अध्याय 2: हल्दीघाटी का रण
सूरज की पहली किरण के साथ ही हल्दीघाटी की धरती स्वर्णिम आभा से चमक उठी। लेकिन यह आभा शीघ्र ही रक्त से रंगी जाने वाली थी। आज का दिन केवल एक युद्ध नहीं था, यह स्वाभिमान की परीक्षा थी। यह मातृभूमि के सम्मान की रक्षा का प्रण था।
रणभूमि की तैयारी
रात्रि के अंधकार में भी मेवाड़ की सेना जाग्रत थी। महाराणा प्रताप अपने शिविर में गहन चिंतन में डूबे थे। उनके सामने मेवाड़ की आन, बान और शान की छवि थी।
"क्या हम तैयार हैं?" - उन्होंने धीमे स्वर में पूछा।
झाला मान ने गर्व से उत्तर दिया, "हम केवल युद्ध के लिए नहीं, बलिदान के लिए भी तैयार हैं।"
महाराणा ने तलवार उठाई और कहा, "तो फिर यह रणभूमि आज हमारी परीक्षा लेगी। और हम इस धरती पर केवल विजय का इतिहास लिखेंगे!"
युद्ध की गर्जना
पहाड़ों से टकराकर राजपूतों की युद्धघोष पूरे हल्दीघाटी में गूँज उठी,
"जय एकलिंग!"
मुगल सेना के पाँव ठिठक गए। उन्होंने दूर से उठते धूल के बवंडर को देखा - यह केवल धूल नहीं थी, यह महाराणा प्रताप की सेना के वेग का प्रमाण था।
"राणा आ रहे हैं, राणा आ रहे हैं!" - मुगल सिपाही भयभीत होकर चिल्लाए।
मात्र एक क्षण में चेतक हवा में कूदा, और महाराणा की तलवार बिजली की तरह चमकी। पहले ही वार में दो मुगल सैनिकों के धड़ अलग हो गए। युद्ध अब प्रारंभ हो चुका था।
युद्ध का तांडव
राजपूत सेना आंधी की भांति टूट पड़ी। तलवारों की टकराहट, भालों की चमक, घोड़ों की गर्जन - सब मिलकर रणभूमि को प्रलय में बदल रहे थे। महाराणा प्रताप, अपने प्रिय घोड़े चेतक पर सवार, दुश्मन की पंक्तियों को चीरते हुए आगे बढ़ रहे थे। उनके हर वार में अग्नि थी और हर प्रहार में स्वाभिमान।
"मारो! मेवाड़ की जय!"
जैसे ही महाराणा प्रताप के यह शब्द गूंजे, राजपूतों ने दुगने जोश से शत्रु पर धावा बोल दिया। मुगल सेना भयभीत हो उठी।
मानसिंह बनाम महाराणा प्रताप
महाराणा की दृष्टि मानसिंह पर पड़ी। यह युद्ध का निर्णायक क्षण था।
"अब देखता हूँ, तू कितना बड़ा योद्धा है!" - प्रताप ने गर्जना की।
मानसिंह अपने विशाल हाथी पर सवार था, किंतु प्रताप ने चेतक को उछाला और तलवार का तीव्र वार किया। वार इतना भीषण था कि मानसिंह का कवच तक चटख उठा।
प्रताप ने क्रोध से कहा -
“तू राजपूत होकर मुगलों की चाकरी कर रहा है? क्या तुझे अपने कुल, अपनी धरती, अपने पूर्वजों का स्वाभिमान याद नहीं? गद्दार! जिस मिट्टी में जन्म लिया, उसी को रौंदने आया है?”
मानसिंह स्तब्ध था, लेकिन उत्तर देने का साहस उसमें नहीं था।
"राजपूत की आन को बेचने वाले, तू युद्ध का अधिकारी नहीं, अपमान का पात्र है!" - प्रताप की तलवार फिर से लपकी, लेकिन तभी मुगल सेना ने हस्तक्षेप कर दिया।
"यह मनुष्य है या स्वयं काल?" - एक मुगल सैनिक भयभीत होकर चीखा।
युद्ध का चरमोत्कर्ष
मुगलों ने तोपों से आक्रमण किया। चारों ओर धुएँ और आग की लपटें उठने लगीं। परंतु मेवाड़ के योद्धा रुके नहीं। वे आग से भी तेज़ थे!
जब चेतक ने अपने दोनों पैर उठाकर मुगल सेनापति मानसिंह पर हमला किया, तब मानसिंह के हाथी की सूंड में लगी तलवार से उसके पीछे का पैर कट गया।
चेतक, घायल होते हुए भी, महाराणा को युद्धभूमि से बाहर निकालने के लिए दौड़ पड़ा। उसकी टांग में गहरी चोट लगी थी, लेकिन वह थमा नहीं।
कुछ ही क्षणों में चेतक ने महाराणा को सुरक्षित स्थान पर पहुँचा दिया। उसकी सांसें तेज हो रही थीं, लेकिन वह अभी जीवित था। उसकी वीरता की परीक्षा अभी शेष थी। महाराणा प्रताप की आँखें नम थीं, लेकिन उनका संकल्प और भी प्रबल हो चुका था।
राजपूत सेना भले ही संख्या में कम थी, लेकिन उनका हृदय सिंह के समान था। महाराणा प्रताप, अपनी थकी हुई परंतु अडिग सेना के बीच खड़े होकर बोले, "आज हमने केवल एक युद्ध लड़ा है, युद्ध अभी समाप्त नहीं हुआ। जब तक मेवाड़ स्वतंत्र नहीं होगा, यह संग्राम जारी रहेगा।"
सभी सैनिकों ने गर्जना की –
"मेवाड़ री जय, महाराणा री जय!"