गाल पर हाथ रखे नवीना पीछे हटने लगी।
फिर अचानक भीड़ चीरकर भागी।
रिपोर्टर उसके पीछे दौड़ पड़े।
“मैडम जवाब दीजिए!”
“क्या ये सच है?”
“मैडम!”
नवीना अपनी कार तक पहुँची।
दरवाज़ा खोला और अंदर कूद गई।
ड्राइवर ने गाड़ी झटके से आगे बढ़ा दी।
एक रिपोर्टर दरवाज़े से चिपक गया।
दूसरा बोनट पर गिर पड़ा।
पर कार तेज़ी से निकल गई।
पीछे रह गया—
उबलता हुआ मीडिया।
अब सारे कैमरे फिर मुड़े—
अनीश और जोगी की तरफ।
लड़कियाँ खुद उन्हें आगे खींचकर लाई।
एक लड़की ने काँपती आवाज़ में कहा—
“इन लोगों ने हमें बचाया है।”
कुछ सेकंड सन्नाटा रहा।
फिर—
तालियाँ।
धीरे।
फिर तेज़।
फिर और तेज़।
पूरा परिसर तालियों से गूंज उठा।
उसी वक़्त मालती बस के भीतर आख़िरी लड़की के सिर पर पट्टी बाँध रही थी।
“चल, भाग,” उसने धीमे से कहा।
लड़की उतर गई।
मालती ने मुड़कर देखा।
पीछे एक और लड़की सीट पर सिर टिकाए पड़ी थी।
“उठो बेटा,” वह उसके पास गई, “हम पहुँच गए हैं।”
उसने कंधे पर हाथ रखा।
शरीर एक ओर लुढ़क गया।
गर्दन के पास गोली का काला घाव था।
शरीर ठंडा पड़ चुका था।
मालती का हाथ वहीं थम गया।
चेहरे का रंग उड़ गया।
“अनीश मामू! जोगी।”
अनीश और जोगी लगभग दौड़ते हुए बस के भीतर पहुँचे।
एक नज़र पड़ी—
और दोनों जड़ हो गए।
अनीश चुप खड़ा रह गया।
चेहरा सख्त।
जोगी की मुट्ठी भिंच गई।
अगले ही पल उसने पूरी ताकत से सीट पर मुक्का दे मारा।
बाहर तालियाँ अब भी चल रही थीं।
अंदर बस में एक और सच पड़ा था— वे सबको नहीं बचा पाए थे।
कुछ देर बाद लड़कियों को पानी दिया गया।
खाना लाया गया।
रिपोर्टर इंटरव्यू लेने लगे।
तभी—
सायरन।
पुलिस वैनें अदालत के बाहर आकर रुकीं।
पुलिस का एक दल आगे बढ़ा।
सीधे अनीश और जोगी की ओर।
एक सिपाही ने जोगी की कलाई पकड़ ली।
हथकड़ी।
कैमरे तुरंत उस तरफ मुड़ गए।
एक और सिपाही अनीश की तरफ बढ़ा।
हथकड़ी लगाने लगा।
अनीश ने उसे घूरकर देखा।
सिपाही घबरा कर पीछे हट गया।
सामने खड़े इंस्पेक्टर ने संयत स्वर में कहा—
“चलिए, सर…
हमें अपनी ड्यूटी करने दीजिए।”
अनीश ने जोगी की तरफ़ इशारा किया।
“पहले इसे अस्पताल ले चलो।
बहुत खून बह चुका है।”
इंस्पेक्टर ने तुरंत सिर हिलाया।
“जी। वही व्यवस्था है।”
अनीश एक पल रुका।
फिर ठंडी आवाज़ में बोला—
“और हाँ…
अंदर एक बच्ची की लाश है।”
इंस्पेक्टर का चेहरा कस गया।
पुलिस उन्हें वैन की ओर ले जाने लगी।
रिपोर्टरों को धक्का देकर हटाया जा रहा था।
एक रिपोर्टर चिल्ला रहा था—
“देखिए इस नाकाम पुलिस को!
लड़कियों को बचा नहीं सकी—
लेकिन इन्हें पकड़ने में पूरी ताकत लगा रही है!”
वैन का दरवाज़ा बंद हुआ।
अंदर—
आख़िरकार
कुछ सेकंड की शांति।
अनीश ने जेब से सिगरेट निकाली।
जलायी।
जोगी की आँखें मुंदने लगी थीं।
वह बुदबुदाया—
“पाँच बच्चियाँ वहाँ छूट गईं।
एक रास्ते में ख़त्म हो गई।”
अनीश ने गहरी साँस ली।
“ये घाव भरते नहीं।
बस आदमी इनके साथ जीना सीख जाता है।”
जोगी के गले में कुछ अटक-सा गया।
आँखों में हल्की नमी उतर आई।
वह खुलकर रोना चाहता था।
पर रोया नहीं।
कुछ पल सन्नाटा रहा।
फिर वह धीमे से बोला—
“सर…
ये लोग हमें कहाँ ले जाकर मारेंगे?”
अनीश हँस पड़ा।
उसने जोगी के सिर पर हाथ फेरा।
“अब कोई हमें छुएगा भी नहीं।”
फिर उसने सिगरेट उसकी ओर बढ़ाई।
“अभी सब भूल जा।
बस आराम कर।”
—
जोगी दो दिन अस्पताल में रहा।
कंधे का गहरा घाव था। टाँके लगे थे।
दर्द कम करने की दवाएँ लगातार दी जा रही थीं।
उन दो दिनों में अनीश शायद ही उससे दूर हुआ हो।
अनीश पर कोई सीधा आपराधिक आरोप नहीं था।
सिर्फ़ औपचारिक पूछताछ और जाँच की प्रक्रिया चल रही थी।
उसने पहले ही अपनी ज़मानत की व्यवस्था कर रखी थी।
वह जोगी के साथ साए की तरह बना रहा।
पैसे, रौब और पुराने संपर्क—
सबका इस्तेमाल कर उसने अस्पताल के आसपास तैनात कुछ पुलिसवालों को भी अपने पक्ष में कर लिया था।
जोगी के कमरे के बाहर हमेशा दो सिपाही खड़े रहते।
कहने को पुलिस पहरा था।
असल में सुरक्षा।
दूसरे दिन शाम को अनीश का फोन बजा।
उसने स्क्रीन देखी, फिर बिना कुछ कहे मोबाइल जोगी की ओर बढ़ा दिया।
“तेरे लिए है।”
जोगी ने हैरानी से फोन लिया।
स्क्रीन पर एक साथ कई चेहरे उभरे।
वही लड़कियाँ।
किसी के सिर पर पट्टी थी।
किसी की बाँह पर बैंडेज।
पर इस बार उनकी आँखों में वैसा डर नहीं था।
सबसे आगे वही दुबली-सी लड़की थी
जो बस में चढ़ने से डर रही थी।
उसने हिचकते हुए हाथ हिलाया।
“जोगी भैया…”
जोगी कुछ पल स्क्रीन को देखता रह गया।
फिर लड़की ने धीमे से कहा—
“उस दिन… हम डर गए थे।”
पीछे खड़ी दूसरी लड़की बोली—
“दीदी ने फोन कराया है।
हम बस ये बोलना चाहते थे…
हमें बचाने के लिए थैंक यू।”
कमरे में कुछ पल चुप्पी रही।
जोगी की आँखों में हल्की नमी उतर आई।
इस बार उसने नज़र नहीं चुराई।
उसके होंठ हिले—
“कोई बात नहीं, बच्चों। अब बस डरना मत।”
“बाय, जोगी भैया!”
“बाय, अनीश अंकल!”
कॉल कट गया।
अनीश खिड़की के पास खड़ा रहा।
उसने चुपके से आँखें पोंछीं, फिर हँस पड़ा।
“इमोशनल कर दिया बच्चियों ने।”
—
उधर—
नवीना जांगिड़ को पड़ा वह थप्पड़ आग की तरह फैल चुका था।
सोशल मीडिया पर वही वीडियो बार-बार चल रहा था।
किसी ने उस पर फिल्मी संगीत लगा दिया था।
किसी ने स्लो-मोशन बना दिया था।
किसी ने मीम।
हर जगह वही दृश्य।
चटाक।
नवीना का चेहरा घूमता हुआ।
लोग लिख रहे थे— “सदी का सबसे संतोषजनक थप्पड़।”
मुख्यधारा के समाचार चैनल भी पीछे नहीं थे।
अनीश द्वारा भेजे गए दस्तावेज़, फोटो और रिकॉर्डिंग
लगातार प्रसारित हो रहे थे।
मानव तस्करी, फर्जी NGO,
विदेशी फंडिंग और राजनीतिक संरक्षण— पूरा जाल धीरे-धीरे सामने आ रहा था।
पुलिस विभाग पर उँगलियाँ उठ रही थीं।
मंत्री, अधिकारी—सब धीरे-धीरे इस मामले से हाथ खींचने लगे।
किसी ने खुलकर नवीना का बचाव नहीं किया।
फिर एक और दृश्य सामने आया।
बस से उतारी जा रही एक बच्ची की लाश।
सफेद चादर में ढकी हुई।
चार पुलिसवाले उसे नीचे ला रहे थे।
पीछे खड़ी लड़कियों के चेहरों पर जमा सन्नाटा
कई चैनलों ने बार-बार दिखाया।
कुछ ने तस्वीर धुंधली कर दी। कुछ ने नहीं की।
कुछ ने बस इतना लिखा— “सबको नहीं बचाया जा सका।”
इसके बाद सोशल मीडिया का रंग थोड़ा बदल गया।
मीम के बीच मातम घुल गया।
गुस्सा और भारी हो गया।
दूसरी तरफ़ सवाल भी उठने लगे।
कुछ कानूनी विशेषज्ञों ने पूछा—
“अगर नागरिक हथियार लेकर खुलेआम न्याय करने लगेंगे, तो कानून का क्या होगा?”
एक रिटायर्ड पुलिस अधिकारी ने टीवी बहस में कहा—
“ये बचाव सराहनीय हो सकता है, लेकिन हथियारबंद कार्रवाई को वैध नहीं ठहराया जा सकता।
अदालत को इन दोनों के खिलाफ सख्त रुख अपनाना चाहिए।”
मीडिया में बहस छिड़ गई।
हीरो— या कानून तोड़ने वाले?
—
दो दिन बाद—
जोगी की अदालत में पेशी थी।
पुलिस वैन अदालत परिसर के बाहर रुकी।
जोगी जैसे ही उतरा, भीड़ में हलचल मच गई।
कैमरे ऊपर उठे, नारे गूँजने लगे।
“जोगी भैया ज़िंदाबाद! अनीश सर ज़िंदाबाद!”
पुलिस किसी तरह उसे भीतर लाई।
कोर्टरूम में दाखिल होते ही तालियाँ गूँज उठीं।
जज ने तुरंत हथौड़ा मेज़ पर पटका—
“शांति रखिए।”
भीड़ फिर भी कुछ पल तक शांत नहीं हुई।
जज ने चश्मे के ऊपर से सबको देखा।
“अगर आप लोगों को इनका मंदिर बनाना है, तो बाहर जाकर बनाइए।
अदालत में नहीं।”
धीरे-धीरे शांति लौट आई।
कुछ देर बहस चली।
सरकारी वकील ने अपनी दलीलें रखीं।
बचाव पक्ष ने भी।
जज ने अंत में चश्मा उतारकर मेज़ पर रख दिया।
“अदालत अपना फैसला लंच के बाद सुनाएगी।”
हथौड़ा फिर गिरा।
—
अदालत कक्ष के बाहर—
अनीश और जोगी पुलिस की निगरानी में खड़े थे।
जोगी की हथकड़ियाँ अब खोल दी गई थीं।
भीड़ थोड़ी दूर रोक दी गई थी।
तभी—
कॉरिडोर के उस पार एक परिचित आकृति दिखाई दी।
लाल रंग का चटख कुर्ता-पायजामा।
हल्का मेकअप।
कंधे पर पर्स।
मालती।
वह धीरे-धीरे उनकी ओर चली आ रही थी।
जोगी की नज़र एक पल को उसकी तरफ टिक गई।
गाड़ी वाले उस छोटे-से सफ़र के बाद पहली बार दोनों को ठहरकर एक-दूसरे को देखने का मौका मिला था।
मालती सामने आकर रुक गई।
दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखते रहे।
मालती की नज़र सीधे जोगी की पट्टी बँधी बाँह पर गई।
“दवा ली?” उसने धीमे से पूछा।
जोगी हल्का-सा मुस्कराया।
“तुम्हारे हुक्म के बाद कैसे न लेता? दवा भी ली, हस्पताल भी गया।”
मालती के होंठों पर हल्की मुस्कान आई।
“अच्छा किया। वरना जज साहब से पहले ही ऊपरवाले के दर्शन हो जाते।”
जोगी बस उसे देखता रह गया।
मालती की आँखों में वही नरमी थी।
पर इस बार जोगी की आँखों में कुछ और भी था।
उसने धीमे से कहा—
“वो बच्ची…”
आगे नहीं बोल सका।
मालती का चेहरा ज़रा-सा ठहरा।
फिर वह और पास आ गई।
“वो तुम्हारी गलती नहीं थी,” उसने उतनी ही धीमी आवाज़ में कहा।
जोगी ने नज़रें झुका लीं।
“बच्ची तो नहीं रही…”
“हाँ,” मालती ने बहुत हल्के से कहा,
“पर बाकी तुम्हारी वजह से ज़िंदा हैं।”
जोगी चुप रहा।
वह उसे गले लगाना चाहता था।
पर अनीश वहीं खड़ा था।
अनीश भी दोनों को देख रहा था।
उसने माहौल हल्का करने की कोशिश की।
“अरे यार, तुम लोग भी…”
फिर जोगी की तरफ देखा।
“डॉक्टर मैडम तेरी तबीयत पूछने आई हैं—
और तू ऐसे खड़ा है जैसे इंटरव्यू दे रहा हो।
गले मिल ले भाई।”
फिर उसने पास खड़े सिपाही की ओर देखा।
“इजाज़त है, हवलदार साहब?”
सिपाही मुस्करा दिया।
जोगी और मालती एक-दूसरे से लिपट गए।
जोगी के पूरे शरीर में
जैसे एक साथ बिजली दौड़ गई।
—
जज साहब लंच के बाद फिर से अदालत कक्ष में आए।
कमरे में असामान्य सन्नाटा था।
हर सीट भरी हुई।
दीवारों से टिके लोग।
पीछे खड़े कैमरे।
अनीश और जोगी कटघरे के पास खड़े थे।
जज ने फ़ाइल खोली।
कुछ पल पन्ने पलटे।
फिर चश्मा नाक पर थोड़ा ऊपर खिसकाया और बोलना शुरू किया।
— जारी —