साल 1540 की एक ठंडी सुबह। अरावली की ऊँची पहाड़ियों के बीच स्थित कुंभलगढ़ किला अपने विशाल द्वारों और मजबूत दीवारों के साथ एक नए इतिहास का साक्षी बनने वाला था। किले के भीतर हलचल थी, सैनिकों की चौकसी बढ़ा दी गई थी और महल के अंदर रानियों और दासियों की भागदौड़ चल रही थी।
महारानी के कक्ष के बाहर कई दासियाँ खड़ी थीं। अंदर से कभी दर्द की आवाज आती, तो कभी दाई का आश्वासन सुनाई देता। आज मेवाड़ के राजा उदय सिंह द्वितीय की पहली रानी जयवंता बाई संतान को जन्म देने वाली थीं। पूरे किले में प्रार्थनाएँ हो रही थीं कि राजवंश को एक योग्य उत्तराधिकारी मिले।
महल के बाहरी प्रांगण में राजा उदय सिंह चिंतित होकर टहल रहे थे। उनके चेहरे पर एक साथ कई भाव थे—उत्सुकता, चिंता और कहीं न कहीं भविष्य की आशंका। उनके पास खड़े मंत्री और सेनापति बार-बार उन्हें धैर्य रखने की सलाह दे रहे थे।
“महाराज, सब शुभ होगा,” मंत्री ने कहा।
उदय सिंह ने हल्की मुस्कान दी, लेकिन उनके मन में कई विचार चल रहे थे। मेवाड़ उस समय शांति में नहीं था। दिल्ली और आगरा की तरफ से मुगलों की शक्ति दिन-प्रतिदिन बढ़ रही थी, और पूरे राजपूताना में हलचल थी।
उसी समय अचानक महल के भीतर से एक नवजात शिशु के रोने की आवाज गूंजी।
एक पल के लिए पूरा प्रांगण शांत हो गया।
फिर कुछ ही क्षणों में महल का दरवाजा खुला और दाई बाहर आई। उसके चेहरे पर खुशी साफ दिखाई दे रही थी।
“बधाई हो महाराज!” दाई ने झुककर कहा, “राजकुमार हुआ है।”
यह सुनते ही वहां खड़े सैनिकों और सेवकों के चेहरे खिल उठे। नगाड़े बजने लगे। महल में खुशियों की लहर दौड़ गई।
उदय सिंह ने गहरी सांस ली। उनके चेहरे पर राहत की झलक आई, लेकिन वे तुरंत अंदर जाने के बजाय कुछ पल के लिए आकाश की ओर देखने लगे, जैसे किसी अदृश्य शक्ति का धन्यवाद कर रहे हों।
कुछ देर बाद वे अंदर गए। कमरे में हल्की सुगंध थी। दीपक की लौ धीरे-धीरे जल रही थी। जयवंता बाई थकी हुई थीं, लेकिन उनकी आंखों में मातृत्व की चमक थी।
उनकी गोद में छोटा सा बालक था—मजबूत भुजाएँ, बड़ी आँखें और चेहरे पर एक अनोखी दृढ़ता।
जयवंता बाई ने मुस्कुराते हुए कहा,
“महाराज, देखिए… हमारा पुत्र।”
उदय सिंह ने बालक को ध्यान से देखा। कुछ पल के लिए उनके चेहरे पर भाव बदल गए—जैसे वे उस छोटे से बालक में कोई अलग ही शक्ति महसूस कर रहे हों।
उन्होंने धीरे से कहा,
“इसमें कुछ अलग है।”
जयवंता बाई ने प्यार से बालक के माथे को चूमा।
“यह मेवाड़ की रक्षा करेगा,” उन्होंने विश्वास से कहा।
उसी समय बाहर से राजपुरोहित के आने की सूचना मिली। परंपरा के अनुसार नवजात राजकुमार की कुंडली बनानी थी।
राजपुरोहित अंदर आए। उन्होंने बालक को देखा, फिर आकाश की ओर देखा और कुछ गणना करने लगे।
कमरे में एक अजीब सी गंभीरता छा गई।
कुछ क्षणों बाद राजपुरोहित बोले—
“महाराज, यह बालक साधारण नहीं है।”
उदय सिंह ने उत्सुकता से पूछा,
“क्या कहते हैं ग्रह-नक्षत्र?”
राजपुरोहित ने गंभीर स्वर में कहा—
“यह बालक बहुत महान योद्धा बनेगा… लेकिन इसका जीवन संघर्षों से भरा होगा। यह कभी झुकेगा नहीं, चाहे इसके सामने कितनी ही बड़ी शक्ति क्यों न आ जाए।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
जयवंता बाई ने तुरंत बालक को और कसकर सीने से लगा लिया।
राजपुरोहित आगे बोले—
“इसके सामने कई साम्राज्य आएंगे… लेकिन यह अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं करेगा। यह अपने राज्य और धर्म की रक्षा के लिए सब कुछ त्याग देगा।”
उदय सिंह कुछ देर तक चुप रहे। उन्हें यह भविष्यवाणी गौरवपूर्ण भी लगी और कहीं न कहीं भयावह भी।
“इसका नाम क्या रखा जाए?” उन्होंने पूछा।
राजपुरोहित ने मुस्कुराकर कहा—
“यह बालक प्रतापी होगा… इसका नाम होना चाहिए—प्रताप।”
कमरे में उपस्थित सभी लोगों ने एक साथ कहा—
“राजकुमार प्रताप!”
उस दिन से मेवाड़ को उसका भविष्य मिल चुका था—
महाराणा प्रताप।
समय धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा।
कुछ वर्षों बाद।
कुंभलगढ़ के विशाल मैदान में एक छोटा सा बालक तलवार चलाने की कोशिश कर रहा था। तलवार उसके लिए अभी भारी थी, लेकिन उसकी आँखों में हार मानने का भाव नहीं था।
गुरु ने मुस्कुराते हुए कहा,
“राजकुमार, अभी आप छोटे हैं।”
बालक प्रताप ने दृढ़ आवाज में कहा—
“लेकिन मैं सीखूंगा।”
उसकी बात सुनकर गुरु और सैनिक एक-दूसरे को देखने लगे।
छोटे से प्रताप में जो आत्मविश्वास था, वह किसी साधारण बालक में नहीं था।
उसी समय दूर से जयवंता बाई उन्हें देख रही थीं। उनके चेहरे पर गर्व था।
कुछ ही सालों में प्रताप घुड़सवारी, धनुर्विद्या और तलवारबाजी में निपुण होने लगे। उन्हें जंगलों में घूमना पसंद था। वे अक्सर भील जनजाति के लोगों के साथ समय बिताते थे।
वहीं उन्होंने जंगलों के रास्ते सीखे, प्रकृति के साथ जीना सीखा और सबसे बड़ी बात—जनता का दर्द समझना सीखा।
एक दिन जंगल में घूमते हुए प्रताप की नजर एक छोटे घोड़े पर पड़ी।
घोड़ा बाकी घोड़ों से अलग था—तेज, मजबूत और जिद्दी।
प्रताप उसकी ओर बढ़े।
घोड़ा पहले थोड़ा पीछे हट गया, लेकिन कुछ ही देर में प्रताप ने उसका विश्वास जीत लिया।
प्रताप ने मुस्कुराकर कहा—
“अब से तुम मेरे मित्र हो।”
यही घोड़ा आगे चलकर इतिहास में अमर होने वाला था—
चेतक।
किले में लौटते समय प्रताप के चेहरे पर एक अजीब सी चमक थी।
उन्हें नहीं पता था कि आने वाले वर्षों में उनका जीवन केवल राजकुमार का नहीं रहेगा—बल्कि एक ऐसे योद्धा का होगा, जिसकी कहानी सदियों तक सुनाई जाएगी।
दूर अरावली की पहाड़ियों पर सूर्य अस्त हो रहा था।
लेकिन उस डूबते सूर्य के साथ एक नया सूर्य जन्म ले चुका था—
जो आने वाले समय में मेवाड़ की आन-बान-शान बनकर चमकेगा।
और यही से शुरू होती है उस योद्धा की कहानी…
जो कभी झुका नहीं।