पार्थ और श्रुति: एक अधूरी प्रेम कहानी
अध्याय 1: 12वीं का वह सुनहरा और अनकहा साल पार्थ एक शांत लड़का था, जिसके मन में कविताओं का ज्वार उठता था, और श्रुति उसकी हर कविता का अनकहा शब्द थी। 12वीं कक्षा में वे दोनों एक ही क्लास में थे। पूरा स्कूल जानता था कि पार्थ की नजरें अक्सर श्रुति को ढूंढती हैं, और श्रुति का लंच बॉक्स हमेशा पार्थ के लिए ही पहले खुलता है। पार्थ अक्सर अपनी डायरी में श्रुति के लिए कविताएँ लिखता, लेकिन जब भी वह उसके सामने आता, उसकी सारी शब्दावली जैसे गायब हो जाती। श्रुति भी पार्थ के उस संकोच को पहचानती थी। वह जानबूझकर अपनी किताबें पार्थ के पास छोड़ देती ताकि वह बात करने का कोई बहाना ढूंढ सके।
बोर्ड परीक्षा के दिन करीब आ रहे थे। फेयरवेल की शाम थी। पार्थ के पास एक मौका था कि वह श्रुति को बता दे कि 'श्रुथ' (उनके नामों का संगम) शब्द उसके लिए क्या मायने रखता है। उसने अपनी जेब में एक छोटा सा खत रखा था, जिसमें लिखा था— "श्रुति, क्या तुम मेरी जिंदगी की सबसे सुंदर कविता बनोगी?" लेकिन, उस शाम पार्थ ने देखा कि श्रुति अपने परिवार के साथ घर जाने के लिए जल्दी में थी। उसने सोचा, "अभी तो रिजल्ट आना बाकी है, फिर कॉलेज में तो हम साथ ही होंगे, तब कह दूँगा।" यही वह छोटी सी चूक थी, जहाँ से दूरियों की शुरुआत होनी थी।
अध्याय 2: बी.ए. (B.A.) का मोड़ और बिछड़ते रास्ते रिजल्ट आया, दोनों पास हो गए। लेकिन जिंदगी ने अपनी चाल बदल दी। पार्थ ने अपने गांव 'कोटोली' के पास रहकर कृषि और साहित्य की राह चुनी, जबकि श्रुति के परिवार ने उसे बी.ए. की पढ़ाई के लिए कोल्हापुर के एक बड़े कॉलेज में भेज दिया। बी.ए. के प्रथम वर्ष में शुरुआती कुछ दिन तो फोन कॉल्स और मैसेज पर बीते। पार्थ उसे अपनी नई कविताओं के बारे में बताता, और श्रुति उसे शहर के नए माहौल और कॉलेज के किस्से सुनाती। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, सिलेबस का बोझ और नए सामाजिक दायरों ने उनके बीच एक अदृश्य दीवार खड़ी कर दी।
पार्थ अब अपने खेतों में 'अक्षत फार्म' के सपनों और 'काव्य धारा' की रचनाओं में व्यस्त रहने लगा। दूसरी ओर, श्रुति कोल्हापुर की नई दुनिया में खुद को ढालने लगी। जो बातें पहले घंटों चलती थीं, अब 'गुड मॉर्निंग' और 'गुड नाइट' तक सिमट गईं। एक दिन, बी.ए. सेकंड ईयर के दौरान, पार्थ ने उसे कॉल किया। श्रुति किसी कॉलेज प्रोजेक्ट में व्यस्त थी। उसने कहा, "पार्थ, मैं बाद में बात करती हूँ।" वह 'बाद में' कभी नहीं आया। पार्थ को लगा कि शायद श्रुति अब बदल गई है, और श्रुति को लगा कि पार्थ अब उसकी परवाह नहीं करता। बिना किसी झगड़े के, बिना किसी शोर के, दो दिल खामोशी से बिछड़ गए।
अध्याय 3: अधूरी प्रेम कहानी का दर्द आज भी जब पार्थ अपनी डायरी निकालता है, तो पन्नों के बीच सूखा हुआ वह गुलाब और वह अनकहा खत मिलता है। उसे मलाल होता है कि काश 12वीं की उस शाम उसने हिम्मत दिखाई होती। प्रोपोज न कर पाने की वह एक पल की झिझक, सालों के अलगाव का कारण बन गई। श्रुति भी कोल्हापुर के उस भीड़भाड़ वाले कॉलेज में कभी-कभी अकेलापन महसूस करती है। वह सोचती है कि काश पार्थ ने उसे रोक लिया होता, या कम से कम एक बार हक से अपना प्यार जाहिर कर दिया होता।