वृक्ष वाणी : पर्यावरण सिद्धों का उदय - 1 Prashanth B द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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वृक्ष वाणी : पर्यावरण सिद्धों का उदय - 1

अध्याय 1: स्वर्णिम प्रभात 

मलनाड की सुबह हमेशा खास होती है। जब कोहरे की चादर को चीरकर सूर्य की पहली किरणें धरती पर आती हैं, तो दुनिया किसी जादुई सपने जैसी लगती है। लेकिन अर्जुन के लिए, यह एक अलग ही दुनिया थी।

घड़ी में छह बजते ही उसकी आँखें खुल गईं। अभी भी नींद में था, अंगड़ाई लेते हुए वह उठा और खिड़की के पास जाकर पर्दा हटाया। बाहर अब भी घना कोहरा छाया हुआ था, लेकिन उसकी आँखों के लिए—उस साधारण कोहरे में एक अलग ही ब्रह्मांड तैर रहा था। सुनहरा। जीवंत। पेड़-पौधों के चारों ओर विभिन्न रंगों का एक चमकता हुआ प्रभामंडल (Aura) था...

"अर्जुन! उठो! कितनी देर तक सोओगे? स्कूल के लिए देर हो रही है!" माँ की आवाज़ ने उसका ध्यान तोड़ा।

"आ रहा हूँ माँ!"

उसने अपने छोटे से कमरे में चारों ओर देखा। दीवार पर उसकी उपलब्धियां टंगी थीं—स्कूल प्रतियोगिता की ट्रॉफियां, जिला स्तरीय कला प्रदर्शनी के प्रमाण पत्र। उसने कुछ चित्र भी चिपकाए थे—एक में झरना था, तो दूसरे में बारिश के मौसम का हरा-भरा जंगल। लेकिन घर में कोई उनकी चर्चा नहीं करता था। सबकी चिंता बस एक ही थी—"गणित में पास कैसे होगा?"

नहा-धोकर, स्कूल की वर्दी पहनकर उसने बस्ता उठाया। लेकिन उसके बस्ते में पाठ्यपुस्तकों के साथ एक और चीज़ हमेशा रहती थी—उसकी छोटी सी स्केचबुक और रंगीन पेंसिलों का डिब्बा।

जैसे ही उसने घर से बाहर कदम रखा, दुनिया बदल गई।

आंगन में तुलसी के पौधे के चारों ओर एक सुनहरा प्रभामंडल धीरे-धीरे घूम रहा था, प्रकाश के धागों की तरह। दरवाजे के पास कपास का पौधा, कुएं के पास होन्ने का पेड़, बाड़ के पास विशाल बरगद का पेड़—हर कोई अपने स्वयं के स्वर्ण प्रभामंडल में डूबा हुआ था। यह अद्भुत दृश्य सिर्फ अर्जुन को दिखाई देता था।

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"अर्जुन! आज भी सपने देख रहा है क्या? जल्दी आ, वरना शर्मा सर बहुत डांटेंगे!"
पड़ोस के घर से उसके बचपन के दोस्त किरण ने आवाज़ दी। किरण—हमेशा व्यावहारिक, हमेशा समय का पाबंद, और हकीकत में जीने वाला। वे दोनों विपरीत ध्रुवों की तरह थे, फिर भी बचपन से पक्के दोस्त थे।

"आ रहा हूँ, आ रहा हूँ!" अर्जुन ने अपनी स्केचबुक निकाली और तुलसी के पौधे का एक त्वरित स्केच बनाया—सुनहरी रोशनी और रंगों के भंवर में डूबा हुआ। बस कुछ ही लकीरों में वह दृश्य जीवंत हो गया।

स्कूल जाने का रास्ता मलनाड की सुंदरता की एक जीवंत प्रदर्शनी था। दोनों ओर घनी हरियाली और जंगली फूल थे। दूर से झरने की लगातार आवाज़, पक्षियों का कलरव और सूखे पत्तों की सरसराहट। अन्य बच्चों के लिए यह केवल एक दैनिक रास्ता था। लेकिन अर्जुन के लिए, यह तैरते हुए रंगों का खजाना था।

"अरे, देख किरण! इस पत्ते पर ओस की बूंदें मोतियों जैसी कैसे लग रही हैं..." अर्जुन रुक गया, उस दृश्य में खो गया। केवल उसे ही उन ओस की बूंदों के चारों ओर रंगीन आभा दिखाई दे रही थी।

"हाँ भाई, बहुत अच्छा है। लेकिन याद है न आज गणित की क्लास है? देर हुई तो शर्मा सर क्लास के बाहर खड़ा कर देंगे," किरण ने उसका हाथ पकड़कर खींचा।

चलते-चलते अर्जुन ने फिर अपनी किताब निकाली और कुछ उकेरा। वह एक पत्थर से टकराकर गिरने ही वाला था कि किरण ने उसे थाम लिया।
"कितनी बार कहा है? चलते समय चित्र मत बनाया कर! एक दिन गिर जाएगा!" उसकी आवाज़ में गुस्से से ज्यादा परवाह थी।

रास्ते में, सड़क के किनारे एक बड़ी चट्टान थी—उनके बचपन के खेल का मैदान। उसकी सतह इतनी चिकनी थी कि वह एक एकदम सही फिसलन-पट्टी (Slide) जैसी थी।

"याद है? हम इस चट्टान पर कितना फिसलते थे? और तू हमेशा पहले फिसलने के लिए झगड़ता था," किरण ने हंसते हुए कहा।
"हाँ, और एक दिन तू इतनी जोर से फिसला था कि सीधे नीचे खाई में गिरने वाला था। अगर मैंने नहीं पकड़ा होता तो!" अर्जुन हंसा।
"क्या! पहले धक्का तूने ही दिया था!" किरण ने उसके कंधे को थपथपाते हुए कहा।

वह छोटा सा पल—वह हंसी, वह यादें, और दोस्ती का वह एहसास।

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स्कूल में गणित की क्लास—अर्जुन के लिए सप्ताह में पांच दिन आने वाला एक बुरा सपना थी।

"इस समीकरण को हल करने के लिए हमें पहले दोनों तरफ के सामान्य कारक (Common factor) को हटाना होगा..." शर्मा सर ब्लैकबोर्ड पर सफेद चाक से लिखते हुए समझा रहे थे। उनकी आवाज़ एकरस और नींद लाने वाली थी।

अर्जुन ने अपनी नोटबुक की ओर देखा। पन्ने संख्याओं और समीकरणों से भरे होने चाहिए थे, लेकिन वे चित्रों से भरे थे—किनारों पर पत्तियां, फूल, तितलियां। एक कोने में उस फिसलन वाली चट्टान का स्केच था, तो दूसरे में रास्ते के किनारे के फूल।

"अर्जुन!"

शर्मा सर की आवाज़ कक्षा में गूंज उठी। सब उसकी ओर मुड़े। कुछ जिज्ञासा से, कुछ सहानुभूति से।

"यह गणित की कक्षा है, चित्रकला की नहीं! देखो, पूरा पन्ना चित्रों से भरा है। क्या इन चित्रों से बोर्ड परीक्षा पास करोगे? तुम्हें अपने भविष्य की कोई चिंता नहीं है?"

कक्षा में हंसी की एक लहर दौड़ गई। अर्जुन ने सिर झुका लिया, उसका चेहरा लाल हो गया। कान शर्म से जलने लगे।
बगल से किरण ने सहानुभूतिपूर्वक देखा। जब शर्मा सर मुड़े, तो उसने धीरे से कहा: "छोड़ ना, होता रहता है।"

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शाम को घर लौटने पर, माँ खाना बना रही थीं। रसोई से सांभर और इमली की चटनी की खुशबू आ रही थी।
"स्कूल कैसा रहा? गणित कुछ समझ में आया?" पहला सवाल यही था।
"हाँ माँ," अर्जुन ने अस्पष्ट उत्तर दिया और अपना बस्ता रखने कमरे में चला गया।

शाम को जब पिताजी काम से लौटे, तो वही विषय। वे एक सरकारी कार्यालय में लेखाकार थे—संख्याओं के आदमी, हकीकत के आदमी।

"बेटा, चित्रकला अच्छी है। तुम्हारे पास प्रतिभा है, हम जानते हैं। लेकिन यह दुनिया बहुत कठिन है। भविष्य के लिए व्यावहारिक कौशल भी चाहिए। अच्छी नौकरी, स्थिर आय—यह सब पढ़ाई से ही आता है। चित्रकला शौक होनी चाहिए, पेशा नहीं।"

उनकी आवाज़ में प्यार था, चिंता थी। लेकिन अर्जुन के लिए वे शब्द पत्थरों की तरह भारी थे।

रात में अपने कमरे में, उसने दीवार पर टंगे पुरस्कारों को देखा। "प्रथम पुरस्कार - जिला स्तरीय चित्रकला प्रतियोगिता।" "सर्वश्रेष्ठ कलाकार।" इतने सारे पुरस्कार, लेकिन किसी को उनका मतलब समझ नहीं आया।

वह खिड़की के पास गया। बाहर चाँदनी में आंगन के पौधे रात के सन्नाटे में खड़े थे। और केवल उसके लिए—वे रात में भी विभिन्न रंगों की आभा में तैर रहे थे।

"मैं ही ऐसा क्यों देखता हूँ?" उसने मन में सोचा। "क्या यह सिर्फ मेरी कल्पना है? या सच में कुछ है? दूसरों को यह क्यों नहीं दिखता?"

अनुत्तरित प्रश्नों के साथ वह सोने चला गया।

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अगले दिन शाम को स्कूल से लौटते समय, वे धीरे-धीरे चल रहे थे।

"अर्जुन, कभी-कभी मुझे लगता है... मैं दुनिया को अलग तरह से देखता हूँ," अर्जुन ने उदास होकर कहा, हाथ में एक पत्ता घुमाते हुए।

किरण ने हंसते हुए उसके कंधे पर हाथ रखा। "इसीलिए तो तू एक अच्छा कलाकार है। तेरी आँखें दूसरों से ज्यादा देखती हैं। लेकिन इससे तुझे कमजोर महसूस नहीं करना चाहिए। इस दुनिया में जीने के लिए कुछ चीजें सीखनी पड़ती हैं।"

वे बातें करते हुए आगे बढ़े। सूरज पश्चिमी पहाड़ियों के पीछे धीरे-धीरे डूब रहा था। हर जगह सुनहरी रोशनी बिखरी थी। लेकिन आज कुछ खास था। कुछ अलग।

अर्जुन एक पल के लिए रुका। सड़क के किनारे एक पौधे के चारों ओर का प्रभामंडल सामान्य से कहीं अधिक घना था, लगभग बिजली की तरह चमक रहा था, जीवंत होकर कंपन कर रहा था।

"क्या हुआ?" किरण ने पीछे मुड़कर पूछा।
"नहीं... कुछ नहीं," अर्जुन ने सिर हिलाया, लेकिन उसकी आँखें उसी पौधे पर टिकी थीं।

वे आगे बढ़े। मोड़ पर, उनकी फिसलन वाली चट्टान के पास, किरण अचानक रुक गया।

"अर्जुन..." उसकी आवाज़ कमजोर हो गई, लगभग फुसफुसाहट जैसी।

अर्जुन ने मुड़कर देखा। किरण ने अपने पेट को दोनों हाथों से पकड़ रखा था, चेहरा सफेद पड़ गया था और होंठ कसकर बंद थे।

"किरण? क्या हुआ?" अर्जुन घबराहट में पास आया, उसका बस्ता गिर गया।

"पता नहीं... अचानक... बहुत तेज दर्द..." किरण झुक गया, दर्द से उसकी आँखें बंद हो गईं। उसके माथे पर पसीना बहने लगा।

"बैठ जा... यहीं..." अर्जुन ने कहा।

लेकिन किरण खड़ा नहीं रह सका। उसके पैर कांपने लगे, और अचानक वह गिर पड़ा—पहले घुटनों पर, फिर पूरी तरह से जमीन पर। उसका शरीर दर्द से ऐंठने लगा।

"किरण! किरण!" अर्जुन उसके पास घुटनों के बल बैठ गया, डर से उसके हाथ कांप रहे थे। "क्या हुआ? मुझे बता... मैं क्या करूँ? कोई है? मदद करो!"

लेकिन रास्ता खाली था।
किरण कुछ कहने की कोशिश कर रहा था, लेकिन शब्द नहीं निकले। उसके होंठ नीले पड़ने लगे, सांसें उखड़ रही थीं।
अर्जुन का दिमाग डर से सुन्न हो गया। उसे कुछ सूझ नहीं रहा था कि क्या करे। अस्पताल मीलों दूर था। जब तक वे वहां पहुँचते... इस एक ख्याल ने ही उसे पंगु (Paralyzed) बना दिया।

वह वहां असहाय खड़ा था... धीरे-धीरे उसका मन खाली होता गया... सारे विचार मिट गए... और तभी, उस पर एक गहरी तंद्रा (Trance) छा गई।
आसपास के पौधों का प्रभामंडल—जो हमेशा शांत रहता था—अचानक तीव्र हो गया। केवल रंग नहीं—वह जीवंत हो गया।
और उसके साथ... एक पुकार (The Call)

शब्द नहीं। आवाज़ भी नहीं। लेकिन उसके मन के भीतर, उसकी छाती में—एक बुलावा। बिना आवाज़ का, लेकिन बेहद स्पष्ट। जिसे टाला नहीं जा सकता था।

अर्जुन की रीढ़ में एक ठंडी लहर दौड़ गई। उसने धीरे से सिर घुमाया।

सड़क के किनारे, लगभग दस फीट दूर, एक विशेष पौधा था। उसकी पत्तियां चमक रही थीं। वे स्वयं प्रकाश छोड़ रही थीं, दिल की धड़कन की तरह धीरे-धीरे स्पंदित हो रही थीं।

पुकार तेज हो गई।

अर्जुन धीरे से उठा। अब वह पूरी तरह से तंद्रा (Trance) में था। वह उस पौधे की ओर चला—नहीं, जैसे हवा में तैरता हुआ गया।

ज़मीन पर, किरण बेहोश हो रहा था। लेकिन अर्जुन को कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। उसकी दुनिया में केवल वह पौधा था, वह प्रकाश था, और वह पुकार थी।

वह पौधे के पास पहुंचा। धीरे से अपना दाहिना हाथ बढ़ाया। उसकी उंगलियों ने पहली पत्ती को जैसे ही छुआ, ऊर्जा की एक तीव्र लहर उसके भीतर दौड़ गई। न गर्म, न ठंडी—लेकिन जीवंत।

उसके हाथों ने—जैसे अपने आप—पत्तियां तोड़ीं। एक, दो, तीन, चार, पांच। ठीक पांच पत्तियां। उसे कैसे पता चला, यह उसे नहीं मालूम था, लेकिन वह निश्चित था। ठीक पांच। न कम, न ज्यादा।

वह जमीन पर घुटनों के बल बैठ गया, अपनी दोनों हथेलियों के बीच उन पांच पत्तियों को रखा और मसल दिया।

उसकी उंगलियों के बीच से हरा रस रिसने लगा। दिखने में साधारण पौधे का रस, लेकिन उसमें... सुनहरे प्रकाश के कण थे, चमकते हुए, टिमटिमाते हुए।

वह किरण की ओर मुड़ा। उसके दोस्त का चेहरा अब राख जैसा भूरा हो गया था, मृत्यु की छाया उस पर मंडरा रही थी।

तंद्रा में ही, अर्जुन ने किरण का सिर उठाया। एक हाथ से सिर पकड़ा, और दूसरे हाथ से उसका मुंह थोड़ा खोला।
और फिर, अपनी हरी हथेलियों से, उस दिव्य रस को किरण के मुंह में बूंद-बूंद टपकाया।

एक बूंद। दो। तीन।

हर बूंद में प्रकाश के कण थे, जो लगभग जीवंत होकर चल रहे थे।

चार। पांच। छह।

अर्जुन की आँखें अभी भी स्थिर थीं...

और फिर, नौवीं बूंद के बाद, वह रुक गया।
बस। काफी है।
उसे कैसे पता चला, यह वह नहीं जानता था।
लेकिन बस, काफी है।