गुमनाम - एपिसोड 2 वंदना जैन द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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गुमनाम - एपिसोड 2

अविनाश नहीं जानता था कि उसके मन में अनामिका के लिए जो है वो क्या है! कुछ तो वो डरता था और कुछ उसके पिता की दुश्मनी अनामिका के पिता से होने के कारण भी वो इस बात को खुद पर ज़ाहिर नहीं होने देना चाहता था। लेकिन अनामिका! वो अपनी भावनाओं को लेकर जागृत भी थी और मुखर भी। उसे एहसास था कि अविनाश के मन में भी उसके लिए वही है लेकिन वो कह नहीं पा रहा है! लेकिन उसे इस बात का फ़र्क नहीं पड़ता था कि अविनाश ही पहल करे! 

उसका मानना था कि जब लड़का-लड़की के समान होने की लड़ाई पूरी दुनिया में चल रही है तो वो अविनाश के इज़हार करने का इंतज़ार क्यों करे! अनामिका ने अविनाश को फ़ोन किया और उसे उसी रेस्टोरेंट में आने के लिए कहा जहाँ वो अक्सर मिला करते थे। 

छह दिन पहले की बात है, अनामिका एक रूफ टॉप रेस्टोरेंट में अविनाश का इंतज़ार कर रही थी। कुछ ही देर में जब अविनाश वहां पहुँचा तो उसने देखा कि वहां अनामिका अकेली है, बाकी पूरा रेस्टोरेंट खाली है। अनामिका उसे देख कर खड़ी हुई और हौले से मुस्कुराते हुए उसकी तरफ़ चल दी।


“मैं जानती थी कि तुम ज़रूर आओगे!” अनामिका ने उसके गले में बाँहें डाल उसका स्वागत किया।

“ये सब क्या है अनामिका? तुमने मुझे इतनी जल्दबाज़ी में यहाँ क्यों बुलाया है और… और ये जगह खाली क्यों है?” अविनाश ने अनामिका को खुद से अलग करते हुए पूछा।

“अविनाश... वो मुझे…” अनामिका झिझकते हुए बोली।

“क्या अनामिका! देखो जल्दी कहो, कपूर सर ने मुश्किल से आधा घंटा दिया है, बहुत सारा काम पड़ा है अभी करने…”

“I Love You अविनाश…” अविनाश अपनी बात कह ही रहा था कि अनामिका एक साँस में अपने मन की बात बोल गई, जिसे सुन अविनाश हैरान रह गया… वो कुछ कह ही नहीं पाया लेकिन अनामिका को उसकी चुप्पी से हिम्मत मिल गई थी, उसने बोलना जारी रखा। “हाँ अविनाश, मैं जानती हूँ कि तुम्हारी और मेरी दोस्ती की शुरुआत झगड़े से हुई थी, न तुम मुझे पसंद थे और न ही मैं तुम्हें!! लेकिन ऐसे लड़ते-झगड़ते कब मैं तुम्हारे लिए कुछ महसूस करने लगी, मुझे खबर ही नहीं हुई। मैं नहीं जानती कि तुम मेरे लिए क्या महसूस करते हो लेकिन आज बहुत हिम्मत करके मैं तुमसे यह कहने आई थी कि... क्या तुम… Will you…!!” अनामिका ने अविनाश के सामने अपने घुटनों पर बैठते हुए कहा तो अविनाश ने फौरन उसे सहारा दिया और उसे कुर्सी पर बैठाते हुए बोला।

“मेरी बात सुनो अनामिका, जो भी तुमने अभी कहा मैं समझ रहा हूँ लेकिन…”

“लेकिन क्या अविनाश?”

“यह सही नहीं है। मैं मानता हूँ कि हम अच्छे दोस्त हो सकते हैं लेकिन इससे ज़्यादा मैंने कभी तुम्हारे लिए कुछ महसूस नहीं किया… मैं नहीं जानता कि मेरी किस हरकत ने तुम्हें ऐसा सोचने पर मजबूर किया होगा लेकिन सच कहता हूँ अनामिका…”

“तुम मुझसे प्यार नहीं करते!” अनामिका ने रुंधे हुए गले से पूछा, उसकी आँखों में हल्की नमी आ गई थी अविनाश की बाते सुनकर।

“नहीं… हाँ… मेरा मतलब…” कहते हुए अविनाश हड़बड़ाया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अनामिका से कैसे कहे कि वो जो चाहती है उसमें कितना नुक्सान है! अविनाश ने एक गहरी साँस भरी और शांत आवाज में बोला। “अनामिका तुम समझ नहीं रही हो, मैं इन रिश्तों के लिए नहीं बना हूँ, तुम एक अच्छा और परफेक्ट साथी डिज़र्व करती हो और मैं वैसा बिल्कुल भी नहीं हूँ! मेरे करीब मत आओ, इसमें तुम्हारा ही नुक्सान है! अविनाश ने अपने बालों को उँगलियों में भींचते हुए कहा और उठ कर छत से लगी रेलिंग के पास जाकर खड़ा हो गया।

“बकवास बंद करो अविनाश! मैं जानती हूँ कि तुम बहाना बना रहे हो, असल में तुम प्यार करते हो मुझसे लेकिन बस इसी वजह से कि हमारे पिताओं के बीच दुश्मनी है तुम यह कहना नहीं चाहते! है न!!!”

”ऐसा नहीं है अनामिका, सच तो यह है कि…” अविनाश ने पलट कर अनामिका की ओर देखा लेकिन कुछ कहने से पहले ही रुक गया। फिर कुछ देर सोच कर बोला। “ठीक है, अगर तुम्हें ऐसा लगता है तो मैं आज तुम्हें सब सच बताता हूँ। सुनो…” इतना कह अविनाश ने मुँह फेरा और रेलिंग के पार दूर आसमान में देखने लगा। इतने दिनों में वो खुद भी अनामिका से प्रभावित हो गया था। वो जिस तरह अपने काम को लेकर समर्पित थी उसे सफलता के लिए अपने पीछे किसी नाम के सहारे की ज़रूरत नहीं थी। और फिर अनामिका पहली लड़की थी जिससे अविनाश की दोस्ती हुई थी और उसे उसका साथ अच्छा लगता था। इसलिए अविनाश उसके साथ कुछ भी ऐसा नहीं करना चाहता था जिससे उसके मन को ठेस पहुंचे।

हालाँकि वो आया इसी उद्देश्य था लेकिन फिर भी अनामिका के साथ ऐसा कुछ भी करना अविनाश के मन को गंवारा नहीं था। इसलिए अविनाश ने उसे सच बताना ठीक समझा और बताना शुरू किया।

“हमारे पिताओं के बीच जो दुश्मनी है उसके चलते मेरे डैड ने मुझे यहाँ भेजा था। तुमसे प्यार का नाटक करने और फिर तुम्हारा दिल तोड़कर तुम्हारे पापा को वो दुख देने जिसे वो कभी न भूल पाएं। लेकिन सच कहूँ तो तुम एक मात्र ऐसी शख्स हो अनामिका जिसने मेरे दिल के उस कोने को छुआ जहाँ अब तक कोई भी नहीं पहुँच सका... तुम मेरी वो दोस्त बनीं जिसके साथ मैंने हँसना सीखा, जिसने मुझे सिखाया कि… अनामिका…” कहते हुए अविनाश पलटा तो देखा वहां कोई नहीं था, अनामिका जा चुकी थी। प्यार तो शायद उसे भी था अनामिका से लेकिन वो जानता था कि इस रिश्ते का कोई भविष्य नहीं है।

उसके पिता अनामिका को अविनाश की ज़िन्दगी में कभी बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे। उन्होंने तो अविनाश को वहाँ भेजा ही इसलिये था ताकि वो पहले अनामिका को अपने प्रेम जाल में फँसाये और फिर उसका दिल तोड़ कर उसके पिता को जीवन भर का दुख दे लेकिन आज जब अनामिका ने उसे अपने दिल की बात बताई तो उससे रहा नहीं गया और उसने सब सच बता दिया जिससे वो खुद ही अविनाश से दूर चली जाये और अविनाश भी अपने पिता को दिया वचन तोड़ने से बच जाये।