रूहों का सौदा - 17 mamta द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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रूहों का सौदा - 17


​अध्याय 17: ईर्ष्या की अग्नि और टूटती मित्रता
​महागुरु की घोषणा ने जश्न के रंग में भंग डाल दिया था। जैसे ही यह साफ़ हुआ कि लौरा पहले राउंड में अपना कौशल दिखाएगी और रुद्र को अंत तक इंतज़ार करना होगा, पूरे गुरुकुल की हवा ही बदल गई। जो उत्सव अभी तक मिलन और भाईचारे का प्रतीक था, वह अब सुलगते हुए विरोध और ईर्ष्या की राख में बदलने लगा था। मशालों की रोशनी अब भी वही थी, पर उनमें से निकलने वाला धुआं अब आँखों में चुभने लगा था।
​रुद्र की साख पर सवाल और सुलगता असंतोष
उत्तर परिसर (लड़कों) के छात्रों के बीच असंतोष की एक ऐसी लहर दौड़ी जिसने रातों-रात सबको दो हिस्सों में बाँट दिया। जो छात्र कल तक रुद्र के कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे, आज उनके स्वर कड़वाहट से भरे थे। अंधेरे कोनों में खड़ी टोलियाँ अब रुद्र की काबिलियत पर सरेआम चर्चा कर रही थीं।
​"क्या रुद्र की साख अब इतनी कम हो गई है कि उसे लड़कियों के प्रदर्शन के बाद मौका मिलेगा?" एक वरिष्ठ छात्र ने अपनी मुट्ठियाँ भींचते हुए गुस्से में कहा। उसकी आवाज़ में जलन साफ झलक रही थी।
​"महागुरु ने रुद्र को गले लगाकर हमें जो उम्मीद दी थी, वह तो केवल एक छलावा निकली। लड़कियों के आते ही रुद्र को हाशिए पर धकेल दिया गया!" दूसरे ने आग में घी डालते हुए कहा। धीरे-धीरे यह ज़हरीली बात पूरे मैदान में फैल गई कि रुद्र की अहमियत अब पहले जैसी नहीं रही। लड़कों को यह अपनी व्यक्तिगत हार और गुरुकुल के गौरव का अपमान महसूस होने लगा था। उन्हें लग रहा था कि उनकी शक्ति को कम करके आँका जा रहा है।
​दोस्ती में दरार और बंटा हुआ भोजन कक्ष
इसका सबसे गहरा और बुरा असर उन रिश्तों पर पड़ा जो अभी कल ही विश्वास की बुनियाद पर टिके थे। जो लड़के और लड़कियाँ साथ बैठकर हँसी-ठिठोली कर रहे थे, अब उनके बीच एक बर्फीली और कड़वाहट भरी चुप्पी छा गई थी। विश्वास की वह नाजुक डोर टूट चुकी थी।
​भोजन कक्ष, जहाँ कल रात ठहाके गूँज रहे थे, आज किसी युद्ध के मैदान जैसा लग रहा था। पूरा कक्ष स्पष्ट रूप से दो गुटों में बंट गया था। एक ओर लड़के बैठे थे जो सिर झुकाए गहरी कानाफूसी कर रहे थे, और दूसरी ओर लड़कियाँ, जो लौरा की बढ़ती अहमियत और शक्ति पर गर्व से मस्तक ऊँचा किए बैठी थीं। उनकी नज़रों में एक चुनौती थी, जो लड़कों के अहम को चोट पहुँचा रही थी।
​जब माधव ने हमेशा की तरह सहज भाव से एक छात्रा से बात करने की कोशिश की, तो पीछे से एक लड़के ने उसे झिड़कते हुए टोक दिया, "अब उनसे क्या बात करना माधव? अब तो वही इस गुरुकुल की नई पहचान और हस्ती हैं। हम तो बस आखिरी राउंड के इंतज़ार में बैठे वो प्यादे हैं जिनका इस्तेमाल तब होगा जब सब खत्म हो जाएगा।" माधव का हाथ रुक गया और उसने एक ठंडी आह भर कर अपना सिर झुका लिया।
​लौरा और रुद्र का बढ़ता तनाव
इस दमघोंटू माहौल ने लौरा और रुद्र के बीच की दूरी की खाई को और चौड़ा कर दिया। लौरा को अपनी जीत और काबिलियत पर गर्व था, लेकिन उसे यह भी लग रहा था कि लड़के जानबूझकर उसे नीचा दिखाने का रास्ता ढूंढ रहे हैं। उसकी आँखों में अब सौम्यता की जगह एक कठोरता ने ले ली थी।
​दूसरी ओर, रुद्र इस बात से अंदर ही अंदर टूट रहा था। उसे अपनी हार का डर नहीं था, बल्कि वह इस बात से दुखी था कि उसकी वजह से पूरे गुरुकुल की एकता खंडित हो रही थी। वह देख पा रहा था कि कैसे ईर्ष्या की यह आग शांति के उस महल को जला रही है जिसे बनाने में वर्षों लगे थे।
​लड़कों ने अब खुलेआम विद्रोह की राह चुन ली थी। वे समूह बनाकर आचार्यों के कक्ष के बाहर जमा होने लगे और नियमों में बदलाव की मांग उठाने लगे। अनुशासन की वह दीवार जो पहले भौतिक रूप से टूटी थी, अब मानसिक नफरत की एक ऐसी दीवार बनकर खड़ी हो रही थी जिसे पार करना नामुमकिन लग रहा था। सन्नाटा अब शांति का नहीं, बल्कि आने वाले किसी बड़े विस्फोट का संकेत दे रहा था।