महाभारत की कहानी - भाग-२४१
धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती की मृत्यु
प्रस्तावना
कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ने महाकाव्य महाभारत रचना किया। इस पुस्तक में उन्होंने कुरु वंश के प्रसार, गांधारी की धर्मपरायणता, विदुर की बुद्धि, कुंती के धैर्य, वासुदेव की महानता, पांडवों की सच्चाई और धृतराष्ट्र के पुत्रों की दुष्टता का वर्णन किया है। विभिन्न कथाओं से युक्त इस महाभारत में कुल साठ लाख श्लोक हैं। कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ने इस ग्रंथ को सबसे पहले अपने पुत्र शुकदेव को पढ़ाया और फिर अन्य शिष्यों को पढ़ाया। उन्होंने साठ लाख श्लोकों की एक और महाभारत संहिता की रचना की, जिनमें से तीस लाख श्लोक देवलोक में, पंद्रह लाख श्लोक पितृलोक में, चौदह लाख श्लोक ग़न्धर्बलोक में और एक लाख श्लोक मनुष्यलोक में विद्यमान हैं। कृष्णद्वैपायन वेदव्यास के शिष्य वैशम्पायन ने उस एक लाख श्लोकों का पाठ किया। अर्जुन के प्रपौत्र राजा जनमेजय और ब्राह्मणों के कई अनुरोधों के बाद, कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ने अपने शिष्य वैशम्पायन को महाभारत सुनाने का अनुमति दिया था।
संपूर्ण महाभारत पढ़ने वाले लोगों की संख्या बहुत कम है। अधिकांश लोगों ने महाभारत की कुछ कहानी पढ़ी, सुनी या देखी है या दूरदर्शन पर विस्तारित प्रसारण देखा है, जो महाभारत का केवल एक टुकड़ा है और मुख्य रूप से कौरवों और पांडवों और भगवान कृष्ण की भूमिका पर केंद्रित है।
महाकाव्य महाभारत कई कहानियों का संग्रह है, जिनमें से अधिकांश विशेष रूप से कौरवों और पांडवों की कहानी से संबंधित हैं।
मुझे आशा है कि उनमें से कुछ कहानियों को सरल भाषा में दयालु पाठकों के सामने प्रस्तुत करने का यह छोटा सा प्रयास आपको पसंद आएगा।
अशोक घोष
धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती की मृत्यु
पांडवों का हस्तिनापुर लौटने के दो वर्ष बाद एक दिन देवर्षि नारद युधिष्ठिर के पास आए। उन्होंने आसन ग्रहण करके कहा, मैं गंगा और अन्य तीर्थों की यात्रा करके तुम्हें देखने आया हूँ। युधिष्ठिर ने कहा, यदि आपने मेरे पितृव्य धृतराष्ट्र को देखा हो तो बताइए वे कैसे हैं।
नारद ने कहा, तुमलोग आश्रम से चले जाने पर धृतराष्ट्र, गांधारी, कुंती और संजय गंगातट पर गए, अग्निहोत्र सहित पुरोहित भी उनके साथ थे। वहाँ धृतराष्ट्र मौन और वायुभक्षक होकर कठोर तपस्या में लीन हो गए, उनका शरीर अस्थिचर्मसार हो गया। गांधारी केवल जलपान करती थी, कुंती एक माहिने बाद और संजय पाँच दिन अंतर भोजन करके जीवनधारण करते थे। उनके याजकगण विधिवत् अग्नि में आहुति देते रहे। छह माहिने बाद वे वन में लौट गए। उस समय वन के चारों ओर दावानल से वृक्ष एवं पशु सब जल गए। धृतराष्ट्र आदि अनाहार के फलस्वरूप अत्यंत दुर्बल हो चुके थे, अतएव वे वन से बाहर न निकल सके। तदनन्तर धृतराष्ट्र ने संजय से कहा, तुम भागकर आत्मरक्षा करो, हम इस अग्नि में प्राणत्याग करके परमगति प्राप्त करेंगे। संजय ने कहा, महाराज, इस दावाग्नि में प्राणत्याग करने से आपको अनिष्ट होगा। धृतराष्ट्र ने कहा, हम गृहत्याग कर आए हैं, अब मरने पर अनिष्ट नहीं होगा, जल, वायु, अग्नि या अनशन द्वारा प्राणत्याग ही तापसों के लिए समीचीन है। संजय, तुम चले जाओ। यह कहकर धृतराष्ट्र, गांधारी एवं कुंती के साथ पूर्व दिशा की ओर मुँह करके समाधिस्थ हो बैठे, उनके शरीर काठ के समान निश्चल हो गया। इस अवस्था में वे दावानल से आक्रान्त होकर प्राणत्याग कर गए। संजय ने गंगातट के महर्षियों को सारा वृत्तांत कहकर हिमालय चले गए। तत्पश्चात् नारद ने कहा, मैं गंगातट पर तापसों के निकट था, संजय के वचन सुनकर तुम्हें बताने आया हूँ। मैंने धृतराष्ट्र आदि के शरीर देखे हैं। उन्होंने स्वेच्छा से प्राणत्याग किया है, सदगति भी प्राप्त की है, उनके लिए शोक करना उचित नहीं।
पांडवों ने दुःख से अभिभूत होकर अपने को कोसते हुए रोने लगे। युधिष्ठिर ने कहा, हम जीवित रहते महात्मा धृतराष्ट्र की अनाथों के समान मृत्यु हो गई! अग्नि के तुल्य कृतघ्न कोई नहीं, अर्जुन खांडवदाह करके भिक्षार्थी ब्राह्मणवेशी अग्नि को व्यर्थ तृप्त कर चुके थे। उसी अर्जुन की जननी को उसने भस्म कर दिया! राजर्षि धृतराष्ट्र उस महावन में मंत्रपूत अग्नि की रक्षा करते थे, तथापि दावाग्नि में उनका मृत्यु कैसे हो गया?
नारद ने कहा, वे दावाग्नि में दग्ध नहीं हुए। धृतराष्ट्र ने वनप्रवेश से पूर्व जो यज्ञ किया था उसके याजकगण ने उसकी अग्नि एक निर्जन वन में रख दी थी। वही अग्नि वर्धित होकर सर्वत्र फैल गई। धृतराष्ट्र ने अपने यज्ञाग्नि में जीवन विसर्जन देकर परमगति प्राप्त की है। तुम्हारी माता ने भी गुरुशुश्रुषा के फलस्वरूप सिद्धि-लाभ किया है इसमें संशय नहीं। अब तुम भाइयों सहित उनका तर्पण करो।
युधिष्ठिर अपने भाइयों एवं पुरनारियों सहित गंगातट को प्रस्थन किया, पुरवासी एवं जनपदवासी एकवस्त्र धारण करके उनके साथ गए। पांडवों ने युयुत्सु को आगे रखकर विधिवत् धृतराष्ट्र, गांधारी एवं कुंती का तर्पण किया। द्वादशदिन में युधिष्ठिर ने उनका श्राद्ध किया तथा प्रत्येक के उद्देश्य से ब्राह्मणों को शय्या, भोजन, यान, मणिरत्न, दासी आदि दान किया। उनके आज्ञा से मृतजनों के अस्थि संग्रह करके गंगा में अर्पण किया।
देवर्षि नारद ने युधिष्ठिर को सान्त्वना देकर चले गए। कुरुक्षेत्रयुद्ध के पश्चात् हतपुत्र धृतराष्ट्र ने इस प्रकार हस्तिनापुर में पन्द्रह वर्ष एवं वनवास में तीन वर्ष व्यतीत किए थे।
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(धीरे-धीरे)