चेकपोस्ट:चाणक्य Ashish jain द्वारा हास्य कथाएं में हिंदी पीडीएफ

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चेकपोस्ट:चाणक्य

अध्याय १: चाणक्य का 'दफ्तर' और रडार जैसे कान

       
मंगलाचरण: एक रहस्यमयी आकृति

गर्मी की दोपहर हो या सर्दियों की गुनगुनी धूप, मोहल्ले की उस २० फुट चौड़ी सड़क के बाएं कोने पर एक 'अजूबा' हमेशा मौजूद रहता है। दूर से देखने वाले राहगीर अक्सर धोखा खा जाते हैं। कोई उसे म्युनिसिपलिटी का छोड़ा हुआ पुराना काला बोरा समझकर बचकर निकल जाता है, तो कोई सोचता है कि शायद किसी ट्रक से डामर का कट्टा गिर गया है। लेकिन जैसे-जैसे आप करीब पहुँचते हैं, उस 'बोरे' में हल्की सी हलचल दिखाई देती है। वह आकृति थोड़ी सांस लेती है, थोड़ी मिट्टी उड़ाती है और अपनी एक आँख खोलकर दुनिया को ऐसे देखती है जैसे कह रही हो— "देख क्या रहे हो? कभी किसी रिटायर्ड डॉन को आराम करते नहीं देखा?"
यह आकृति और कोई नहीं, मोहल्ले का अघोषित सुल्तान, बिस्किटों का बेताज बादशाह और 'वसूली' का ग्लोबल हेड— चेकपोस्ट चाणक्य है।
चाणक्य का व्यक्तित्व: बुढ़ापा या कूटनीति?
चाणक्य की उम्र अब उस पड़ाव पर है जहाँ लोग 'चार धाम' की यात्रा की सोचते हैं, लेकिन चाणक्य ने 'चार बिस्किट' की नीति को ही अपना धर्म मान लिया है। उसके चेहरे पर झुर्रियों का जाल ऐसा है मानो किसी नक्शानवीस ने पूरे शहर का मैप उसके मुंह पर ही खींच दिया हो। बाल सफेद हो चुके हैं, जो इस बात की गवाही देते हैं कि उसने कितनी एक्टिवा के टायर सूंघे हैं और कितने पैकेट अपनी कूटनीति से खाली करवाए हैं।
भले ही उसकी चाल अब थोड़ी धीमी हो गई हो, लेकिन उसका दिमाग आज भी नासा (NASA) के सुपरकंप्यूटर से तेज़ चलता है। उसने अपनी ज़िंदगी के इस स्वर्ण युग में एक ही मंत्र जपा है— "न्यूनतम प्रयास, अधिकतम वसूली"। यानी काम उतना ही करो जितने में टांगें न दुखें, लेकिन वसूली इतनी करो कि मोहल्ले के बाकी कुत्तों की रूह कांप जाए।
दफ्तर का माहौल: समाधि या साजिश?
चाणक्य का दफ्तर किसी आलीशान बिल्डिंग में नहीं, बल्कि सड़क के किनारे उसी धूल भरी मिट्टी में है। वहां लेटे हुए वह अक्सर गहरी समाधि का ढोंग करता है। वह अपनी आँखें ऐसे बंद रखता है जैसे वह दुनिया के मोह-माया से ऊपर उठ चुका हो। लोग बगल से गुज़रते हैं, ट्रक निकल जाते हैं, पड़ोस वाली आंटी चिल्लाती हुई निकलती हैं, यहाँ तक कि पेट्रोल के दाम १०० के पार चले जाएं या सरकार गिर जाए— चाणक्य के कान का एक बाल तक नहीं हिलता।
उसके बगल में लेटे हुए चंगू-मंगू (मोहल्ले के नौजवान कुत्ते) उसे देखकर सोचते होंगे— "बुड्ढा सठिया गया है, दिनभर सोता रहता है।" लेकिन उन्हें क्या पता कि चाणक्य सो नहीं रहा, बल्कि वह 'स्टैण्डबाय मोड' पर है। वह अपनी बैटरी बचा रहा है उस एक खास पल के लिए, जो उसके पूरे दिन की कमाई का जरिया है।
'दिव्य ध्वनि' का इंतज़ार
चाणक्य की सुनने की शक्ति साधारण कुत्तों जैसी नहीं है। वह आम आवाजों को 'फिल्टर' कर देता है। उसे बच्चों के शोर, कारों के हॉर्न या साइकिल की घंटी से कोई मतलब नहीं। वह इंतज़ार करता है एक खास 'फ्रीक्वेंसी' का। एक ऐसी आवाज़ जो उसके कानों में किसी मधुर संगीत की तरह नहीं, बल्कि 'कैश रजिस्टर' के खुलने जैसी सुनाई देती है।
अचानक, कहीं दूर से एक आवाज़ आती है— 'धुड़-धुड़-धुड़-फट-फट'। यह आवाज़ है आशीष जैन की एक्टिवा की।
रडार जैसे कानों का सक्रिय होना
जैसे ही वह आवाज़ चाणक्य के कानों के पर्दे से टकराती है, चमत्कार हो जाता है। जो कुत्ता पिछले छह घंटे से हिला तक नहीं था, उसके कान अचानक 'रडार' की तरह खड़े हो जाते हैं। चाणक्य के कान किसी दिशा सूचक यंत्र की तरह हिलते हैं— बाएं, दाएं, फिर ऊपर। वह मिट्टी में लेटे-लेटे ही अपनी गर्दन को १८० डिग्री के कोण पर घुमाता है। उसकी आँखें, जो अब तक समाधि में थीं, अचानक 'टर्मिनेटर' फिल्म के रोबोट की तरह चमकने लगती हैं।
उसका दिमाग तुरंत कैलकुलेशन शुरू कर देता है: "आवाज़ की तीव्रता १० डेसीबल... दूरी १५० मीटर... रफ़्तार २० किमी प्रति घंटा... यानी अगले ३० सेकंड में 'टारगेट' (आशीष जैन) चेकपोस्ट के दायरे में होगा!"
चाणक्य की 'इंटरनल' कोडिंग
चाणक्य के अंदर उस वक्त जो सॉफ्टवेयर चलता है, वह कुछ ऐसा होता है:
Input: आशीष जैन की एक्टिवा का थ्रॉटल।
Condition Check: क्या जेब में बिस्किट का पैकेट होने की संभावना है? (जवाब: हाँ, १००%)।
Action: तुरंत मिट्टी झाड़ो, बुढ़ापे का स्वांग रचो और सड़क के बीचों-बीच अपनी 'पोज़ीशन' ले लो।
चाणक्य को पता है कि आशीष जैन एक भावुक और दयालु इंसान हैं। वह जानता है कि आशीष भाई की एक्टिवा रुकते ही उसकी 'किस्मत का ताला' खुलने वाला है। इसलिए, वह अपनी उस पुरानी, काली, झुर्रियों वाली देह को मिट्टी से उठाता है। उठते वक्त वह जान-बूझकर एक दो बार लड़खड़ाता भी है (सिर्फ सिम्पैथी गेन करने के लिए), ताकि आशीष भाई को लगे— "बेचारा बुड्ढा, कितनी मेहनत कर रहा है हफ्ता वसूलने में!"
क्लाइमेक्स की तैयारी
अब चाणक्य सड़क के बिल्कुल बीचों-बीच खड़ा हो जाता है। वह गधे जैसे अपने लंबे कान खड़े कर लेता है और अपनी नज़रों को उस मोड़ पर टिका देता है जहाँ से आशीष जैन प्रकट होने वाले हैं। मोहल्ले के बाकी कुत्ते उसे अचरज से देखते हैं। वे सोचते हैं कि आखिर इस बुड्ढे को कैसे पता चल जाता है कि 'खजाना' आ रहा है? पर चाणक्य उन्हें भाव नहीं देता। वह अपने 'दफ्तर' के बाहर 'नो एंट्री' का बोर्ड (मानसिक रूप से) लगा चुका होता है।
वह जानता है कि आज फिर से वही ऐतिहासिक मुकाबला होने वाला है— आशीष जैन की उदारता बनाम चाणक्य की कूटनीति।