मेरी हो तुम - 1 Pooja Singh द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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मेरी हो तुम - 1


 पैहरगढ़ में कई दिनों बाद फिर से रौनक लौट आई थी।

मंदिर की घंटियाँ, घरों में दीपक, और हर चेहरे पर सुकून था।

अदिति छत पर खड़ी चाँद को देख रही थी।

हवा में अजीब-सी हलचल थी… जैसे कुछ अनकहा पुकार रहा हो।

तभी विवेक पीछे से आता है।

“क्या सोच रही हो?”

अदिति हल्की मुस्कान के साथ कहती है—

“पता नहीं क्यों… सब ठीक होने के बाद भी मन शांत नहीं है।”

उसी पल दूर जंगलों की ओर से काली ऊर्जा की एक लहर उठती है।

पेड़ झुक जाते हैं… पक्षी उड़ जाते हैं।

वहीं दूसरी ओर—

अंधकार में डूबा एक विशाल कक्ष।

आग जैसी आँखों वाला वह रहस्यमयी साया ज़मीन पर उकेरे गए चिन्हों को देख हँसता है—

“उबांक तो केवल शुरुआत था…

वनदेवी अब एक शरीर में बँध चुकी है…

पाँच साल…

और फिर ये संसार मेरी मुट्ठी में होगा।”

उसकी हँसी के साथ पूरा कक्ष काँप उठता है।

इधर अदिति का सिर अचानक तेज़ दर्द से झनझना उठता है।

उसकी आँखों में पल भर के लिए वही सफ़ेद ज्योति चमकती है।

दूर कहीं से एक आवाज़ गूँजती है—

“समय आ रहा है, वनदेवी…

युद्ध अभी समाप्त नहीं हुआ है…”

अदिति चौंक कर विवेक की ओर देखती है…

और कहानी एक नई शुरुआत की ओर बढ़ जाती है।रात काफी गहराने लगी थी।

चारों पैहरगढ़ पर चाँदनी बिखर चुकी थी।

अदिति आँगन में तुलसी के पास बैठी थी।

घटना के बाद से पहली बार उसका मन कुछ हल्का लग रहा था।

तभी उसे अपने पास किसी की मौजूदगी महसूस हुई।

विवेक।

वो बिना कुछ कहे उसके पास बैठ गया।

कुछ पल दोनों खामोश रहे… लेकिन उस खामोशी में बहुत कुछ कहा जा रहा था।

विवेक धीमी आवाज़ में बोला—

“आज अगर तुम नहीं होतीं… तो शायद हम में से कोई भी…”

अदिति ने उसकी बात बीच में ही काट दी।

“अगर तुम मेरे लिए आगे न आते… तो मैं भी आज यहाँ न होती।”

उसकी आँखें भर आईं।

विवेक ने पहली बार हिम्मत करके उसका हाथ थाम लिया।

उसका स्पर्श हल्का था… लेकिन भरोसे से भरा हुआ।

“डर लगा था…”

वो लगभग फुसफुसाया।

“तुम्हें खो देने का।”

अदिति ने उसकी ओर देखा।

चाँदनी उसकी आँखों में उतर आई थी।

हल्की मुस्कान के साथ उसने कहा—

“अब तो वादा कर लिया है न… फिर कहीं नहीं जाऊँगी।”

विवेक की उँगलियाँ अपने आप उसकी उँगलियों में उलझ गईं।

दोनों ने कुछ नहीं कहा…

क्योंकि कुछ एहसास शब्दों के मोहताज नहीं होते।

दूर से मंदिर की घंटी की आवाज़ आई।

और उसी चाँदनी के नीचे—

दो दिलों ने पहली बार खुद को एक-दूसरे के नाम कर दिया। 💞

सुबह की हल्की धूप आँगन में फैल रही थी।

अदिति तुलसी को पानी दे रही थी, तभी पीछे से आवाज़ आई—

“देवी जी… आज धरती पर उतरने का इरादा है या अभी भी पंख निकले हुए हैं?”

अदिति चौंक गई।

पीछे मुड़कर देखा—विवेक मुस्कुरा रहा था।

“बहुत मज़ाक सूझ रहा है तुम्हें?”

उसने नकली गुस्से में कहा।

विवेक पास आकर बोला—

“मजाक नहीं… बस ये देखना चाहता था कि वनदेवी को हँसते हुए भी देख सकता हूँ या नहीं।”

अदिति की हँसी अपने आप निकल गई।

“लेकिन एक बात है…”

विवेक अचानक गंभीर हो गया।

“अगर फिर कभी तुम्हें कुछ हुआ… तो मैं खुद को माफ़ नहीं कर पाऊँगा।”

अदिति ने धीरे से उसका हाथ थाम लिया।

“अब अकेली नहीं हूँ… तुम हो न।”

विवेक ने हल्की-सी शरारती मुस्कान के साथ कहा—

“तो फिर तैयार रहो… ज़िंदगी भर परेशान करने के लिए।”