खामोश ज़िंदगी के बोलते जज़्बात - 17 Babul haq ansari द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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खामोश ज़िंदगी के बोलते जज़्बात - 17

ख़ामोश ज़िंदगी के बोलते जज़्बात"


भाग 17: “पलटवार, परछाइयाँ और जागती उम्मीद”


रचना: बाबुल हक़ अंसारी

लेखक का पैगाम: मेरी खामोशी और आपका इंतज़ार

"मेरे अज़ीज़ पाठकों,"

आज बहुत दिनों बाद जब मैंने फिर से कलम उठाई है, तो उंगलियों में शब्दों से ज़्यादा एक लंबी खामोशी का बोझ था। यह वही खामोशी है जिसने मुझे इतने दिनों तक आप सबसे और मेरी अपनी कहानियों से जुदा रखा। ज़िंदगी कभी-कभी हमें ऐसे मोड़ों पर खड़ा कर देती है जहाँ हम दुनिया से नहीं, बल्कि अपने ही भीतर के तूफ़ानों और रूहानी अज़ियतों (तकलीफों) से लड़ रहे होते हैं।

इन बीते दिनों में सिर्फ मेरी कहानी ही नहीं रुकी थी, बल्कि ऐसा महसूस हो रहा था जैसे मेरे वजूद का एक हिस्सा कहीं ठहर गया हो। कुछ निजी मजबूरियाँ और कुछ अनचाही उलझनें थीं, जिन्होंने मुझे मेरी रूह—यानी मेरे लेखन—से दूर कर दिया। लेकिन आपकी वफ़ा और आपके सब्र ने आज मुझे दोबारा लौटने का हौसला दिया है।

आज मुझे काग़ज़ की नहीं, आपके उस अहसास की ज़रूरत है जिसने मुझे हमेशा ज़िंदा रखा। अगर आप अब भी इस सफ़र में मेरे साथ हैं, तो आपकी एक छोटी-सी आवाज़—आपका एक छोटा-सा कमेंट—मेरे उन तमाम ज़ख़्मों के लिए मरहम बन जाएगा जिन्हें मैंने इस खामोशी के दौर में झेला है।

क्या आप अपने इस लेखक की इस नई और बड़ी शुरुआत में उसके साथ हैं?

"ख़ामोश ज़िंदगी के बोलते जज़्बात"

भाग 17: “पलटवार, परछाइयाँ और जागती उम्मीद”

रचना: बाबुल हक़ अंसारी

 

पिछले खंड से…

“इतिहास दोबारा लिखा जा रहा है…”

और उसी पल, अस्पताल में नीरव की उँगलियाँ हल्की सी हिलीं।

  सत्ता का पलटवार

प्रेस कॉन्फ़्रेंस खत्म भी नहीं हुई थी कि बाहर अचानक अफरा-तफरी मच गई।

कई काले शीशों वाली गाड़ियाँ आकर रुकीं।

कुछ लोग तेजी से उतरे और चिल्लाए —

“प्रेस बंद करो! ये सभा गैर-कानूनी है!”

गुरु शंकरनंद माइक के सामने खड़े रहे।

उन्होंने भीड़ की तरफ देखा और शांत स्वर में बोले —

“सच को गैर-कानूनी कह देने से सच बदल नहीं जाता।”

भीड़ में तालियाँ गूँज उठीं।

लेकिन तभी एक नकाबपोश ने भीड़ के पीछे से पत्थर फेंका।

अफरा-तफरी मच गई।

पत्रकार कैमरे बचाने लगे।

गुरु शंकरनंद की आवाज़ फिर गूँजी —

“अगर मेरी आवाज़ रोकनी है, तो गोली चलाओ…

लेकिन ये किताब अब लोगों तक पहुँचकर रहेगी।”

 अस्पताल में उम्मीद

उधर अस्पताल के कमरे में मशीनों की धीमी आवाज़ चल रही थी।

आर्या अब भी नीरव का हाथ पकड़े बैठी थी।

अचानक नीरव की आँखें हल्की-सी खुलीं।

आर्या की साँस थम गई —

“नीरव…?”

नीरव ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा —

“आग… अनया… किताब… सब ठीक है ना?”

आर्या की आँखों से आँसू गिर पड़े।

“सब ठीक है… तुम वापस आ गए हो।”

नीरव ने मुश्किल से मुस्कुराकर कहा —

“तो फिर लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई…”

  नया मिशन

दो दिन बाद अस्पताल की छत पर नीरव, आर्या और अनया साथ बैठे थे।

नीरव अभी कमजोर था, लेकिन उसकी आँखों में वही पुरानी आग थी।

उसने धीरे-धीरे कहा —

“अगर ये लोग किताब को रोकना चाहते हैं…

तो हम उसे एक जगह क्यों रखें?”

अनया ने पूछा —

“मतलब?”

नीरव बोला —

“हम इस पांडुलिपि को हजारों हिस्सों में बाँट देंगे।

हर छात्र, हर गली, हर मोहल्ले में इसकी कॉपी जाएगी।

फिर देखता हूँ कौन-सी ताकत इसे रोकती है।”

आर्या मुस्कुराई —

“मतलब… अब ये सिर्फ़ किताब नहीं, आंदोलन बनेगी।”

नीरव ने सिर हिलाया —

“हाँ… और इस आंदोलन की अगुवाई तुम दोनों करोगी।”

 

 नई सुबह की शुरुआत

अगली सुबह शहर के अलग-अलग हिस्सों में एक ही पर्चा दिखाई दिया —

“रघुवीर त्रिपाठी की आख़िरी आवाज़ — जल्द आ रही है।”

लोगों में चर्चा शुरू हो गई।

कुछ डर रहे थे…

कुछ उत्साहित थे।

लेकिन एक बात साफ़ थी —

सच अब धीरे-धीरे परछाइयों से बाहर आ रहा था।

और दूर खड़ा वही नकाबपोश आदमी मोबाइल पर बोला —

“सर… मामला हाथ से निकल रहा है।”

फोन के दूसरी तरफ से ठंडी आवाज़ आई —

“तो फिर अगला कदम उठाओ…

इस बार किसी को बचना नहीं चाहिए।”

क्या आपको लगता है कि नीरव का यह 'किताब को आंदोलन बनाने' का फैसला सही है? अपनी राय कमेंट में ज़रूर दें।"

(जारी रहेगा… भाग 18 में)

अगले खंड में आएगा:

शहर भर में फैलती किताब की लहर

सत्ता की सबसे खतरनाक चाल

और एक नया किरदार, जो कहानी का रुख बदल सकता है