वो अंतिम यात्री
विजय शर्मा एरी
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प्रस्तावना
सिंधु घाटी सभ्यता—मानव इतिहास की सबसे प्राचीन और रहस्यमयी सभ्यताओं में से एक। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की गलियों में कभी जीवन की चहल-पहल थी, व्यापार, कला और संस्कृति का अद्भुत संगम था। लेकिन समय की धूल ने सब कुछ ढक लिया। इस कहानी में हम कल्पना करते हैं उस अंतिम नागरिक की, जिसने सभ्यता के पतन को अपनी आँखों से देखा और अपने अनुभवों को स्मृतियों में संजोया।
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भाग I – अंतिम सुबह
सूरज की पहली किरणें जब मोहनजोदड़ो की ईंटों पर पड़ीं, तो वृद्ध "समर" ने अपनी झोपड़ी से बाहर कदम रखा। वह जानता था कि यह नगर अब पहले जैसा नहीं रहा। कुएँ सूख चुके थे, व्यापारियों की आवाज़ें थम चुकी थीं, और लोग धीरे-धीरे नगर छोड़कर जा रहे थे।
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भाग II – स्मृतियों का बोझ
समर ने अपने बचपन को याद किया। चौड़ी गलियाँ, नालियों की अद्भुत व्यवस्था, अनाज के भंडार, और त्योहारों की रौनक। वह सोचता था—क्या यह सब फिर कभी लौटेगा? उसकी आँखों में आँसू थे, क्योंकि वह जानता था कि सभ्यता का यह वैभव अब इतिहास बन रहा है।
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भाग III – पतन के कारण
समर ने देखा था कि नदी का प्रवाह बदल गया था। सिंधु अब उतनी उदार नहीं रही। खेत सूख गए, व्यापार ठप हो गया। लोग भूख और बीमारी से जूझने लगे। कुछ कहते थे कि आक्रमणकारियों ने नगर को उजाड़ा, कुछ कहते थे कि प्रकृति ने ही सब छीन लिया।
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भाग IV – अकेलापन
नगर खाली हो चुका था। समर गलियों में घूमता, जहाँ कभी बच्चों की हँसी गूँजती थी। अब वहाँ सन्नाटा था। वह खुद को "अंतिम नागरिक" मानता था—एक ऐसा व्यक्ति जो सभ्यता की आखिरी साँसों का साक्षी था।
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भाग V – संवाद
एक दिन उसने नदी किनारे एक बच्चे को देखा, जो अपने परिवार के साथ नगर छोड़ने की तैयारी कर रहा था। बच्चे ने पूछा—“बाबा, आप क्यों नहीं चलते?”
समर ने उत्तर दिया—“मैं इस नगर का प्रहरी हूँ। जब तक इसकी आखिरी ईंट खड़ी है, मैं इसे छोड़ नहीं सकता।”
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भाग VI – स्मारक
समर ने नगर के बीचोंबीच एक छोटा सा पत्थर रखा। उस पर उसने अपने हाथों से चिह्न बनाए—रेखाएँ, वृत्त, और प्रतीक। यह उसका संदेश था आने वाली पीढ़ियों के लिए। उसने सोचा, शायद कोई इसे पढ़ेगा और समझेगा कि यहाँ कभी जीवन था।
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भाग VII – प्रकृति का प्रकोप
एक रात भयंकर आँधी चली। घरों की छतें उड़ गईं, दीवारें गिर गईं। समर ने देखा कि नगर का वैभव मिट्टी में मिल रहा है। वह जानता था कि अब उसका समय भी निकट है।
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भाग VIII – आत्मचिंतन
समर बैठा और सोचने लगा—क्या सभ्यता का अंत ही उसका भाग्य था? क्या मनुष्य की रचनाएँ हमेशा नश्वर होती हैं? उसने महसूस किया कि ईश्वर ने मनुष्य को सृजन की शक्ति दी है, लेकिन विनाश भी उसी का हिस्सा है।
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भाग IX – अंतिम क्षण
सुबह जब सूरज निकला, समर ने नदी की ओर देखा। उसकी साँसें धीमी हो रही थीं। उसने मन ही मन कहा—“हे सिंधु, तूने हमें जीवन दिया, तूने हमें सभ्यता दी। अब मैं तुझे अपनी अंतिम साँस अर्पित करता हूँ।” और वह वहीं शांत हो गया।
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भाग X – विरासत
सदियाँ बीत गईं। पुरातत्वविदों ने नगर की खुदाई की। उन्हें वह पत्थर मिला, जिस पर समर ने चिह्न बनाए थे। वे उसे समझ नहीं पाए, लेकिन जानते थे कि यह किसी अंतिम नागरिक का संदेश है।
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उपसंहार
“सिंधु घाटी का अंतिम नागरिक” हमें यह सिखाता है कि सभ्यताएँ आती हैं और जाती हैं, लेकिन मनुष्य की स्मृतियाँ और उसकी कहानियाँ अमर रहती हैं। समर का जीवन इस बात का प्रतीक है कि हर अंत एक नई शुरुआत का संकेत होता है।
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