कमरे में हल्की पीली रोशनी थी।
दीवारों पर परछाइयाँ हिल रही थीं।
त्रिशा जैकब्स अभी भी काला चोगा पहने खड़ी थी।
पर लाल दैत्य मुखौटा उसने उतार दिया था।
टेबल पर रखा उसका फोन स्पीकर पर था।
उधर से घबराई हुई आवाज़ आ रही थी—
“म-मैडम… वो… वो निकल गए…”
त्रिशा की आँखें सिकुड़ गईं।
“क्या मतलब निकल गए?”
उधर से वही आदमी लगभग रोते हुए बोला—
“मैडम… हमारे बहुत से लोग मारे गए… पूरा हाईवे… आग लगी है… गाड़ियाँ उलटी पड़ी हैं…”
त्रिशा ने दाँत भींचे।
“जॉन? वो विदेशी?”
फोन के उस पार कुछ सेकंड सन्नाटा रहा।
फिर टूटी हुई आवाज़—
“पता नहीं मैडम… यहाँ चारों तरफ आग लगी है… हम कुछ लोगों को अस्पताल—”
त्रिशा ने फोन काट दिया।
एक पल कमरे में सन्नाटा रहा।
फिर उसने गुस्से में फोन उठाकर दीवार की ओर फेंक दिया।
“Dammit.”
उसने लाल मुखौटा फिर से उठा लिया।
चेहरे पर चढ़ाया।
फिर तेज़ क़दमों से कमरे से बाहर निकल गई।
होटल के गलियारों से गुजरते हुए
वह एक छोटे बंद कमरे के सामने आकर रुकी।
दरवाज़ा खोला।
अंदर—
टेबल के पास दो और चोगा पहने साये बैठे थे।
एक लाल दैत्य मुखौटे में—नवीना।
और दूसरी, सुनहरे मुखौटे में—स्वामिनी।
त्रिशा अंदर आई।
दरवाज़ा बंद हुआ।
अब कमरे में सिर्फ़ तीन लोग थे।
तीनों मेज़ के इर्द-गिर्द बैठ गए।
त्रिशा बोलने ही वाली थी—
पर स्वामिनी ने धीरे से उंगली अपने होंठों पर रख दी।
चुप।
फिर उसकी वही धीमी, फुसफुसाती आवाज़ कमरे में तैर गई—
“बहुत समय बाद… किसी ने त्रिकोण को शिकस्त दी है।”
नवीना और त्रिशा दोनों चुप रहीं।
कुछ सेकंड बाद नवीना बोली—
“अब?”
स्वामिनी ने धीरे से अपनी मुट्ठी खोली।
उसकी हथेली पर तीन छोटी गोलियाँ रखी थीं।
पीली-सफेद।
नवीना ने एक उठाई।
त्रिशा ने भी एक उठा ली।
नवीना धीरे से बोली— “दस साल पहले… जब हमने त्रिकोण शुरू किया था—”
स्वामिनी ने तुरंत उसकी बात काट दी। वही धीमी फुसफुसाहट—
“नहीं।
त्रिकोण हजारों साल पुराना है।
हम तो सिर्फ़ तीन नए कोण हैं।
एक कोण टूटता है…
तो दूसरा बन जाता है।”
उसकी आवाज़ और धीमी हो गई।
“त्रिकोण… अजर है।
अमर है।”
त्रिशा ने धीमे से कहा—
“नवीना को अब गायब हो जाना चाहिए।”
स्वामिनी हल्का हँसी।
“इसका बिल्कुल उल्टा।”
उसने नवीना की ओर देखा।
“नवीना… तुम्हें वहीं होना चाहिए।
उस मीडिया के जमावड़े में।
नैरेटिव कंट्रोल करते हुए।”
कमरे में कुछ पल सन्नाटा रहा।
त्रिशा बोली—
“हम उन्हें शहर में रोक सकते हैं।
मेरे लोग स्टैंडबाय पर हैं।”
स्वामिनी ने सिर हिलाया।
“हाईवे पर, सबकी नज़रों से दूर
तुमने पूरी फ़ौज लगा दी।
कुछ कर नहीं सकीं।
अब जब सबके सामने तमाशा करोगी—
तो सीधे शामिल हो जाओगी।”
एक ठंडी सांस।
“अब जो होना है… वह होकर रहेगा।”
कुछ सेकंड कोई नहीं बोला।
स्वामिनी उठ खड़ी हुई।
उसने दरवाज़े की ओर इशारा किया—
“नवीना… इससे पहले तुम जाओ,
हमें अपना कार्यक्रम पूरा करना है।”
नवीना ने सिर उठाकर उसकी ओर देखा।
“कार्यक्रम?”
स्वामिनी ने कोई जवाब नहीं दिया।
बस दरवाज़े की ओर इशारा किया।
“चलो।”
तीनों कमरे से बाहर निकलीं।
—
लंबा गलियारा।
दीवारों पर पीली रोशनी।
कुछ ही सेकंड बाद वे फिर उसी बड़े हॉल में पहुँचीं।
जहाँ अभी कुछ देर पहले सभा हुई थी।
सैकड़ों चोगाधारी लोग अब भी वहाँ मौजूद थे।
सफेद मुखौटे।
हुड के नीचे छिपे चेहरे।
जैसे ही तीनों मंच की ओर बढ़ीं—
भीड़ अपने आप दो हिस्सों में बँटती चली गई।
तीनों मंच पर चढ़ गईं।
स्वामिनी बीच में खड़ी हुई।
नवीना और त्रिशा उसके दोनों ओर।
हॉल में सन्नाटा था।
सिर्फ़ धीमी घंटियों जैसी आवाज़।
स्वामिनी की फुसफुसाहट फिर गूँजी—
“आज… त्रिकोण पर आघात हुआ है।”
सफेद मुखौटे स्थिर खड़े रहे।
“हमारे एक कोण ने अपनी शक्ति का उपयोग किया।
पर परिणाम… विफलता।”
हॉल में एक धीमी सरसराहट फैल गई।
स्वामिनी ने धीरे से नवीना की ओर देखा।
“आगे आओ।”
नवीना एक कदम आगे बढ़ी।
अब वह पूरे हॉल के सामने खड़ी थी।
सैकड़ों सफेद मुखौटे उसकी ओर देख रहे थे।
स्वामिनी ने कहा—
“मास्क उतारो।”
नवीना ने एक पल देखा। फिर उतारा।
हॉल में पूर्ण सन्नाटा था।
“चोगा उतारो और घुटनों पर बैठो।” स्वामिनी का आदेश था।
कुछ सेकंड तक नवीना खड़ी रही।
फिर चोगा उतार फेंका।
मंच पर सबके सामने निर्वस्त्र।
घुटनों पर बैठी।
स्वामिनी ने हाथ उठाया और गरजी, उसकी आवाज़ पूरे हॉल में गूंजी —
“यह दंड नहीं है।
यह स्मरण है।
कि त्रिकोण… यहाँ के हर व्यक्ति से बड़ा है। हर कोण से भी बड़ा है।”
उसने हाथ नीचे कर लिया।
“उठो।”
नवीना धीरे से खड़ी हुई।
स्वामिनी ने भीड़ की ओर देखा।
“कोण टूटते हैं।
पर त्रिकोण…
अमर है।”
हॉल में खड़े सभी सफेद मुखौटे एक साथ झुक गए।
फिर स्वामिनी ने नवीना की ओर देखा।
“अब जाओ।
अपना कर्तव्य पूरा करो।”
नवीना ने अपना चोगा उठाना चाहा, पर स्वामिनी ने उसपर पैर रख दिया।
“आज नहीं। आज ऐसे ही।”
नवीना मंच से नीचे उतरी।
हॉल के बीचों-बीच एक लंबा रास्ता अपने आप खाली हो गया।
दोनों तरफ—
सफेद मुखौटों की कतारें।
सैकड़ों।
सब स्थिर खड़े थे।
न कोई हँसी।
न कोई फुसफुसाहट।
बस घंटियों की वही धीमी आवाज़।
नवीना उस रास्ते पर चलती रही।
हर कदम के साथ उसे महसूस हो रहा था—
सैकड़ों आँखें उसे देख रही हैं।
सफेद मुखौटों के पीछे से।
किसी ने उसे छुआ नहीं।
किसी ने कुछ कहा नहीं।
बस जैसे ही वह पहली कतार के पास पहुँची—
दोनों तरफ खड़े लोगों ने एक साथ हल्का सा सिर झुकाया।
फिर स्थिर।
दूसरी कतार।
फिर वही।
हल्का सा झुकाव।
कोई आवाज़ नहीं।
कोई शब्द नहीं।
सिर्फ़ वह मौन।
नवीना उस रास्ते पर चलती रही।
हर कदम उसे याद दिला रहा था—
कि अभी कुछ देर पहले वह भी इसी मंच पर एक कोण थी।
और अब— सिर्फ़ एक व्यक्ति।
मंच पर त्रिशा बिल्कुल स्थिर खड़ी थी।
उसकी आँखें नवीना की पीठ पर टिकी थीं।
तभी स्वामिनी थोड़ा झुकी।
और बहुत धीमे—
त्रिशा के कान के पास फुसफुसाई—
“तुम और नवीना… तुम्हारी हरकतों के सारे वीडियो हैं मेरे पास।”
त्रिशा की उँगलियाँ हल्की काँपीं।
स्वामिनी की आवाज़ और भी धीमी हो गई—
“अपनी वासना के लिए तुमने त्रिकोण के नियमों से खिलवाड़ किया है।”
उसने सीधा होकर खड़ा होते हुए कहा— “दोबारा मत करना।
वरना…”
उसकी निगाह नवीना की जाती हुई पीठ पर गई।
“…तुम्हारा भी यही हश्र होगा।”
त्रिशा का चेहरा मुखौटे के पीछे छिपा था।
पर उसकी साँसें भारी हो गई थीं।
स्वामिनी फिर बिल्कुल स्थिर खड़ी हो गई।
जैसे कुछ हुआ ही न हो।
दूर—
नवीना हॉल के दरवाज़े तक पहुँच चुकी थी।
उसने एक पल रुककर साँस ली।
फिर दरवाज़ा खोला।
और बाहर चली गई।
दरवाज़ा बंद हुआ।
हॉल के अंदर—
सैकड़ों सफेद मुखौटे फिर एक साथ स्थिर खड़े थे।
जैसे कुछ हुआ ही न हो।
पीछे— घंटियों की धीमी आवाज़ फिर गूँजने लगी।
—
दोपहर ढल चुकी थी।
सूरज क्षितिज की तरफ झुक रहा था।
अनीश ने न्यायालय जाने से पहले रास्ते में मालती को उठा लिया।
वह अपने साथ मेडिकल किट लाई थी।
गाड़ी चलती रही।
पीछे घायल लड़कियाँ।
किसी के माथे पर सूजन।
किसी की बाँह छिली हुई।
किसी के होंठ से खून।
मालती ने सीटों के बीच जगह बनाकर किट खोली और एक-एक की मरहम-पट्टी शुरू कर दी।
किसी के घाव पर दवा।
किसी को पानी।
किसी को बस सांत्वना—
“घबराओ मत। अब तुम सुरक्षित हो।”
फिर उसकी नज़र जोगी पर गई।
बाँह पर जमी हुई खून की परत।
कंधे के पास फटा कपड़ा।
चाकू का गहरा घाव।
“हाथ इधर करो,” उसने कहा।
जोगी हल्का-सा हँसा।
“मेरा खून तो पानी हो गया है।
हर कोई बहा जाता है।”
“चुपचाप बैठे रहो,” मालती ने रूई दबाते हुए कहा।
“वहाँ पहुँचने से पहले कम-से-कम तुम्हारा खून तो रुक जाए।
नहीं तो मीडिया में तुम्हारी वही घायल-घातक वाली तस्वीरें घूमेंगी।”
जोगी हँसा, पर दर्द से दाँत भींच लिए।
“मत हँसाओ, प्लीज़।
न जाने कहाँ-कहाँ दर्द उठ रहा है।”
“हॉस्पिटल ज़रूर चले जाना,” मालती ने गंभीर होकर कहा।
सामने शीशे के पार मीडिया की वैनें दिखने लगी थीं।
अनीश ने एक्सेलेरेटर थोड़ा और दबा दिया।
न्यायालय के बाहर भारी भीड़ थी।
मीडिया वैनें।
बड़ी-बड़ी लाइटें।
माइक्रोफोन लिए रिपोर्टर।
मोबाइल उठाए सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर।
मानो किसी प्रेस कॉन्फ़्रेंस का मंच तैयार हो।
तभी—
धूल उड़ाती हुई बस अदालत के गेट के सामने आकर रुकी।
दरवाज़ा खुला।
सबसे पहले उतरे—
अनीश।
उसके पीछे जोगी।
दोनों थके हुए।
घायल।
कपड़ों पर सूखा खून।
कैमरे तुरंत उनकी तरफ घूम गए।
“अनीश जी!”
“क्या हुआ था हाईवे पर?”
“कितनी लड़कियाँ थीं?”
“क्या यह मानव तस्करी का मामला है?”
सवालों की बौछार।
उसी बीच—
बस से एक-एक करके लड़कियाँ उतरने लगीं।
डरी हुई।
थकी हुई।
पर ज़िंदा।
भीड़ में हलचल मच गई।
तभी—
थोड़ी दूर एक काली कार आकर रुकी।
दरवाज़ा खुला।
सफेद साड़ी।
माथे पर बड़ी बिंदी।
नवीना जांगिड़।
वह तेज़ी से भीड़ चीरती हुई आगे बढ़ी।
अनीश और जोगी उसे घूर रहे थे।
नवीना सीधे एक लड़की के पास पहुँची।
उसे बाँहों में भर लिया।
कंधे पर हाथ रखा।
कैमरों की ओर मुड़ी।
उसकी आँखों में नकली आँसू चमक रहे थे।
“भगवान का शुक्र है…”
उसने भरी आवाज़ में कहा—
“मेरी बच्चियाँ मिल गईं।”
कैमरे चमकने लगे।
माइक्रोफोन उसकी ओर बढ़ गए।
“मैडम, क्या यह आपके NGO की लड़कियाँ थीं?”
“आपको कैसे पता चला?”
“क्या आपने ही रेस्क्यू ऑपरेशन कराया?”
नवीना जवाब देने ही वाली थी—
कि अचानक—
चटाक!
एक जोरदार थप्पड़।
पूरा परिसर एक पल को जम गया।
नवीना का सिर एक तरफ झटका खा गया।
वह गाल पकड़े स्तब्ध खड़ी रह गई।
जिस लड़की को उसने अभी गले लगाया था
वही उसके सामने खड़ी थी।
उसकी आँखों में आग थी।
वह चिल्लाई—
“ये औरत हत्यारिन है!”
भीड़ में खलबली मच गई।
लड़की ने काँपती उँगली उसकी ओर उठाई—
“इसी ने हमारी बहनों को मरवाया!”
“इसी ने हमें बेचा!”
बाकी लड़कियाँ भी चिल्लाने लगीं।
“हाँ!”
“इसी ने!”
“ये झूठ बोल रही है!”
कैमरे पागलों की तरह घूमने लगे।
माइक्रोफोन लड़कियों की तरफ मुड़ गए।
नवीना का चेहरा सफेद पड़ गया।
— जारी —