श्रापित एक प्रेम कहानी - 42 CHIRANJIT TEWARY द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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श्रापित एक प्रेम कहानी - 42

वर्शाली अपना हाथ आगे करके फिर वही मंत्र कहती है---

“ॐ सुप्त-शक्ति जागर्ति — रोगः क्षीणो भवतु।
वरोऽस्मिन् द्रवणे आरोग्यम् पुनरुत्थापय।”

देखते ही देखते वो मणि वर्शाली के हाथ में आ जाती है। वर्शाली एकांश से कहती है---


वर्शाली : - एकांश जी यही है सांतक मणि जिनसे पाने के लिए बहुत सारे मनुष्य परी साधना करता है। पर फिर भी उन्हे इस मणि के दर्शन नहीं होती। 

एकांश मणि को हैरानी से देख रहा था और फिर कहता है---

एकांश :- क्या ये मणि सच में सबकी मनोकामना पूरी करता है ? 

वर्शाली :- हां एकांश जी सबकी । क्यों एकांश जी आपकी कोनसी मनोकामना है जो आप पूरी करनी चाहते हो।

 एकांश वर्शाली की और देख कर हल्की मुस्कान देने लगता है। 


वर्शाली फिर कहती है--- अगर आपकी कोई मनोकामना है तो बता दिजिये एकांश जी आपको किसी साधना की भी जरूरत नहीं है। मैं स्वयं आपके पास हूं। ये मणि आपकी सारी मनोकामना पूर्ण कर देगी। 

वर्शाली मणि को एकांश की और करके कहती हैं--

वर्शाली : - लिजिये एकांश जी अपनी मनोकामना पूरी कर लिजिये। 


इतना बोलकर वर्षाली मणि को एकांश के सामने बढ़ा देती है। एकांश मणि को देख कर सोचने लगता है के वो क्या करे। 

तभी वर्शाली कहती--

वर्शाली :- क्या हूआ आप क्या सोच रहें हो एकांश जी। लिजिये..! इस मणि को प्राप्त करने के लिए मनुष्य ना जाने कितनी साधनाये करता है पर फिर भी वो इसकी दर्शन तक नहीं कर पाता है । घोर तप और साधना के बाद हम परीयां साधक के पास आते है और फिर हम उसकी कठिन परीक्षा लेते है तब जाके ये मणी उसे प्राप्त होता है और आपको मेैं स्वयं इसे दे रही हूं।


 एकांश धीरे धीरे अपना हाथ मणि की और बढ़ाता है। वर्शाली फिर एकांश से कहती है--

वर्शाली :- भायभीत मत होइए एकांश जी। मैंने कहा ना 
के इसके लिए आपको किसी सिद्धि और साधना की आवश्यकता नहीं। मैं स्वयंम ये मणि आपको दे रही हू। 

एकांश वर्शाली के हाथ से मणि ले लेता है। मणि लेते ही उस से एक नीले रंग का प्रकाश निकलने लगती है जो कुछ दैर में कम हो जाती है। मणि देने में बाद वर्शाली एकांश से कहती है---

वर्शाली :- एकांश जी अब आप संसार की सबसे 
बलशाली मानव हो। आपको संसार में अब कोई परास्त नहीं कर सकता है। मेैं भी नहीं एकांश जी। अब मैं भी आपके सामने केवल एक साधारण स्त्री हूं। आप अपनी मन की सब कुछ कर सकते हो। 

एकांश मणि से कहता है। हे दिव्य मणि अगर ये सच है के आप मेरी मनोकामना पूरी करना चाहते हो। तो मेरी मनोकामना ये है के इस सुंदर परी वर्शाली पर उसके पसंद की फूलों की वर्षा हो और तब तक वर्षा हो जब तक वर्शाली स्वयं बस ना कहे। 


एकांश की मनोकामना सुनकर वर्शाली कहती है---

वर्शाली :- ये क्या एकांश जी आपने सिर्फ मेरे लिए मांगा अपने लिए कुछ भी नहीं। 

तभी वहा पर एक नीले रंग के फूल की वर्षा होने लगती है। जो पूरे वातावरन को सुगंधित कर रहा था। वर्शाली अपने पसंद के पुष्प वर्षा देखकर खुशी से नाचने लगती है। एकांश वर्शाली की खुशी देखकर मुस्कुराने लगता है। पुष्प वर्षा सिर्फ वर्शाली के ऊपर ही हो रही थी इसिलिए वर्शाली एकांश के पास आकार खड़ी हो जाती है जिसे पुष्प एकांश के ऊपर भी गिरने लगता है। 


वर्शाली एकांश को पकड़कर नाचते लगते हैं। एकांश और वर्शाली एक दुसरे को देखने लगते हैं। दोनो ही एक दुसरे के आंखें में खो गया था। एकांश वर्शाली की और कदम बड़ाता है और वर्शाली के करीब आता है। 


 वो दोनो एक दसरे पर प्रेम की वर्षा कर रहे थे। उधर दयाल और दक्षराज अस्पताल की और जा रहा था। दक्षराज के मन में एक ही चिंता थी के नीलू को अगर होश आ गया तो आलोक को सब बता देगा। दक्षराज दयाल से चिड़कर कहता है---

दक्षराज :- अरे मुरख जल्दी चला आज तेरे गाढ़ी की 
रफ्तार कम क्यों हो गया । अभी और कितना समय लगेगा। 


दयाल :- बस मलिक अब हम पहुंचने ही वाले हैं। 

अस्पताल में वृंदा, गुना, आलोक और चतुर सभी मरीजो का इलाज कर रहा था। 

आलोक नीलू को दवा लगा रहा था। आलोक नीलू के बदन में लगे घांवो को गौर से दैखता है। आलोक वृंदा को बुलाता है और आलोक कहता है--

आलोक :- ये नीलू काका के सारे घांव पर ऐसे निसान , ऐसा लग रहा है। जैसे इन्हें काफी दूर तक घसीटा गया हो और यहा पर ये नाखुन के निसान भी है। 


तभी वृंदा की नजर निलु के कलाई पर जाती है जिसमे लाल दाग थे । जिसे दैखकर ये अंदाजा लगाया जा सकता है के इनके हाथ को किसी चिज से बांधा गया था। 


वृंदा :- नीलू के हाथ में रस्सी के निशान भी है। 

आलोक नीलू के पैर को देखता है तो वहां पर भी वही निशान था। 

आलोक कहता है--

आलोक :- हां वृंदा। ये रस्सी का ही दाग है किसीने इन्हें बांधकर घसीटा है।

 वृदां :- पर ऐसा कौन कर सकता है और क्यों? कही कुम्भन तो नही ।

आलोक :- इका जवाब तो अब सिर्फ नीलू काका ही दे 
सकता है। 

आलोक के इतना कहते ही नीलू को होश आने लगता है। नीलू दर्द से कराहता है --

" आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह..! मेरा हाथ....!"

नीलू के दर्द से कराहने पर आलोक नीलू से कहता है---

आलोक :- नीलू काका आप घबरायिऐ नहीं आपका सारा दर्द ठिक हो जाएगा। वृंदा ने आपको दवा और इंजेक्शन लगा दी है बहुत जल्द आपका दर्द ठीक हो जाएगा। 


आलोक नीलू से एक सवाल पुछ लेता है--

आलोक :- नीलू काका आपको ये चौटें कैसे लगी ? और आपके हाथ में ये रस्सी के दाग क्यों है। ऐसा लग रहा है के जैसे किसने आपको बांध कर घसीटा हो। 


तभी वहां पर चतुर गुना और वृंदा भी आ जाती है और नीलू को देखने लगता है। नीलू आलोक के सवाल से घबरा जाता है। नीलू समझ नहीं पा रहा था के वो क्या बोले। दक्षराज सुंदरवन जाता है ये निलु आलोक को बता नही सकता था । तभी आलोक नीलू पर दबाव बनाकर पुछता है---

आलोक :- क्या हुआ काका आप चुप क्यों हो गए। 
आप डरिए मत हम है ना आपके साथ , आप बताईए आपके साथ क्या हुआ था। 

नीलू के आंखों में एक डर था जिससे आलोक साफ देख पा रहा था। नीलू कुछ कह पाता के तभी वहां पर दक्षराज और दयाल पहूँच जाता है। दक्षराज नीलू को होश में देख कर डर जाता है। दक्षराज को लगता है के कहीं नीलू ने आलोक को सब कुछ बता दिया है। नीलू दक्षराज को देखकर कहता है--

निलू :- मलिक....मलिक...! आप आ गए मलिक। 

नीलू उठने की कोशिस करता है पर उठ नहीं पाता तो दक्षराज नीलू के पास जाता है। दक्षराज नीलू के पास जाकर बैठ जाता है और उसके घांव को देखता है । दक्षराज नीलू के घांव देखकर घबरा जाता है । दक्षराज नीलू से कहता है--

दक्षराज :- तु लेटा रह उठ मत । मैं आ गया हूँ ना , तु घबरा मत । पर ये...ये ...क्या हो गया तुझे निलू। इतनी सारी चौटे ।

 दक्षराज को देखकर निलू राहत की सांस लेता है क्योंकि निलू आलोक के सवाल से घबरा गया था। दक्षराज नीलू से माथे पर हाथ फेरते हुए कहता है--

दक्षराज :- तू चिंता मत कर निलू अब में आ गया हूं। 

दक्षराज नीलू के कान में कहता है--

>" तुमने इन लोगों से कुछ कहा क्या ? 


नीलू ना में अपना सर हिलाकर जवाब देता है। नीलू से इतना सुनकर दक्षराज के चेहरे में एक खुशी नजर आता है। आलोक नीलू के कान में दक्षराज को फुसफुसाते हुए देख लेता है। आलोक सोचने लगता है---

>" ये बड़े पापा नीलू काका के कान में क्या खुशूर फुसुर कर रहे हैं। 


दक्षराज निलु को बिस्तर पर सुलाते हुए कहता है--

दक्षराद :- नीलू अभी तू यहां आराम कर । बाकि की बातें बाद मैं करुंगा। मै और दयाल फिर तुझसे मिलने आएंगे ठीक है। 

नीलू हां में अपना सर हिलाकर जवाब देता है। नीलू के चेहरे पर अब एक हल्की मुस्कान थी। इतने दर्द पर भी निलू का मुस्कुराना आलोक को हैरान कर रहा था। दक्षराज नीलू से फिर कहता है----


दक्षराज :- किसी से भी कुछ नहीं कहना । 

नीलू हां में अपना सर हिलाता है। आलोक ये सब देख कर बहोत हैरान था । दक्षराज उठकर कर वृंदा से पुछता है--

दक्षराज :- बेटा मैं नीलू को कब ले जा सकता हूं ?

वृंदा :- चाचा जी आप इन्हें कल ही लेकर जा सकते हैं। क्योंकि अभी ये हॉस्पिटल पूरी तरिके से नहीं बना है। इसिलिए में इन्हें ज्यादा दिन नहीं रख सकती। 


वृंदा के इतना कहने पर दक्षराज के चेहरे पर एक हल्की मुस्कान थी। दक्षराज वहा से चला जाता है। आलोक नीलू को शक के नजर से देखने लगता है। नीलू आलोक को देखता है और अपनी नजर चुराने लगता है नीलू अपनी आंखें बंद कर देता है। 


आलोक सम़झ जाता है के नीलू जनबुझकर अपनी आंखें बंद करके सोया है ताकि आलोक उससे कोई और सावल ना करे । आलोक सोचता है---

>" के ये बड़े पापा और नीलू दोनो ही कुछ छुपा रहे हैं। पर ऐसी को सी बात है जिससे छुपाया जा रहा है। मुझे इस बात का पता लगाना पड़ेगा के ऐसी कौनसी बात है जिसे ये दोनों छुपाने की कोशिस कर रहा हैं ।  


उधर वर्शाली और एकांश एक दुसरे को प्यार से बाहों मे भर रखा था और उनपर नीले पुष्प की वर्षा हो रही थी जिससे दोनो ही घुटने पुष्प से ढक जाते हैं। एकांश वर्शाली के होठ को चुमने के लिए आगे बड़ता है पर वर्शाली अपने आपको सम्भांलते हुए कहती हैं--

वर्शाली :- नहीं एकांश जी अभी नही ।

Note :-  RD TOMAR SINGH JI thank you apke support ke liye , ye story ko complete hone mei abhi thodi samay lagegi , or apna support  aise he banake rakhiye . 
Special thanks jo meri story ko padh rahe hai pyar de rhe hai , or jinhone pyara review or comments kiye hai unko mei bahot bahot dhanyavad karna chahunga wo hai :- SNEHA JI , DEEP KUMAR JI , VRANDHA WADHIA JI , PRITI JI , RD TOMAR SINGH Ji , ASKHA , OR RAJVATI JI , mei apko logo ko reply nhi kar pa rha hu sayad kuch setting mei dikkat hai , aise he support karte rahiye .