तेरी मेरी कहानी - 1 smita द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

तेरी मेरी कहानी - 1

ब्लैक फॉर्मल ड्रेस में सजी हुई, आँखों पर ब्लॉक गॉगल्स लगाए, अर्शित रॉय—शहर का जाना माना, प्रसिद्ध और ताकतवर C.E.O—ऑफिस के दरवाज़े से बाहर निकला। उसके हर कदम में उच्चस्तरीय आत्मविश्वास झलक रहा था। सिर उठाकर चलते हुए वह ऐसा प्रतीत होता कि हर जगह उसका दबदबा है।
ऑफिस के कर्मचारी हों या घर के नौकर, हर कोई उसे देखकर काँप उठता था। क्योंकि वह गुस्से वाला था। उसे काम में देर करने वाले या झूठ बोलने वाले लोग बिलकुल भी पसंद नहीं थे। कोई भी उसकी मर्जी या आदेश के खिलाफ नहीं जाता। करोड़ों की दौलत होने के कारण वह हर चीज़ खरीदने की क्षमता रखता था।
दूसरी ओर, एक लड़की—सिया शर्मा। वह एक मध्यम परिवार की साधारण लड़की थी, जिसकी दुनिया अपने परिवार और कॉलेज तक ही सीमित थी। उसकी माँ बचपन में ही गुजर गई थीं, और पिता ने सिया की परवरिश के लिए दूसरी शादी कर ली। लेकिन सिया को दूसरी माँ से प्यार या देखभाल के बजाय केवल दर्द और ताने ही मिलते थे।
सिया की ज़िंदगी आसान नहीं थी। घर में रहकर भी उसे कभी अपनापन महसूस नहीं हुआ। सौतेली माँ की तीखी बातें और ताने उसे समय से पहले ही बड़ा कर चुके थे। पिता काम में इतने उलझे रहते कि बेटी के चेहरे की उदासी उन्हें दिखाई नहीं देती थी। सिया चुपचाप सब सहती रही, क्योंकि उसने देख लिया था कि चुप रहना ही सबसे सुरक्षित और आसान रास्ता है। लेकिन वो अपनी माँ को याद करके रोती रहती।....... 
कॉलेज ही उसकी सुकून भरी दुनिया थी। हमेशा किताबों में खोई रहना, खुद से बड़े सपने देखना, और एक ऐसी ज़िंदगी की कल्पना करना जहाँ उसे भी प्यार और देखभाल मिले। लेकिन उसे क्या पता था कि उसकी ज़िंदगी अब बदलने वाली है।
सिया जिस शहर में रहती थी, उसी शहर में अर्शित रॉय की कंपनी एक बड़े प्रोजेक्ट के लिए नए इंटर्न और कर्मचारियों का चयन कर रही थी।
जब यह बात नंदिनी को पता चली, तो वह सिया के पास आई और उसे अर्शित रॉय की कंपनी के बारे में बताया। नंदिनी ने सिया को वहां नौकरी के लिए आवेदन करने के लिए प्रेरित किया। नंदिनी सिया की सबसे अच्छी दोस्त थी, हमेशा उसके साथ खड़ी रहती, जब भी सिया उदास होती नंदिनी उसे समझाती, उससे बात करती और उसका मूड ठीक कर देती।
सिया ने अर्शित रॉय की कंपनी के बारे में सुना और वहाँ काम करने का निर्णय लिया। घर में जब उसने यह बात बताई, तो उसकी सौतेली माँ भड़क गई और बोली,
“तुझसे घर के काम भी ठीक से नहीं होते और तू इतनी बड़ी बिल्डिंग में काम करने जा रही है। चुपचाप घर में रह और घर के काम पर ध्यान दे।”
तब उसके सौतेले भाई ने कहा,
“तुझे कॉलेज जाने दे रहे हैं, पढ़ने दे रहे हैं। इतना ही बहुत है। ज्यादा उड़ने की कोशिश मत कर।”
घरवालों की कड़वी बातों से सिया टूट गई। उस रात वह देर रात तक अपने कमरे में बैठी रोती रही और अपनी माँ को याद करती रही, सोचती रही—
“अगर माँ होती तो मुझे यह सब नहीं देखना पड़ता। वह कभी किसी चीज़ के लिए मना नहीं करती।”
अगली सुबह कॉलेज में भी सिया का मन नहीं लग रहा था। किताबें सामने थीं, लेकिन उसका ध्यान कहीं और था। तभी नंदिनी ने उसके कंधे पर हाथ रखकर पूछा,
“सिया, क्या हुआ? तू बहुत परेशान लग रही है।”
पहले तो सिया ने बात टालने की कोशिश की, लेकिन फिर उसने नंदिनी को सब कुछ बता दिया—घर की बातें, ताने और अपना टूटा हुआ आत्मविश्वास।
नंदिनी ने कहा,
“सिया, तू कमजोर नहीं है। जो हुआ उसे भूल जा और नौकरी के लिए अप्लाई कर। बाकी मैं देख लूंगी।”
नंदिनी की बातों से सिया के दिल में थोड़ी सी उम्मीद जग गई। डरते-डरते सही, उसने अर्शित रॉय की कंपनी में इंटर्नशिप के लिए आवेदन कर दिया।
कुछ दिन बीत गए। हर दिन सिया दिल थामकर अपना ईमेल चेक करती उसकी धड़कनें तेज थीं, हाथ कांपते थे, और मन में लगातार एक ही सवाल घूम रहा था—“क्या मैं चुन ली जाऊँगी?”
और फिर एक दिन......