श्रापित एक प्रेम कहानी - 54 CHIRANJIT TEWARY द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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श्रापित एक प्रेम कहानी - 54

सभी आलोक की और बड़े गौर से दैख रहा था । आलोत अपनी जारी रखते हुए कहता है--

> उनकी सरीर पर लगी खरोंचे किसी इंसान के नही हो सकते है। इतनी बड़ी और गहरी नाखुन किसी इंसान के हो ही नही सकते । 

आलोक की बात सुनकर एकांश कहता है--

> तुम बिल्कुल सही कह रहे हो आलोक । मैने भी निलु काका के खरोंचे को दैखा वो इंसान के नाखुन नही हो सकते। ये लोग हम सब से कुछ छुपा रहे है। क्योकी आज कुछ दैर पहले एक आदमी मेरे पास आया और कहां के कल मेले के भाग दौड़ मे उसके पैर मे चौंट आ गई है पर जब मैने उसका पैर चैक किया तो उसके पैर मे कुछ नही हुआ था वो सिर्फ झुठ मे दर्द का बहाना कर रहा था मुझे ये बात कुछ अजीब लगी पर जब मैं वहां वापस दवाई लेकर गया तो मैने दैखा की निलु काका उसे चैतन कह के बुला रही था और आपस मे कुछ बात कर रहा था ये दौनो पहले से हूँ एक दुसरे जानते है और मुझे दैखकर दौनो चुप हो गए। तभी मुझे लगी के कुछ तो गड़बड़ है। 

आलोक कहता है--

>> कुछ तो है वरना उस दिन बड़े पापा का यूं हॉस्पिटल आ जाना और फिर आज सुबह सुबह दयाल काका का आना और निलु काका के कान मे कुछ कहना इशारे करना ये सब अजीब लग रहा है।


 तभी गुणा कहता है , क्यो ना हम सब जाकर निलु काका से ये सब पूछ ले ?
 आलोक कहता है --

> नही गुणा निलु काका से ये सब पूछकर कोई फायदा नही होगा क्यूंकी बड़े पापा और दयाल काका ने उन्है पहले से ही कुछ भी बताने से मना किया है। 

तभी चतुर कहता है--

> तो फिर हमे पता कैसे चलेगी के सच क्या है। 

आलोक कहता है --

> दैख यार मुझे पता है के तुं सबके मन मे अभी बहुत सारे सवाल है जो मेरे मन मे भी है और इसका उत्तर अभी मुझे नही पता। पर मुझे यकीन है के इन सब बातों का कनेक्सन कही ना कही कुंम्भन से है। और इन सब बातो का जवाब हमे एक इंसान से मिल सकता है। 

वृन्दां झट से पूछती है --

> किससे ? 

आलोक सबकी और दैखता है और कहता है--

> चेतन से। हमे चेतन पर नजर रखनी होगी। क्योकी 
जिस तरह से वह एकांश और वर्शाली के बारे मे पूछ रहा था तभी मुझे उस पर शक हो गया था के आखिर वो वर्शाली के बारे मे इतना क्यो जानना चाहता है। 

आलोक की बात सुनकर एकांश घबरा जाता है और सौचने लगता है--

" के ये चेतन को वर्शाली के बारे मे कैसे पता चला। कही चेतन ही कुंम्भन तो नही जो अपना रुप बदलकर आया है ताकी वह उस शक्ती का पता लगा सके जिससे वह घायल हुआ था।

इतना सौचकर एकांश टेंसन मे आ गया था और गुस्से से चतुर से पूछता है। चतुर तुमने चैतन को वर्षाली के बारें में क्या बताया और वह तुमसे वर्षाली के बारे में क्या पूछ रहा था।


चतुर कहता है---

> अरे वो पागल है पता नही क्या क्या बोले जा रहा था। 

एकांश फिर चतुर पर गुस्सा होकर कहता है--

> जितना पूछा हूण बस उसका जवाब दे। 

एकांश के ऐसै अचानक गुस्सा होकर पूछने से सभी हैरान हो जाता है। चतुर घबराते हूए कहता है--

> वो बता रहा था के मेला मे किसी शक्ती ने कुंम्भन 
को मार भगाया था और हम सब से उसी के बारे में पूछ रहा था के क्या किसीने उस शक्ती को दैखा था या नही।

 एकांश चिड़कर कहता है--

> तो फिर तुमने क्या कहा ? 

चतुर एकांश के बरताव से हैरान हो जाता है पर चतुर इन सब बातो का ज्यादा ध्यान नही देता और कहता है--

> मैने तो बस इतना कहा के उस शक्ती को हममे से 
किसी ने नही दैखा क्योकी जिस समय वह शक्ती कुंम्भन को लगी होगी हम सब वर्शाली के पास गए थे क्यूंकी कुंम्भन ने एकांश पर हमला कर दिया था तो वर्शाली एकांश को बचाते हूए घायल हो गई । फिर वह तुम्हारे और वर्शाली के बारे में पूछने लगा। 

चतुर की बात सुनकर एकांश गुस्सा होकर कहता है--

> क्या यार कोई तुमसे किसी के बारे में पूछेगा तो तु उसे सब कुछ बता दैता। 

चतूर एकांश से नाराज होकर कहता है--

> क्या यार मैने ऐसा क्या कह दिया उसे के तुम इतना नाराज हो रहे हो। 

एकांश चतुर पर भड़कते हूए कहता है--

> तुम्हें क्या जरुरत थी वर्शाली के बारे में बोलनी की । वह आदमी कौन है कहां से आया है और वर्शाली के बारे में क्यो जानना चाहता है , इतना तो समझ लेते। चतुर से ऐसे बात करने पर वृन्दां एकांश पर गुस्सा 

होकर कहती है--

> क्यो ऐसा कह दिया चतूर ने उस वर्शाली के बारें में जो तुम इस पर इतना भड़क रहे हो। इसने तो वही कहा है जो इसने वहां पर दैखा था।

 एकांश समझ जाता है के उसने गलत तरिके से चतुर से बात किया था, एकांश चतुर से माफी मांगते हूए कहता है--.

> मुझे माफ दे यार मुझे तेरे साथ ऐसे बात नही करनी चाहिए थी ।

 चतुर अपना मुह फुलाए खड़ा रहता है। एकांश चतुर के कंधे पर हाथ रखकर कहता है--

> यार पता नही मुझे क्या हो गया था । मुझे तुम्हारे 
साथ इस तरह से बात नही करनी चाहिए थी।

 इतना बोलकर एकांश चुप हो जाता है। तभी चतुर एकांश से कहता है--

अरे नही यार तु अपने उपर भार मत ले । इतना तो चलता ही है दोस्ती में। नही वो कहते है ना । बस यही दोस्ती ।

 तभी एकांश बाकी के लाइन को पूरी करते हूए कहता है--

> यही प्यार । 

इतना बोलकर दौनो हंसते हूए गले मिलने लगते है। आलोक कहता है --

> अब हमे उस चेतन पर कड़ी नजर रखनी होगी। क्यूंकी अब वही हमे हमारे सारे सवालों के जवाब देगा। 


उधर मांतक और त्रिजला पक्षी के वेष में सभी के घरों में जाकर बैठता है और सब की बातें सुनने लगता है ताकी वो मणी का पता लगा सके। दौनो लगभग सभी घरो पर जाकर सबकी बांते सुन लिया पर फिर भी अभी तक उन दौनो को कुछ भी पता नही चलता है। इन सब से परेसान होकर त्रिजला कहती है--

> स्वामी क्या इस तरह से सभी के घर जा जा कर 
ढुंढना आवश्यक है । हम तो देत्य है और हमारे पास तो अशीम शक्तियाँ भी है तो क्यों ना हम अपनी शक्तियों का प्रयोग करते इन सभी को बंदी बना कर उन्हें डराकर पूछा जाए। ऐसे मे हमे सिघ्र ही सफलता प्रप्त हो जाएगी। 

मातंक त्रिजला की बात को नकारते हूए कहता है--

> नही त्रिजला हम अपनी शक्तियों का प्रयोक इन निर्दोष मानवो पर नही कर सकते । क्यूंकी ये लोक अब हमारा नही हैं। हम देत्य अपने कुछ वचनो से बंधे है। जिसका पालन करना हमारा कर्तव्य है और यही हमारे गुरू के भी आदेश हैं।

 त्रिजला कहती है --

> परतुं स्वामी हम ऐसे कब तक भटकते रहेगें। ऐसे हमारे हाथ कुछ भी नही आएगी।


 मातंक कहता है --

> " तुम चितां ना करो त्रिजला हमे सिघ्र ही सफलता प्राप्त होगी । और कुंम्भन हमारा मित्र है और तुम ये मत भूलो के हमारे मुश्किल समय मे कुंम्भन ने ही हमारा़ी सहायता किया था। इसिलिए हमारा भी कर्तव्य है के हम भी कुंम्भन की इस मुश्किल समय में हम उसका साथ दें। और हमें ऐसे करते ही उस मणी को ढुंढना होगा। और हमे आशा के हम उस मणी तक सिघ्र ही पहूँच जाएंगे।


इतना बोलकर दौनो ही वहां से उड़ कर चले जाते हैं और जाकर दक्षराज के हवेली के उपर बैठ जाता है। जहां दक्षराज के चेहरे पर मुस्कान थी और फोन पर इंद्रजीत से बात कर रहा था। 


दयाल भी वही जमीन पर बैठा था। मांतक और त्रिजला बड़े ध्यान से दक्षराज के हवेली को दैख रहा था और उसकी बातें सुन रहा था। दक्षराज फोन पर इंद्रजीत से कहता है---

> आपने मेरी बात मानकर मेरा मान रखा लिया । अब 
आप टेंसन मत लिजिए क्योकी संपूर्णा अबसे मैरी बैटी है।

 उधर से इंद्रजीत की आवाज आती है--

> आपने इतना कह दिया काफी कै पर मेरी एक आग्रह है आपसे । 

दक्षराज झट से कहता है--

> आप ऐसा बोलकर शर्मिंदा कर रहे है आप बोलिए ना क्या बात है।

 इंद्रजीत कहता है---

> मैं आपसे कुछ भी कहने से पहले एक बार संपूर्णा से पूछना चाहूगां क्योकी मैं अपनी मर्जी उस पर थौपना नही चाहता । आप शायद मेरी बात को समझेगें। 


दक्षराज कहता है--

> हां हां क्यो नही । ये तो बहोत ही खूशी की बात है के आप उसके मर्जी से ही उसकी शादी किजीएगा। 
ठीक है अब मैं फोन रखता हूँ आप संपूर्णा से बात करते मुझे बताइएगा। 


इतना बोलकर दक्षराज फोन काट देता है। फोन कट होने के बाद दयाल दक्षराज से कहता है----

> मालिक अब बहोत दिनो बाद इस घर मे खूशीयों की 
शहनाई बजेगी। 

दक्षराज अपनी अकड़ के साथ कहता है--

> तुझे क्या लगता है दयाल के मैं उस घर की बैटी को इस घर में क्यो लाना चाहता हूँ ? मुझे कोई खूशी या शहनाई नही बजवानी मैं तो बस उस इंद्रजीत का सर अपने सामने झुका हुआ दैखना चाहता हूँ। और ये तभी होगा जब उस घर की बेटी इस घर में आयेगीं। उसकी अकड़ मुझे कम करनी है।


 दयाल कहता है --

> क्या बात है मालीक। कमाल का दिमाग लगाया हैं। 
अगर ऐसा हो गया तो उस इंद्रजीत का सर आपके सामने झुकी हूई होगीं। 


 दयाल की बात सुनकर दक्षराज जौर जौर से हंसने लगता है और कहता है---

> हा हा हा हा । मेरे साथ रहकर तेरी भी बुध्दी काम करने लगी है दयाल।


To be continue.....865