अन्तर्निहित - 34 Vrajesh Shashikant Dave द्वारा क्लासिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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अन्तर्निहित - 34

[34]

शैल ने सारा के साथ आश्रम में प्रवेश किया। संध्या हो चुकी थी। आश्रम में विशेष गतिविधियां नहीं दिख रही थी। दो चार शिष्य अपने अपने कार्य में व्यस्त थे। एक कोने से धूँआ आ रहा था। 

“देखो, वहाँ भोजन पक रहा है।” सारा ने वहाँ देखा। दोनों ने उस दिशा में चरण बढ़ाए ही थे कि पीछे से किसी ने कहा, “आप दोनों को गुरुजी ने बुलाया है। आईये मेरे साथ।”

दोनों ने मौन अनुसरण किया। एक कुटीर के सम्मुख वह रुका, “भीतर गुरुजी आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं।” वह चला गया। शैल भीतर प्रवेश करने आगे बढ़ा। सारा वहीं रुक गई। वह कुटीर को देखती ही रही। 

“सारा जी, रुक क्यों गई? भीतर चलिए, गुरुजी से मिलते हैं।” सारा अभी भी कुटीर को निरख रही थी। स्थिर प्रतिमा सी खड़ी थी। शैल समीप गया, “सारा जी?” सारा कहीं अन्यत्र थी, अविचल थी। शैल ने तीन चार बार पुकारा किन्तु वह निश्चल सी रही। 

गुरुजी स्वयं कुटीर से बाहर आए, “सरिता बेटी, तुम्हारा स्वागत है।”

सरिता नाम सुनते ही सारा तंद्रा से जागी, गुरुजी को देखा, दो हाथ जोड़े और वंदन करते हुए बोली, “प्रणाम गुरुजी।”

“भीतर आओ सरिता।” गुरुजी भीतर गए। सारा ने भीतर प्रवेश किया, शैल ने भी। 

अपने आसन पर बैठते हुए गुरुजी ने कहा, “आप दोनों आसन पर स्थान ग्रहण कर लें।” दोनों बैठ गए। एक युवक गरम दूध की दो कटोरी लेकर आया। दोनों ने उसे ग्रहण किया। 

“बेटी सरिता, कैसी हो? शैल तुम कैसे हो?” अपने अपने नाम सुनकर दोनों अचंभित हो गए। 

शैल ने कहा, “मैं ठीक हूँ गुरु जी। यह सरिता नहीं, सारा जी है। आप मेरे विषय में कैसे जानते हैं?”

“मिलेंगे। तुम्हारे प्रत्येक प्रश्न के उत्तर मिलेंगे। आप दोनों की प्रत्येक दुविधा का भी समाधान होगा। जिस कार्य को आप सम्पन्न करना चाहते हैं, जिस उद्देश्य से आप चल पड़े हैं वह भी पूर्ण होगा।”

गुरुजी की वाणी ने शैल को प्रसन्न कर दिया, ऊर्जावान बना दिया। सारा अभी भी कुटीर को देख रही थी, भीतर से। शैल ने उसे जगाना चाहा तो गुरुजी ने उसे संकेतों से रोक दिया। कुछ समय व्यतीत हो गया तब सारा ने गुरु जी की तरफ देखा। 

“मैं जानता हूँ बेटी कि इस कुटीर को देखकर तुम कुछ स्मृतियों में चली गई हो। प्रयास करने पर भी तुम यह जानने में विफल हो रही हो कि तुमने यह सब कहाँ देखा है, हैं न?”

“जी, जी।” 

“तुम स्वयं को सरिता के रूप मे स्वीकार करोगी तभी पूरी बात समझ में आएगी।”

“किन्तु सरिता तो ....?”

“धर्म त्यागने से नाम भले ही बदल गया हो किन्तु तुम आज भी सारा नहीं, सरिता हो।”

“सारा जी ने मुझे अभी अभी अपने भूतकाल की बात कही थी। तब वह सरिता थी यह सत्य को आप कैसे जानते हैं, गुरुजी?” 

“यह एक विज्ञान ही है। इस विषय में उचित समय पर बात करेंगे। अभी जो संशय तुम्हारे मन में है उसकी बात करते हैं। पाकिस्तान में सारा के पूर्व धर्म में जो गुरुजी थे वे मेरे भी गुरुजी हैं। सारा जब सरिता थी तब वह हमारे गुरुजी के आश्रम में परिवार के साथ जाया करती थी। तब वह अल्प आयु थी। तब उसने उस आश्रम को, आश्रम में स्थित गुरुजी की कुटिया को अनेक बार देखा है। जब आज यहाँ इस आश्रम को, इस कुटिया को देखा तो उसकी स्मृति उसे बार बार कह रही है कि उसने ऐसे एक स्थान को पूर्व में भी देखा है। बस, स्थान का स्मरण नहीं हो रहा है। वह स्थान गुरुजी का था। यह स्थान उसी गुरुजी के स्मरण में पूर्णत: वैसा ही रचा गया है जैसा वहाँ था। क्यों सरिता, कुछ स्मरण आया?”

“जी। मुझे सब कुछ स्मरण हो आया है। यह स्थान पूरी तरह वैसा ही है। कुटिया भी वैसी ही है, बाहर से भी, भीतर से भी। मुझे विस्मृति हो गई थी। पचास वर्ष हो गए उस बात को। धर्म त्याग के पश्चात कभी ऐसे स्थान पर जाना नहीं हुआ तो विस्मृति स्वाभाविक है।”

“हमारा मस्तिष्क एक बार जो देख लेता है उसे कभी नहीं भूलता। समय आने पर उसका स्मरण हो ही जाता है। हैं न गुरुजी?” 

“सत्य कहा, शैल। यह भी विज्ञान है। बाकी बातें भोजन के पश्चात करेंगे। थोड़ा विश्राम कर लो। भोजन का समय हो रहा है। सूर्यास्त के पश्चात अवनी पर अंधकार प्रवेश करे उससे पूर्व हमें भोजन ग्रहण करना है। शैल, यह भी विज्ञान है।” गुरुजी के अधरों पर मधुर स्मित था। उसने दोनों का अधिकांश श्रम हर लिया।