पुरानी रेलवे स्टेशन की वह सुनसान इमारत, जो बरसों पहले किसी हादसे के बाद बंद कर दी गई थी, आज काली परछाइयों का बसेरा लग रही थी। रात के ठीक 12 बज रहे थे। आयरा की टैक्सी ने उसे कुछ दूर पहले ही उतार दिया था क्योंकि ड्राइवर उस "शापित" जगह के पास जाने को तैयार नहीं था।
हल्की बूंदाबांदी अब एक ठंडी चुभन में बदल चुकी थी। आयरा ने अपने कोट को कसकर लपेटा। उसके हाथ में वही सफेद लिफाफा था, जो कल उसके दरवाजे पर मिला था। उसके कदम लड़खड़ा रहे थे, पर मन में एक ही सवाल था— "अगर आरव मर चुका है, तो ये लिखावट किसकी है?"
स्टेशन के अंदर कदम रखते ही सड़े हुए लकड़ी और जंग लगे लोहे की महक ने आयरा का स्वागत किया। प्लेटफॉर्म नंबर 1 पर सन्नाटा इतना गहरा था कि उसे अपनी ही सांसों की आवाज गूंजती हुई सुनाई दे रही थी। तभी, दूर अंधेरे में उसे एक जलती हुई सिगरेट की रोशनी दिखाई दी।
आयरा की धड़कनें गले तक आ गईं। आरव को सिगरेट पीने की आदत थी। वह चिल्लाना चाहती थी, पर गला सूख चुका था।
"आरव? क्या तुम... तुम वहाँ हो?" उसकी आवाज कांप रही थी।
रोशनी बुझ गई। तभी स्टेशन के पुराने लाउडस्पीकर से एक चरचराहट की आवाज आई, जैसे कोई पुराना रिकॉर्ड बजने वाला हो। सन्नाटे को चीरते हुए एक भारी आवाज गूंजी, "तुम आ गई आयरा... मुझे पता था तुम आओगी।"
यह आवाज आरव की नहीं थी। यह आवाज गहरी थी, ठंडी थी, और इसमें एक अजीब सा पागलपन था।
खौफनाक सच
अचानक, स्टेशन की एक पुरानी फ्लडलाइट जल उठी। आयरा की आंखें चौंधिया गईं। जब उसकी नजर सामने पड़ी, तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। प्लेटफॉर्म के बीचों-बीच एक पुरानी कुर्सी रखी थी, और उस पर एक आदमी बैठा था। उसने चेहरा ढांप रखा था, लेकिन उसके हाथ में आरव की वही पुरानी घड़ी थी जो उसने तीन साल पहले आखिरी बार पहनी थी।
"कौन हो तुम? और आरव की चीजें तुम्हारे पास क्या कर रही हैं?" आयरा ने हिम्मत जुटाकर पूछा।
वह शख्स धीरे से उठा। उसने अपना नकाब हटाया। चेहरा आयरा के लिए अनजान था, पर उसकी आंखों में जो नफरत थी, उसने आयरा को अंदर तक हिला दिया।
"आरव मरा नहीं था आयरा... उसे मारा गया था। और उस रात की गवाह सिर्फ तुम थी, पर तुमने क्या किया? तुम भाग गईं।" उस अजनबी ने एक और लिफाफा हवा में उछाला। "ये आरव की आखिरी चिट्ठी है, जो उसने मरने से पहले लिखी थी। उसने इसे पोस्ट करने की कोशिश की थी, लेकिन वह कभी तुम तक नहीं पहुंच पाई।"
आयरा के दिमाग में यादों का तूफान उठ खड़ा हुआ। तीन साल पहले की वह काली रात... तेज रफ्तार कार... और आरव का खून से लथपथ चेहरा। उसे लगा था कि वह एक एक्सीडेंट था, लेकिन यह अजनबी कुछ और ही कह रहा था।
लिफाफे का राज
आयरा ने कांपते हाथों से वह चिट्ठी उठाई। उसमें सिर्फ एक नक्शा बना था और नीचे लिखा था— "सच्चाई जमीन के नीचे नहीं, तुम्हारे सामने वाले के पास है।"
जैसे ही आयरा ने वह पढ़ा, उसे महसूस हुआ कि उसके पीछे कोई खड़ा है। एक ठंडी छुअन उसकी गर्दन पर महसूस हुई। उसने मुड़कर देखा, तो वहां कोई नहीं था, बस एक परछाई तेजी से खंभे के पीछे छिपी।
"आरव?" वह फुसफुसाई।
तभी अजनबी जोर-जोर से हंसने लगा। "तुम जिसे ढूंढ रही हो, वह मर चुका है। लेकिन जो उसे मारना चाहता था, वह अभी भी जिंदा है... और वह तुम्हारे बहुत करीब है।"
अचानक, पूरे स्टेशन की लाइटें एक साथ बंद हो गईं। अंधेरे में आयरा को किसी के दौड़ने की आवाज आई। वह डर के मारे स्टेशन के बाहर की तरफ भागी, लेकिन मुख्य दरवाजा अंदर से लॉक हो चुका था।
उसकी जेब में रखा उसका फोन वाइब्रेट हुआ। एक नया मैसेज था। एक अनजान नंबर से।
मैसेज में लिखा था: "पीछे मत देखना आयरा, मैं तुम्हारे ठीक पीछे खड़ा हूँ।"
क्लाइमेक्स का मोड़
आयरा की चीख गले में ही दब गई। उसने हिम्मत करके धीरे से पीछे मुड़कर देखा। मोबाइल की टॉर्च की रोशनी में उसे एक चेहरा नजर आया। वह अजनबी नहीं था। वह उसका अपना सगा भाई, 'निखिल' था, जो तीन साल से उसे दिलासा दे रहा था।
निखिल के हाथ में एक वैसी ही चिट्ठी थी। उसके चेहरे पर वह मासूमियत नहीं थी, बल्कि एक कातिलाना मुस्कान थी।
"निखिल... तुम?" आयरा की रूह कांप गई।
"आरव को सच पता चल गया था आयरा। उसे पता था कि मैं कंपनी के पैसे खा रहा हूँ। उसने वो चिट्ठी तुम्हारे नाम लिखी थी ताकि तुम मुझे पुलिस के हवाले कर सको। पर किस्मत देखो... वो चिट्ठी कभी तुम तक पहुंची ही नहीं।" निखिल ने एक कदम आगे बढ़ाया।
लेकिन तभी, स्टेशन के पुराने वेटिंग रूम से एक और साया निकला। एक ऐसा शख्स जिसे देखकर निखिल के हाथ से पिस्तौल गिर गई। वह साया कोई और नहीं, बल्कि आरव था। लेकिन उसका चेहरा आधा जला हुआ था और उसकी आंखों में मौत का सन्नाटा था।
क्या आरव वाकई जिंदा है या यह कोई और खेल है?
निखिल ने आरव को मारने के लिए और क्या साजिशें रची थीं?
और सबसे बड़ा सवाल— वह अजनबी कौन था जिसने आयरा को स्टेशन बुलाया?