याओं पर केंद्रित है। लक्ष्मण पद्मासन में बैठे हुए घर के पृष्ठ उलटते हैं-

कोई घर कैसे बनता है?

घर का अंत अघर क्यों?

राम भी कुश शैया पर सोते हैं। लक्ष्मण कहते हैं कि मैंने जब भी अपने विवेक से कुछ करना चाहा तो संकट के बादल घिर आए। वे सोचते हैं कि काश यह घर अघर न बनता! वैदेही के वनवास से यह घर अघर हो गया है। इसी में काल और लक्ष्मण की बातचीत भी होती है। काल लक्ष्मण से पूछता है कि आप चुप क्यों हैं। घर को अघर होने से रोकने में चुप्पी तोड़नी पड़ेगी। वे सीता के बारे में कहते हैं-

मैंने उनके पद चिह्नों को,

सदा ध्यान से बाँचा।

उनकी दृढ़ता छिपी विनय में,

अन्तस् कितना साँचा?

लक्ष्मण हमेशा मुखर रहते हैं पर आज उनका अधर सिया है। काल लक्ष्मण से कहता है कि समय के प्रश्नों का उत्तर खोजिए-

काल माँगता वर्तमान में,

अधुनातन का उत्तर। 

भाग रहा उत्तर देने से, 

बूढ़ा वही, पश्चचर। 

 

छठे सर्ग में हनुमान एक वृक्ष के नीचे बैठे सोचते हैं- क्या अवध की बस्तियाँ लंका बनेगी। वे तो माँ और प्रभु दोनों के सेवक हैं-

 कैसे अलग बने रे?

काल भी सोचता है कि यदि हनुमान को यह विषाद कष्ट दे रहा है तो इस पृथ्वी पर कौन बचेगा।  सातवें सर्ग में कुश-लव अपनी कुटिया में सो रहे हैं। अचानक लव उठ पड़ते हैं। उन्होंने एक सपना देखा है-मां पुष्करिणी में जल समाधि ले लेती हैं। कुश यह बताते हुए कि यह स्वप्न असत्य है। शंका मिटाने के लिए माँ के कुटिया की ओर जाते हैं। पर कुटी द्वार पर माँ भी चुप-चुप टहल रहीं हैं। माँ बच्चों को देखकर हृदय से चिपका लेती हैं। अभी रात शेष है जाकर सो जाओ। दोनां लौट तो आते हैं पर माँ के सम्बन्ध में ही विचार-विनिमय करते रहते हैं। वे दोनों समाज के नियमों पर भी चर्चा करते हैं। लव कहते हैं-

‘जन-ज्वलंत प्रश्नों का उत्तर कब से माँग रहा है?’

प्रातः होते ही जैसे एक बाज ने पंछी को दबोचा, दोनों लव के बाण की हवा से धरती पर गिर पड़े। बाज और पंछी दोनों फिर फड़फड़ा कर उड़ गए। कुश ने लव के कौशल की सराहना की। दोनों बीणा का सुर निकाल उषा का स्वागत करने लगे।

अंतिम सर्ग ईंगुरी दिनकर में उषा का चित्र है। काल की उपस्थिति है। सभी जग गए हैं- 

अँटकी आँखें सभी राम-सिया पर,

उगते क्षितिज वेध ईंगुरी दिनकर।

इसमें स्मृति के सहारे सीता के परलोक गमन का चित्र खींचा गया है- 

सुना गया वे माँ उर्वीजा

लौट गईं निज माँ की गोदी।

ड्योढ़ी सूनी, प्रभु उर पीड़ित, 

उर्वी पर प्रत्यंचा कस ली। 

आज भी घर आंगन श्राप ग्रस्त हैं। हर आँगन में राम की प्रत्यंचा मानो आज भी तनी हुई है। ‘रात साक्षी है’ की भाव-भूमि घर के इर्द-गिर्द घूमती है। मिथकीय दृष्टि से ‘रात साक्षी है’ घर के अघर होने की तथा वंचितों को न्याय देने की कथा है। 

 

जीतेशकान्त पाण्डेय- आपकी कई रचनाओं के केंद्र में घर है। ‘रात साक्षी है’ में घर के बारे में विस्तार से चर्चा हुई है। आपके एक नाटक का नाम ही ‘घर’ है। आपके लेखन में घर की संकल्पना अधिक मुखर होकर आई है, ऐसा क्यों है?


डॉ0 सूर्यपाल सिंह- मुझे ऐसा लगता है यूरोप और अमेरिका की तरह भारत में भी घर अब घर न रहने की स्थिति में आ गए हैं। संयुक्त से हम एकल परिवार में आए। धीरे-धीरे चूल्हा रहित घर की ओर बढ़ते जा रहे हैं। घर आपसी सौहार्द और स्नेह से बनता है। यदि आपस में स्नेह नहीं है तो घर-घर नहीं रह जाता। इसलिए घर मेरी चिंता के केन्द्र में रहा है। इसलिए ‘रात साक्षी है’ में घर पर विस्तार से चर्चा की गई है। राम का घर भी सीता के जाने के बाद घर कहाँ रह पाया-

मनुज बनाता नीड़ स्वयं ही,

पर उसमें क्या रह पाता है?

विघ्न टपकते, 

गादुर मुदित, कपोतक बसते

घर का रूप अघर सा होता।  

मनुष्य विवेक का सहचर है पर घर को घर कहाँ रख पाता है। इसलिए सीता कहती है कि- 

घर का अमिय कहाँ जाता माँ ?

आदमी नीड़ों को बुनते ही दिन बिताता है पर वह नीड़ में कहाँ रह पाता है। ‘घर के पृष्ठ’ में लक्ष्मण घर को अघर देखकर चिंतित होते हैं। घर नाटक में भी घर को ही केन्द्र में लिया गया है।