भाग 2: खोई हुई चाबी और अनकहे सवाल
अगली सुबह जब कबीर की नींद खुली, तो बाहर बारिश थम चुकी थी, लेकिन आसमान में अब भी काले बादलों का डेरा था। उसकी मेज पर रखा वह नीले पक्षी वाला चाबी का गुच्छा सुबह की हल्की रोशनी में चमक रहा था। कबीर ने उसे हाथ में लिया। वह पक्षी लकड़ी का बना था और उसके ऊपर 'Z' उकेरा गया था। ज़ोया। वह अजनबी लड़की जिसने कल रात उसे सिर्फ लिफ्ट नहीं दी थी, बल्कि उसकी व्यवस्थित और नीरस ज़िंदगी में एक हलचल पैदा कर दी थी।
कबीर का दिमाग अब भी अपनी ऑफिस की फाइलों में उलझा होना चाहिए था, लेकिन आज पहली बार उसका मन काम पर नहीं लग रहा था। उसने सोचा, "आखिर मैं उसे ढूँढूँगा कैसे? मुंबई जैसे बड़े शहर में किसी अजनबी को ढूँढना घास के ढेर में सुई खोजने जैसा है।"
तभी उसकी नज़र उस चाबी के साथ लगे एक छोटे से लैमिनेटेड कार्ड पर पड़ी। वह बहुत पुराना और घिसा हुआ था, लेकिन उस पर एक कैफे का लोगो धुंधला सा दिखाई दे रहा था—"द ब्लू हेवन।"
पूरे दिन ऑफिस में कबीर का ध्यान बार-बार घड़ी पर जा रहा था। शाम होते ही, उसने पहली बार अपना काम अधूरा छोड़ा और सीधा उस पते की तलाश में निकल पड़ा। अंधेरी की एक तंग और खूबसूरत गली में उसे वह कैफे मिल गया। कैफे की दीवारों पर पुरानी यादों की तस्वीरें थीं और वातावरण में भुनी हुई कॉफी की खुशबू बसी थी।
जैसे ही कबीर अंदर पहुँचा, उसकी नज़र काउंटर पर पड़ी। वहाँ ज़ोया नहीं थी। उसकी जगह एक उम्रदराज आदमी चश्मा लगाए कुछ लिख रहा था।
"नमस्ते, क्या मैं यहाँ ज़ोया नाम की किसी लड़की से मिल सकता हूँ? उनकी ये चाबी मेरे पास रह गई थी," कबीर ने हिचकिचाते हुए पूछा।
वह आदमी रुका और उसने कबीर को ऊपर से नीचे तक देखा। "ज़ोया? वह तो यहाँ सुबह की शिफ्ट में होती है। अभी वह एक कम्युनिटी सेंटर में बच्चों को पेंटिंग सिखाने गई होगी।" उस आदमी के लहजे में एक अपनापन था। "तुम वही हो न, जिसे उसने कल रात लिफ्ट दी थी? वह सुबह बता रही थी कि उसने एक 'जेंटलमैन' को बारिश से बचाया।"
कबीर थोड़ा शर्मिंदा हुआ, पर उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई। "जी, शायद मैं ही हूँ।"
उस आदमी ने उसे पास के एक स्कूल का पता दिया। कबीर जब वहाँ पहुँचा, तो बारिश फिर से शुरू हो चुकी थी। स्कूल के बरामदे में बच्चों का शोर सुनाई दे रहा था। वह चुपचाप एक खंभे के पीछे खड़ा हो गया। सामने के बड़े कमरे में ज़ोया बैठी थी। उसके हाथ रंगों से सने थे और वह पाँच-छह बच्चों के बीच घिरी हुई थी।
"देखो, अगर तुम नीले रंग में थोड़ा सा सफेद मिलाओगे, तो यह आसमान जैसा बन जाएगा," ज़ोया बच्चों को समझा रही थी। उसकी आवाज़ में वही खनक थी जो कल रात थी। कबीर उसे बस देखता रह गया। वह अपने काम के प्रति इतनी समर्पित थी कि उसे दुनिया की कोई फिक्र नहीं थी।
अचानक एक बच्चे ने खिड़की की तरफ इशारा किया, "दीदी, बाहर कोई खड़ा है!"
ज़ोया ने मुड़कर देखा। कबीर को वहाँ देख उसकी आँखें हैरत से फैल गईं। उसने बच्चों को काम पूरा करने के लिए कहा और बाहर आई।
"मिस्टर सीरियस? तुम यहाँ? तुम्हें मेरा पता कैसे मिला?" उसने अपने माथे से पसीना पोंछते हुए पूछा, जिससे उसके गाल पर नीले रंग का एक धब्बा लग गया।
कबीर ने जेब से चाबी का गुच्छा निकाला। "तुम ये मेरी जेब में छोड़ गई थी। या शायद ये गिर गया था।"
ज़ोया ने चाबी को देखा और राहत की एक गहरी सांस ली। "ओह गॉड! थैंक यू! मुझे लगा मैंने इसे हमेशा के लिए खो दिया। ये मेरे घर की इकलौती चाबी नहीं है, ये मेरे पापा की आखिरी निशानी है।" उसकी आँखों में एक पल के लिए नमी आई, पर उसने तुरंत उसे छुपा लिया।
"कोई बात नहीं, मुझे खुशी है कि मैं इसे लौटा पाया," कबीर ने कहा।
दोनों के बीच कुछ पलों के लिए खामोशी छा गई। बाहर बारिश अब तेज़ हो गई थी।
"वैसे, कल रात तुमने कहा था कि हम कॉफी पिएंगे। क्या वह ऑफर अब भी वैलिड है?" कबीर ने अपनी तरफ से पहली बार पहल की।
ज़ोया मुस्कुराई। "बिल्कुल! पर एक शर्त है। तुम्हें ये सूट और टाई उतारकर थोड़ा रिलैक्स होना पड़ेगा। क्या तुम इस बारिश में बिना छतरी के मेरे साथ उस नुक्कड़ वाली टपरी तक चल सकते हो?"
कबीर ने अपने महंगे जूतों और घड़ी की तरफ देखा, फिर ज़ोया की चमकती आँखों की ओर। उसने अपनी टाई ढीली की और उसे जेब में डाल लिया। "चलो, देखते हैं भीगने में क्या मज़ा है।"
अगले एक घंटे तक, मुंबई की सड़क पर दो अजनबी, जो कल तक एक-दूसरे का नाम भी नहीं जानते थे, चाय के कुल्हड़ पकड़े बारिश का आनंद ले रहे थे। कबीर ने जाना कि ज़ोया एक फ्रीलांस आर्टिस्ट है और वह अपनी शर्तों पर जीना पसंद करती है। वहीं ज़ोया को पता चला कि कबीर एक सफल एनालिस्ट है, लेकिन उसने सालों से कोई छुट्टी नहीं ली है।
"कबीर, तुम ज़िंदा तो हो, पर तुम जी नहीं रहे हो," ज़ोया ने चाय का घूँट लेते हुए कहा।
"शायद तुम सही कह रही हो," कबीर ने पहली बार स्वीकार किया।
बातें लंबी होती गईं। बारिश की बूंदों ने उनके बीच के फासलों को कम कर दिया था। लेकिन जैसे ही कबीर के फोन पर उसके बॉस का कॉल आया, वह फिर से अपनी पुरानी दुनिया की याद में खो गया।
"मुझे जाना होगा, ज़ोया। मेरा एक क्लाइंट कॉल है," उसने घड़ी देखते हुए कहा।
ज़ोया का चेहरा थोड़ा उतर गया, पर उसने मुस्कुराहट बरकरार रखी। "बेशक। तुम्हारी फाइल्स इंतज़ार कर रही होंगी।"
कबीर जाने लगा, पर कुछ कदम चलकर वह रुका। "क्या हम फिर मिल सकते हैं? बिना किसी चाबी के बहाने के?"
ज़ोया ने उसे गौर से देखा और धीरे से सिर हिलाया। "अगले रविवार, इसी जगह। अगर बारिश हुई, तो मैं मिलूँगी। अगर धूप हुई, तो शायद नहीं।"
कबीर हैरान रह गया। "ये कैसा लॉजिक है?"
"यही तो रोमांच है, कबीर!" ज़ोया ने आँख मारते हुए कहा और अपनी स्कूटी की ओर बढ़ गई।
कबीर घर तो पहुँच गया, पर उसका दिल अब भी उस बारिश और उस अजनबी लड़की के पास रह गया था। उसे रविवार का इंतज़ार था, पर उसे डर भी था—क्या किस्मत फिर से बारिश कराएगी?
अगले भाग (Part 3) में क्या होगा?
* क्या रविवार को बारिश होगी?
* कबीर और ज़ोया के बीच बढ़ती नज़दीकियों में क्या कोई रुकावट आएगी?
* ज़ोया की ज़िंदगी का वो कौन सा सच है जो कबीर को हैरान कर देगा?