एकांश कहता है---
>" नहीं वर्षाली ये जानते हूए भी के इस मणि मे तुम्हारी सारी शक्ति हैं मे इसे नहीं ले सकता। तुम्हें तुम्हारी शक्तियों की जरुरत है ।
इतना बोलकर एकांश वो मणि वर्शाली को दे देता है। वर्शाली मणि को लेकर फिर से वही मंत्र बोलती है और मणि देखते ही देखते गायब हो जाती है। वर्शाली मन ही मन सौचती है के लोग इस शक्ति को प्राप्त करने के लिए क्या क्या कार्य करते हैं और एक एकांश जी जिन्हे इन सब चीजों की कोई लालसा नही हैं।
वर्शाली कहती हैं--
>" एकांश आपको पता है आप इस मणि से कुछ भी
कर सकते थे । मन चाहा कार्य कर और किसी से करवा सकते थे।
एकांश कहता है--
>" तुम्हे तकलीफ़ देकर मैं कोई भी कार्य नही करना चाहता वर्शाली ।
एकांश की बातों से वर्शाली एकांश पर मौहीत हो जाती है और एकांश को अपने बाहों मे भरना चाहती है। वर्शाली के मन मे एकांश के लिए प्रेम ही प्रेम जन्म लेने लगते हैं। वर्शाली अपने आपको संभाल नही पा रही थी।
वो अपना सारा प्यार एकांश पर लुटाने के लिए बेताब हो रही थी और एकांश की और कामुकता से देखने लगती हैं। एकांश भी वर्शाली के आंखो मे प्यार को देखकर बेकाबु होने लगता हैं।
तभी एकांश को मेला मे घायल हूए लोगों की याद आती हैं। और अपनी संभोग करने की इच्छा को सांत करके वर्शाली से कहता है--!
>" वर्शाली अब मुझे यहाँ से जाना होगा। क्यूंकी जो लोग मैला मे घायल हुए हैं। उनका इलाज करना भी मेरा कर्तव्य हैं। इसिलिए पापा ने मुझे डाक्टर बनाया है।
एकांश से जाने की बात सुनकर वर्शाली मायुस हो जीती है। पर एकांश के लोगों के प्रति दया को देखकर वर्शाली के मन मे एकांश के लिए और भी प्रेम बड़ने लगता है।
एकांश कहता हैं---
.
>" वर्शाली मुझे तुमसे उस कुम्भनी के बारें मे जानना है के उस कुम्भनी को श्राप क्यों और किसके वजह से लगी।
वर्शाली कहती हैं---
>" हां एकांश जी मैं सब आपको बताउंगी परतुं सही
समय पर अभी आपको उन पीड़ित मामलों की चिकित्सा करनी होगी जो मैला मे घायल हुए हैं।
एकांश कहता है--
>" पर वर्शाली तुम्हें इस हालत मे छौड़कर जाने का मन नही कर रहा हैं।
वर्शाली एकांश को समझाते हुए कहती है--
>" आप मेरी चिंता छोड़ीए एकांश जी । शायद आप भूल रहे हो के ये मेरा घर और यहाँ मेरा राज चलता हैं। मैं यहां अब बिल्कुल स्वस्थ हूँ।
वर्शाली एकांश से कहती है---
>" एकांश जी वैसे भी अब रात्री होने वाली है और अगर किसी को पता चला के आप मैरे साथ यहां रात्री रुके थे तो सब मुझे गलत नजर से देखेगें। आप पुरुष हो इसिलिए लोग आपको कुछ नहीं कहेगें । अब आप ही बताओ एकांश जी ऐसे क्या आप यहां रुकना चाहेगें ? अगर आप रुकना चाहो तो मैं आपको मना नहीं करुगीं।
एकांश कहता है --
>" नहीं वर्शाली मैं तुम्हारे बारे मे सौचते सौचता मैं यह भूल गया था के लोग हमारे बारें मे गलत भी सौच सकते हैं। रात होने से पहले ही मैं यहां से चला जाउगां मैं तुमपर किसी को उगंली उठाने नहीं दूगां।
एकांश सौचने लगता है की वर्शाली का कहना सही है लोग लड़की को ही गलत नजर से देखता है। एकांश इतना सोच ही रहा था के वर्शाली एकांश से कहती है--
>" एकांश अगर आप यहां से नहीं जाना चाहते तो मत
जाइए ।
वर्शाली धीरे से कहती है---
>" आपके लिए तो मैं अपनी जान दे सकती हूँ एकांश जी तो ये बदनामी क्या है ।
वर्शाली के फुसफुसाने से एकांश वर्शाली से चिड़कर कहता है--
>" ये तुम क्या खुसुर फुसुर करती हो वर्शाली ।
वर्शाली हंसते हुए कहती हैं----
>" ह ह ह ह । कुछ भी तो नहीं एकांश जी पता नही आपको ऐसा क्यें लगता हैं।
एकांश वर्शाली से कहता हैं---
>" वर्शाली अब मुझे जाना चाहिए ।
एकांश वर्शाली के गाल को छुकर कहता हैं--
>" अच्छा वर्शाली अब मैं चलता हूँ।
इतना बोलकर एकांश जाने लगता हैं। तभी वर्शाली एकांश को रोकते हुए कहती हैं---
>" रुकिए एकांश जी।
वर्शाली की बात सुनकर एकांश रुक जाता हैं। वर्शाली एकांश के करिब आकर कहती हैं----
>" एकांश जी चलीए मैं आपको आपते घर तक पहुँचा
देती हूँ।
एकांश कहता है ----
>" नही वर्शाली अब रात भी होने वाली है इसिलिए मैं खुद चला जाउगां और इतनी रात को तुम इस जंगल मे वापस कैसे आओगी ? तुम्हे मेरी चिंता करने की कोई जरूरत नहीं हैं। मैं चला चाऊगां।
एकांश की बात सुनकर वर्शाली हंसते हुए कहती है---
>" एकांश जी शायद आपको ज्ञात नहीं के मैं एक परी हूँ और आपको ये नही जानना के उस रात आप यहां से अपने कक्ष तक कैसे पहूँच गए थे ?
एकांश वर्शाली को हैरानी से दैखवे लग जाता है। वर्शाली एकांश के करिब जाकर कहती है--
>" उस रात को मैने आपको निंद्रा मे लेकर गयी थी पर आज आपको मैं निंद्रा मे नही बल्की जागते हुए
लेकर जाऊगीं। बस आप अपनी आंखे बंद कर लिजिये ।
वर्शाली के कहने पर भी एकांश अपनी आंखें बंद नहीं करता हैं और वर्शाली को देखते रहता है।
वर्शाली फिर कहती है--
>" अब आप मुझे घुरते रहिएगा या अपनी आंखें बंद भी किजिएगा ।
इतना बोलकर वर्शाली एकांश के आंखों को बंद कर देती हैं। और दौनो वहां से गायब हो जाता है। वर्शाली एकांश से कहती हैं--
>" एकांश जी अब अपना आंखें खोल लिजिये हम घर
पहूँच गए हैं।
वर्शाली की बात सुनकर एकांश अपनी आंखे खोल लेता है और देखता है के एकांश अपने घर के बाहर खड़ा था। उसे अपनी आंखें पर विश्वास वही हो रहा था के वो इतनी जल्दी घर कैसे पहूँच गया। एकांश वर्शाली से हैरानी से पूछता है--
>" वर्शाली क्या सच मे घर पहूँच गए हैं पर मैरी बाईक कहां है , ये .. ये तुम्हारी केसी माया है ?
एकांश की बात सुनकर वर्शाली हंसकर कहती है--
>" ये माया नही एकांश जी आपका घर है। और आपका बाईक वहीं रह गया पर आप चिंता मत किजिए आपकी बाईक अभी लेकर आती हूँ ।
इतना बोलकर वर्शाली वहां गायब हो गई और एक पल मे ही एकांश की बाईक को लेकर आ जाती हैं।
एकांश ये सब दैखकर हैरान था उसे अपनी आंखों पर विश्वास नही हो रहा था। एकांश को ये सब फिल्मी जादु जैसा लग रहा था । एकांश बस वर्शाली को हैरानी से दैख रहा था। वर्शाली एकांश से कहती है---
>" एकांश जी आपको विश्वास ना हो तो घर मे किसी को बुलाकर देखो।
वर्शाली की बात सुनकर एकांश ने डोरबेल बजा दिया डोरबेल बजते ही किसी के कदमो की आवाज आने लगती है जो धीरे धीरे तैज हो जाती है और वो आवाज दरवाजे पर आकर रूक जाती है।
एकांश वर्शाली की और दैखता हैं। वर्शाली एक हल्की मुस्कान के साथ एकांश को दैखता है। तभी दरवाजा खूलता है और अंदर से मिना की आवाज आती है--
>" अरे एकांश बेटा आ गए तुम ?
एकांश देखता है के दरवाजे पर उसकी माँ मिना खड़ी थी। मिना कहती है--
>" अरे बेटा बड़ी दैर करदी तुमने आने मे वर्शाली ठीक है ना ?
अपनी मां की बात सुनकर एकांश वर्शाली की और देखता है और कहता है---
>" हां माँ वर्शाली ठीक है और वो यहीं इतना बोलकर एकांश वर्षाली की और इशारा करते हूए देखता है के वर्शाली वहां से वर्शाली गायब थी।
एकांश इधर-उधर वर्शाली को देखने लगता है। मिना कहती है---
>" क्या हुआ तुम किसे ढुंढ रहे हो क्या वर्शाली भी आई हैं ?
इतना बोलकर मिना हल्की मुस्कान के साथ वर्शाली को बाहर ढुंढने लग जाती है पर वर्शाली वहां पर नही थी।
तभी एकांश मिना से कहता है--
>" क्या माँ, वर्शाली यहां क्यों आएगी वो तो अभी अपने घर पर आराम कर रही होगी। भूल गई क्या माँ के सुबह वर्शाली के साथ क्या हुआ था। अच्छा अब अंदर चला़ो मुझे बहुत भूख लगी है।
इतना बोलकर दौनो हलेली के अंदर चला जाता है।
हवेली के अंदर सत्यजीत , इन्द्रजीत , और कुछ गांव वाले बैठकर बात कर रहे थे। सबके चेहरे पर एक डर और उदासी थी उनकी बातों से ऐसा लग रहा था के वे सभी मेला के बारे मे ही बात कर रहे है। एकांश भी जाकर उन सभी के पास खड़ा हो जाता है और अपने पिता इंद्रजीत ले पूछता है---
>" पापा आपलोग काफी टेंसन मे लग रहे हो। क्या आपलोग मेले वाली बात से टेंसन मे हो ?
इंद्रजीत एक गहरी सांस लेता है और कहता है --
>" हां बेटा हम सब मेले मे हूए हादसे के बारे मे बात कर रहे हैं। आज जो कुछ भी हूआ अच्छा नही हुआ। इस तरह से कुंम्भन का सुंदरवन से बाहर आना , गांव वालो का कटा हुआ सर उसी पैड़ के निचे मिलना और उस शक्ती शिला का यूं अचानक गायब होना। ये सब समझ में नही आ रहा है के आखिर उस शिला को वहां से गायब कौन कर सकता है ? और उसमे उसका क्या स्वार्थ हैं।
इंद्रजीत एकांश की और दैखकर कहता है--
> आखिर कौन है , जो कुंम्भन को गांव में आने देना चाहता है ?
एकांश अपने पापा इंद्रजीत से पूछता है---
> पापा आखिर इतना विशाल और भंयकर दैत्य इस पृथ्वी पर किसके कारण आया ? क्या इस देत्य को मारने या उसे अपने लोक भेजने का कोई उपाय नही है ?
एकांश की बात सुनकर इंद्रजीत कहता है---
> बेटा हमने साधु बाबा की मदद से काली माँ की यज्ञ करवाया और गांव के दोनो और शक्ती शिला प्रतिष्ठित किया ताकि कोई बुरी शक्ती हमारे गींव मे प्रवेश ना कर पाये और उस कुम्भन को सुंदरवन मे ही कैद कर दिया जिससे कुंम्भन थक हार कर अपने लोक वापस चला जाए । पर पता नहीं किसने उस शिला को वहां से गायब करके गांव के रक्षा कवच को ही तौड़ दिया।
इंद्रजीत एकांश के कंधे पर अपना हाथ रखकर कहता है---
> बेटा कोई तो है जो नही चाहता के कुंम्भन यहां से
जाए । पर वो ऐसा क्यों चाहता है और वो कौन हो सकता है ये पता करणा होगा ।
एकांश इंद्रजीत से पुछता है ---
> पापा अगर हम उसी जगह पर कोई दुसरी शिला रख दे तो ?
एकांश की बीत सुनकर इंद्रीजीत कहता है----
> नही बेटा अभी ये संभव नही है क्योकीं उस शिला
को एक पवित्र यज्ञ करके प्रतिष्ठित किया जाता है और ये यज्ञ केवल काली पूजा के दिन ही हो सकता है जो कार्तिक मास के अमावस्या मे होती है । जिसमे अभी काफी समय है।
एकांश कहता है---
> मतलब दीपावली मे पापा ।
तभी सत्यजीत कहता है--
>> हां बेटा दीवाली मे।
एकांश कहता है ---
>> पर चाचा तब तक तो वो देत्य सभी गांव वालो को
एक एक करके मारने लगेगा। तो क्या तबतक हम सब ऐसे ही देखते रहेगें ।
एकांश की बात सुनकर सत्यजीत कहता है---
> नही बैटा अब वो ऐसा नही कर पाएगी क्योकीं भैया
और मैं साधु बाबा से मिलकर आ रहे हैं और उन्होंने हमे एक रक्षा कलस दिया है। जिसे हमने उसी पैड़ पर बांधकर आ रहे हैं। अब वो कुंम्भन फिर से उसी सुंदरवन में कैद हो गया है। पर.......।
Note :- Sandika ji , aap meri story ko itna pyar de rhe ho uske liye dhanyavaad , par roj episode nhi aa rha hai , aapne kaha ke jaldi jaldi post karo , par maafi chahunga , ye app management ki taraf se hai ke ek din baad baad ek episode Ayega . isiliye mei har episode mei jyada sabd jodkar upload karta hoon .
SNEHA JI , CHETAN BHANARKAR JI , DEEP KUMAR JI aap logo ke pyare review or comments ke liye bahot bahot dhanyavaad ❤️
To be continue....711