Back for Revenge - 4 Radhika द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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Back for Revenge - 4

आज नित्या को जन्म लिए पूरे दस दिन हो गए थे। इन दिनों उसने यह महसूस किया था कि वह सबके लिए कितनी स्पेशल हैं। हालांकि वह दिन भर सोती और समय समय पर रोती रहती। उसके लिए यह कहना मुश्किल था कि अभी दिन है या फिर रात क्योंकि वह जिस कमरे में थी वहां लगभग पूरा समय लाइट जलती रहती। 
  हां यह उसके लिए अजीब था क्योंकि वह लोगों की बातों को समझ सकती थी और लाइट उसके छोटे छोटे आंखों पर चुभती थी लेकिन उसकी आंखें इस लाइट की आदी हो चुकी थी। 

उसने किसी को कहते सुना की आज उसके तीन भाई आ रहें हैं। पर उसे समझ नहीं आ रहा था कि वे भी उसकी तरह जन्म लेने वाले थे या फिर ऑलरेडी दुनिया में हैं।

"क्या वे मुझसे दो तीन साल बड़े हैं या फिर बहुत ज्यादा छोटे? पर मैं भी तो छोटी हूं....!!" यह सोच सोच कर वह हाथ पैर मार रहीं थी। तभी सुनंदा आई और उसे गोदी में उठा कर गले लगा लिया। पहले जन्म में उसे कभी इस तरह का प्यार नहीं मिला जितना उसने इन दस दिनों में पाया था। मां का होना सच में सच में किसी ब्लेसिंग से कम नहीं होता वह सोचने लगी। इन दस दिनों में उसने गहरी सोच विचार की थी। 
जैसे आखिर मैं सब कुछ कैसे समझ पा रही हूं.....? मुझे किस तरह अपने दुश्मनों से बदला लेना है? और मैं किस तरह इस अजीब वातावरण में खुद को ढाल पाऊंगी?" यह सब सोच कर वह अपने छोटे से दिमाग को कष्ट दे रही थी।
खैर मां जैसे ही उसे लेकर टहलने के लिए निकली उसने महसूस किया कि यहां सफेद और काले रंग के सुंदर मॉडर्न कपड़े पहने कई सर्वेंट थें। जो रोजमर्रा के कामों में व्यस्त थे। 
      पर एक मिनट आज का काम अलग था। यह आलिशान विला बहुत सज़ा-धजा हुआ था मानों यहां किसी कि शादी हों। सुन्दर सुन्दर फूल जो प्लास्टिक की थी मगर बहुत खूबसूरत थे। हरी भरी लताएं, और यह भी प्लास्टिक की थी। सच में, क्या दुनिया में खूबसूरत फूलो की कमी हो गई है जो इस तरह के आर्टीफिशियल फ्लोवर से डेकोरेशन हो रहा है।
"डेकोरेशन.....????"
"अहहह! यहीं तो आर्टीफिशियल फ्लोवर सिर्फ डेकोरेशन के लिए ही होते हैं। अगर रियल फ्लोवर का उपयोग होता तो इससे बहुत सारे फूल-मालाएं यूं ही सड़ जातीं, खराब हो जाती और तो और पेड़ पौधों को भी नुकसान झेलना पड़ सकता है। इसलिए यह बेस्ट हैं।" उसका दिमाग घोड़े की तरह दौड़ रहा था। 

उसने कई नौकरों को साइड में पड़े रंग बिरंगे कपड़ों में उलझते देखा। और तभी उसके नाक में बहुत ही मीठी और भीनी भीनी खुशबू आई। 
"अहा! लगता है बहुत स्वादिष्ट पकवान बन रहें हैं। क्या मैं पकवान खा पाऊंगी?" उसने मन में सोचा और जबड़ा हिलाया और उसने महसूस किया कि उसके बिना दांत वाली मसूड़े एक दूसरे से टकरा रहें हैं।

"इससे बुरा और क्या हो सकता है? एक भूखी लड़की को मनपसंद खाना नहीं मिल सकता?" उसने खुद से कहा और तभी जिंदल साहब को अपनी ओर आते देखा।

"उम्र भले ही चालीस पैंतालीस हो लेकिन लगते तीस के है! यह मेरे पापा हैं। पापा......!!!" उसके मन में टीस सा उठा और वो बिलख बिलख कर रो पड़ी।
 
"अरे! अरे! मेरी गुड़िया अचानक क्यों रोने लगी?" सुनंदा ने उसे चुप कराते हुए कहा लेकिन नित्या तो बस रोये जा रही थी और तब तक रोई जब तक जिन्दल साहब ने उसे गोद में न लिया।
"ओह! तो तुम मुझे मिस कर रही थी, हैं न? तभी तो मुझे देखते ही रोने लगी। पर आगे से ऐसा मत करना डेडी को बुरा लगता है। ठीक है?" जिन्दल साहब ने मुस्कुराते हुए कहा और सुनंदा दोनों को देख फूली न समाई।

"आज मैं बहुत खुश हूं क्योंकि पहला तो हमारी बेबी का नामकरण हैं और दुसरा मेरे लाडले वापस आ रहें हैं। सच में आज बहुत ही शुभ दिन है।" सुनंदा ने सब पर नजर डालते हुए कहा।

"हां! सो तो है। वैसे थोड़ी ही देर बाद मेहमान आने लगेंगे इस लिए तुम तैयार हो जाओ मैं जरा अपनी बेबी के साथ थोड़ा टहल लेता हूं।" जिन्दल साहब ने कहा तो सुनंदा ने झट से बेबी को उनसे ले लिया।

"नहीं, नहीं इसे नजर लग जाएंगी। मैं अपनी बेटी को कही नहीं जाने दूंगी।" सुनंदा ने कहा तो जिन्दल साहब मुस्कुरा दिए।

"अरे मेरी भोली भाली सुनंदा! तुम फिक्र मत करो। मैं इसे यहां से कही नहीं ले जा रहा हूं। बस इसी बालकनी में टहल लूंगा।" जिन्दल साहब ने कहा ही था कि आनन्द दौड़ता हुआ आया और पता नहीं क्या कान में धीरे से कह जिन्दल साहब को वहां से लेकर चला गया। और सुनंदा बस देखती रह गई। 
         सुनंदा मां उसे अन्दर ले आई थी और वह पालने पड़ी पड़ी बस हाथ पैर मार रहीं हूं और यहां काम करने वाली लड़कियां उसे निहार निहार कर मुस्कुरा रही थी।

"क्या मैं बहुत सुन्दर हूं या फिर बहुत ही प्यारी, जो यह मुझे इस तरह देखे जा रहे हैं?" उसने खुद से कहा तभी सुनिता ताई आई और सबको झिड़कते हुए कहने लगी — "अरे हटो! हटो! नहीं तो इसे नजर लगा दोगी।" 

"ताई यह तो बहुत ही प्यारी है। क्या इसे मैं गोद में उठा सकती हूं?" यह सुनंदा की सबसे खास सर्वेंट थी इसलिए ताई ने हामी भर दी लेकिन नित्या को उसका यूं अजीब तरह से उसे उठाना पसंद नहीं आया।

"अगर बच्चों को ध्यान में उठाना नहीं जानती तो उठाते ही क्यों है? अगर इसने मुझे थोड़ी देर और इस तरह हिलाया तो मेरी हड्डी टूट जाएंगी।" नित्या ने खुद से कहा और तभी वह उसे चूमने के लिए नीचे झुकी, नित्या अपने हाथों से उसके बालों को खींचने लगी और वह दर्द से कराह उठी।

"अरे! अरे! नन्ही राजकुमारी मेरे बालों को छोड़ दो।" वह दर्द से चिल्ला रही थी। "ताई प्लीज़ आप इसे पालने में रख दो नहीं तो मैं टकली हो जाऊंगी।" उसने नित्या को सुनिता ताई की ओर करते हुए कहा और ताई ने भी मुस्कराते हुए उसे अपनी गोद में ले लिया।

"क्या हुआ मेरी बच्ची को? तुमने रुचि दीदी के बालों को क्यों खींचें? देखो तो रुचि दीदी कैसे भूतनी बन गई हैं अब उन्हें अपने बालों की दुबारा पॉनी बनानीं पड़ेगी।" ताई ने कहा तो नित्या खिलखिला कर हंस दी।

"लगता है मेरे बालों का सत्यानाश करवा के इसे मज़ा आया?" रुचि दीदी ने मुस्कुराते हुए कहा और फिर मुंह बनाती हुई कमरे से निकल कर बाहर चलीं गईं।
नित्या ने मन में कहा — "लगता है इन दीदी की कोई परेशानी हैं पहले मुझे चूमने की कोशिश करतीं हैं और फिर उनके बाल खींच लूं तो मुंह बनाते हुए चलीं जातीं हैं। बड़ी ही नकचढ़ी लग रही है?" 

रुचि क्यों न हों नकचढ़ी? आखिर सुनंदा की सबसे खास सर्वेंट थी। और तो और सबकी हेड भी थी। बाक़ी सर्वेंट उससे जलते थे और वो भी कोई कसर नहीं छोड़ती थी उन्हें जलानें की। नखरें से इतराती हुई वह सबके दिलों में आग लगा देती थी।
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दोस्तों आज का एपिसोड यहीं समाप्त होता है। आगे की कहानी जानने के लिए बनें रहिए मेरे साथ तब तक के लिए बाय बाय। 👋 🌿