श्रापित एक प्रेम कहानी - 49 CHIRANJIT TEWARY द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

श्रापित एक प्रेम कहानी - 49

दुसरा आदमी कहता है--


> पहले तो ना देखे है तन्ने यहां । ऐ कौन हो भाया और यहां के कर रहे हो ? 


चेतन कहता है--

> में यहां पर नया हूँ और इस मेला को देखने आया  
था बहुत सुना था इस मेला के बारे में , सोचा था के मेला देखकर रात को ही चला जाउगां पर कल जो उस भयानक देत्य तो देखा तो रात को निकलने की हिम्मत ना हुई । 

तभी पहला आदमी कहता है--

> तो क्या तुम पुरी रात यही बाहर सर्दी मे बिताई ? 


चेतन कहता है --

> नही भाया मैं तो बाहर ही रात बिताने वाला था पर वो आपके गांव के मुखिया जी है़ ना । क्या नाम है उनका । हां दक्षराज जी उन्होने मुझे अपनी हवेली पर रात गुजारने की जगह दी ।


 चेतन अपने दैनो हाथ को जोड़कर कहता है--


> बड़े दयालु है वो भले इंसान वरना आजकल कौन 
किसी अनजान के लिए इतना करता है।


 चेतन के इतना कहते ही बिड़ी पी रहे दुसरा आदमी कहता है--

> वो भाया तु यहां नया नया आया हैं ना इसिलिए तु उस दक्षराज का गुन गान कर रिया है पर तुम उस दक्षराज के बारे मे जानते नही हो , मैं तो यही सौच रहा हूँ के उस आदमी ने तुम्हें अपनी हवेली मे घुसने 
कैसै दिया। भाया मुझे तो तुम पर शक होवे है। के तुम उस दक्षराज के चमचे ही होगें। वरना आजतक उस इंसान ने किसी का भला नही किया तो थारे साथ वो ऐसा क्यों करेगे़ ? 


उस आदमी की बात सुनकर पहले तो चेतन घबरा जाता है पर फिर अपनी बुद्धि से वो बात को संभालते हुए कहता है--

> अरे के कह रहे हो भाया कहां वो दक्षराज और कहां मैं हम दोनो का कहां कोई मेल और वैसे भी मैं तो इस गावं मे पहली बार आया हूँ । 

चेतन की बात सुनकर वो पहला कहता है--

> अच्छा वो सब छोड़ो और ये बताओ के तुम देत्यों के बारे में क्या जानते हो ? 


उस आदमी की बात सुनकर चेतन कहता है--

> यही के जैसै ये पृथ्वी हम मनुष्यों के लिए हैं। वैसे ही दैत्य, दानव और राक्षस इन सब का भी अलग 
अलग लोक हैं। 


चेतन की बात सुनकर वहां पर बैठे एक और आदमी बोल पड़ता है--

> अगर ऐसा है भाया तो मन्ने एक बात बताओ के 
कुंम्भन तब यहां के कर रहो हैं उसे तो अपने लोक मे होना चाहिए ना । वो इतने वर्षो से हमारी पृथ्वी पर क्या कर रहा है ?


 उस आदमी के सवाल का जवाब देते हुए चेतन कहता है---

> क्या तुम्हें ये बात नही पता के कुंम्भन यहां इतने वर्षो से क्यों है।

 चेतन की बात सुनकर सभी चुप हो जाता है। चेतन अपनी बात को आगे जारी रखते हुए कहता है--


> वो अपनी पुत्री के लिए आया है जिसका मणि किसीने उसकी पुत्री से धोके से छीन लिया है जिससे उसकी पुत्री की मौत हो गई है , और वो कुंम्भन उस मणी को ढुंड रहा है ताकि वो अपनी पुत्री को फिर से जीवित कर सके । अब मुक्त हो चुका है जिसका परिणाम हम सब ने कल दैख लिया। 


तभी बिड़ी फुंकते हूए एक आदमी कहता है---


> अरे भाया मुझे तो इन सबके पिछे उसी दक्षराज का हाथ है इस कुंम्भन के आने में भी मुझे उसी का हाथ लग रहा है। 


तभी उसके बगल मे बैठे एक और आदमी कहता है--

> हां भाया उस अय्यास इंसान का कोई भरोसा नहीं । कैसे वो सुबह शाम चट्टान सिंह के साथ कमली बाई के कोठे पर पड़ा रहता था। और कभी कभी तो वो कमली बाई को अपने घर पर भी लेकर आता था जबकी वहां हवेली पर उसकी भाई की बीवी भी रहती थी। बेचारा ऋतुराज मालीक अपने भाई के इस बेशर्मी के कारण उसे हवेली छोड़ने पर मजबूर कर दिया और बाहर शहर मे रहने लगे और एक दिन रास्ते पर एक हादसे में दौनो की मौत हो गई। पर इस बात से भी उस दक्षराज को कोई फर्क नही पड़ा और वो अय्यासी मे डुबा रहा और गांव के औरतो पर भी उसकी गंदी नजर थी। भाया जो अपनी परिवार के बारें मे ना सोचे वो हमारे गांव वालो के लिए क्या सोचेगा ? 


चेतन हैरानी से पूछता है---

> अच्छा तो ऋतुराज मालीक ने कभी इसके लिए अपने भाई दक्षराज से कभी बात नही किया। 


बीड़ी को हाथ से फेंकते हूए वह आदमी कहती है--


> के बात कर रहे हो भाया । ऋतुराज मालीक कभी भी अपने भाई से उंची आवाज मे बीत नही की। जब तक वो इस गांव मे थे तब तक गांव मे बहोत खुसहाली थी। और हमारी दामिनी मालकीन तो साक्षात लक्ष्मी जी की रूप थी , उनके यहां से जाने बाद ही ना जाने इस गांव और उस घर को क्या हो गया और दक्षराज की अय्यासी के कारण हमने उन दैनो को खो दिया।


 इतना सुनकर चैतन झट से पूछता है--

> उनके जाने के बाद घर और गांव को क्या हो गया ?

चेतन के इतना बोलने पर पहला आदमी कहता है--

> उसकी सारी अय्यासी खत्म हो गई और पता नहीं उस दक्षराज को क्या हुआ उसके शरीर से एक अजीब सी बदबू आती है जिसे छुपाने के लिए वो अपने शरीर को एक चादर से ढक कर रखता है ताकी वो बदबु किसी को पता ना चले। वो अब हर वक्त अपने घर पर ही रहता है और किसी से मिलती जुलता भी नही है। ऐसा लगता है जैसै उसे कुछ हुआ है जिसे वो हम सब से छुपा रहा है। 


तभी दुसरा आदमी गुस्से से कहता है--

> भाया हमे तो ऐसा लगे है के उसे श्राप लगी है श्राप । उसे उसके कर्मो का फल मिल रहा है जे पाप उसने किया है उसीका फल भौग रहा है वो दुष्ट , और आज 
भी हो ना हो ये कुंम्भन जो यहां आ कर हमारी शांती भंग रहा है ये सब इसी दक्षराज का किया धरा है। 

चेतन को गांव वालो की आंखो में दक्षराज के प्रति गुस्सा साफ दिख रहा था । चेतन अब बिना समय गवां के उनलोगो से कुंम्भन के साथ मेला में हुए घटना को पूछ लेता हैं। के कल वो मेला से कैसै गायब हो गया---

> अच्छा ये बताओ के कल कुंभ्मन मेला से यूं अचानक कैसे गायब हो गया। 


चेतन के इतना कहते ही एक आदमी गुस्से कहता है--

 ओ भाया पागल हो गयो है के। तुने अभी कुछ दैर पहले क्या कहा के तु भी मेला घुमने गया था और जो भी कल मेला घुमने गया था उन सभी को ये पता है के कुंम्भन के साथ कल क्या हुआ था। पर मारे को एक बात समझ मे ना आवे हे के ये बात तुझे कैसै मालुम नही ? ओ भाया मन्ने तो तु कुछ और लागे है। ऐ कौन है तु सच सच कहना। कही तु उस कुंम्भन से मिला हूआ तो नही है ।


 चेतन इन सब बातो से बहोत घबरा जाता है। पर तभी चेतन कुछ सौच कर कहता है--

> अरे भाया कैसी बातें कर रहे हो। मैं तो बस यही पूछा के कल कुंम्भन वहां से यूं अचानक गायब कैसै हो गया क्योंकी मैं तो डर से छूप गया था। 


चेतन के इतना कहते ही सभी जौर जौर से हंसने लगते है और एक आदमी हंसते हुए कहता है--

> ठीक कह रहे हो भया तुम्हे दैखकर ही पता चलता है के तुम एक नम्बर के डरपोक हो। हा.....हा....हा....हा...! ।


 सभी को अपने उपर ऐसै हसते दैख चेतन को गुस्सा आने लगता है। पर चेतन अपने गुस्से को काबु मे करते हुए हसके कहता है--


> अरे भाया इतने बड़े देत्य को दैखकर मेरी तो जान सुख गयी थी। सच कहे हो भाया मैं सच मे डरपोक हूँ इसिलिए। तो कल के बारे मे पूछ रहा हूँ के कुंम्भन अचानक से कहां गायब हो गया। 

चेतन की बात सुनकर वहां खड़ा दुसरा आदमी कहती है--

> अरे भाया वो गायब नही हुआ था उसे किसी अदृश्य शक्ती ने मारा था जिस कारण वो दुर जंगल मे जा गिरा। 

चेतन झट से पूछता है --

> क्या तुम मे से किसीने उस शक्ती को दैखा था । 

सभी ना मे अपना सर हीलाते हूए कहता है --

> नही भाया।

 तभी एक आदमी कहता है---


> ओ भाया वो शक्ती और किसकी हो सकती है शिवाय मां के अलावा। माँ काली ही हम सब की रक्षा कर रही है।


 सभी हाथ जोड़कर एक साथ मां काली को प्रणाम करके कहता है--

>" जय माँ काली की जय । 


चेतन बड़े ध्यान से इन सब की बात सुन रहा था और गुस्से से फिर कहता है --

> अरे ओ भाया क्या उल्टी सीधी बात बोल रहे हो। क्या तुम लोगो ने नही दैखा के वहां पर जिस शक्ती का प्रयोग हुआ था वो शक्ती एक परी की शक्ती थी जिसके कारण कुंम्भन घायल होकर दुर जा गिरा। 


अधिक गुस्से के कारण चेतन के मुह से सब निकल जाता है और ये बात चेतन समझ जाता है के उससे बहुत बड़ी गलती हो गई है। गुस्से मे अपना आपा खो कर उसने सब बक दिया था। 


सभी गांव वाले चेतन की बात सुनकर हक्का बक्का रह जाता है और चेतन को हैरानी से घुरे जा रहा था। 


तभी वह आदमी फिर बोलता है---


> अरे ओ भाया बावरा हो गयो है के ? कौन सी परी कैैसी परी की बात कर रहे हो तुम । कहीं कुंम्भन को दैखकर तेरी मती तो ना मारी गयी है ना। या कोई सपना दैख रहे हो ? 


इतना सुनकर सभी चेतन पर हसने लगता है। चेतन बात को घुमाते हुए कहता है---


> अ...अ...अ...! माफ करना भाया पता नही मेरे मुह से क्या निकल गया। अच्छा भाया क्या तुमने वहां पर कुछ भी नही दैखा जैसै काली माँ की शक्ती को । 


चेतन के इतना कहते ही वो सभी गुस्सा हो जाता है और उनमे से एक आदमी चेतन से कहता है--

> अरे ओ पागल जा अपने घर को जा यहां पर कुछ 
अनाब सनाब बोलकर हमारा समय बर्बाद मत कर। अरे पागल इस कली यूग मे किसने माँ को दैखा है। बस एक निलि रोशनी निकली और कुंम्भन घायल होकर वहां से दुर जा गिरा समझा। अब जा हमारा दिमाग खराब मत कर और चला जा यहां से पागल कही का। 


चेतन के इतना जानना काफी था के निलि रोशनी का मतलब परी का होना क्योकीं परी के मणी से निलि रोशनी निकलती है। चेतन सौचता है के वहां पर कुछ तो था जो शायद परी थी। 


इतना जानने के बाद चेतन वहां से चला जाता है। चेतन के जाने बाद सभी आपस मे बात करने लगते हैं। तभी एक आदमी अपना दुसरा बिड़ी जलाते हुए कहता है--

> मुझे तो ये आदमी सही ना लागे है भाया। मुझे तो ये कुंम्भन का दूत लगता हैं। क्योकीं जिस तरह से वह 
बात कर रहा था और कुंम्भन को लगी शक्ती के बारे में पूछ रहा था उससे तो यही लगता है।


तभी वहां पर मौजूद दुसरा आदमी भी कहता है--

> हां भाया मन्ने भी यही लागे है , कही ये उस शक्यी का पता लगा कर कुम्भन को फिर से सुंदरवन से निकालने का काम तो नही कर रहा है। अब भगवान ही हमारे गांव की रक्षा करेगें।


 तभी वहां पर एक आदमी भागकर आता है और हांफते हांफते कहता है--


> अरेह....ह...ह अरे भाया अनर्थ हो गयो । 


पहला आदमी कहता है--

> क्यों भाया के बात है जो तु इतना घबराए हुए हो। 

वो आदमी कहता है---.

> भाया वो...वोह...। 

दुसरा आदमी कहता है--

> अरे भाया पहले थौड़ी सांस ले लो फिर कहना। 

वो आदमी कुछ दैर सांस लेता है और फिर कहता है --

> भाया वो रक्षा कवच अब नही रहा किसीने उसे वहां से हटा दिया है। इसिलिए कुंम्भन जंगल से बाहर 
आया।

To be continue......782