महाभारत की कहानी - भाग-२३३
सुवर्ण नकुल के मुह से युधिष्ठिर के अश्वमेध की निंदा
प्रस्तावना
कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ने महाकाव्य महाभारत रचना किया। इस पुस्तक में उन्होंने कुरु वंश के प्रसार, गांधारी की धर्मपरायणता, विदुर की बुद्धि, कुंती के धैर्य, वासुदेव की महानता, पांडवों की सच्चाई और धृतराष्ट्र के पुत्रों की दुष्टता का वर्णन किया है। विभिन्न कथाओं से युक्त इस महाभारत में कुल साठ लाख श्लोक हैं। कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ने इस ग्रंथ को सबसे पहले अपने पुत्र शुकदेव को पढ़ाया और फिर अन्य शिष्यों को पढ़ाया। उन्होंने साठ लाख श्लोकों की एक और महाभारत संहिता की रचना की, जिनमें से तीस लाख श्लोक देवलोक में, पंद्रह लाख श्लोक पितृलोक में, चौदह लाख श्लोक ग़न्धर्बलोक में और एक लाख श्लोक मनुष्यलोक में विद्यमान हैं। कृष्णद्वैपायन वेदव्यास के शिष्य वैशम्पायन ने उस एक लाख श्लोकों का पाठ किया। अर्जुन के प्रपौत्र राजा जनमेजय और ब्राह्मणों के कई अनुरोधों के बाद, कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ने अपने शिष्य वैशम्पायन को महाभारत सुनाने का अनुमति दिया था।
संपूर्ण महाभारत पढ़ने वाले लोगों की संख्या बहुत कम है। अधिकांश लोगों ने महाभारत की कुछ कहानी पढ़ी, सुनी या देखी है या दूरदर्शन पर विस्तारित प्रसारण देखा है, जो महाभारत का केवल एक टुकड़ा है और मुख्य रूप से कौरवों और पांडवों और भगवान कृष्ण की भूमिका पर केंद्रित है।
महाकाव्य महाभारत कई कहानियों का संग्रह है, जिनमें से अधिकांश विशेष रूप से कौरवों और पांडवों की कहानी से संबंधित हैं।
मुझे आशा है कि उनमें से कुछ कहानियों को सरल भाषा में दयालु पाठकों के सामने प्रस्तुत करने का यह छोटा सा प्रयास आपको पसंद आएगा।
अशोक घोष
सुवर्ण नकुल के मुह से युधिष्ठिर के अश्वमेध की निंदा
जनमेजय वैशंपायन से बोले, मेरे प्रपितामह धर्मराज युधिष्ठिर के अश्वमेध यज्ञ में यदि कोई आश्चर्यजनक घटना हुई हो, तो आप मुझे वह बताएं।
वैशंपायन बोले, महाराज! युधिष्ठिर के अश्वमेध यज्ञ के अंत में एक विचित्र घटना हुई थी। वह घटना बता रहा हूँ, सुनिए – युधिष्ठिर के उस प्रसिद्ध अश्वमेध यज्ञ में प्रचुर दान पाकर ब्राह्मण, आत्मीय, बंधु-बांधव तथा दीन, दरिद्र एवं अंधजन अत्यंत तृप्त हो गये थे। युधिष्ठिर के महादान की बात जब दसों दिशाओं में प्रचारित हो रही थी, उसी समय एक नकुल गर्वित भाव से उस यज्ञस्थल पर उपस्थित हुआ। उस नकुल के चक्षु नीले रंग के और सिर व शरीर का एक भाग सुवर्णमय था। नकुल यज्ञभूमि में प्रवेश करके गंभीर स्वर से पशु-पक्षियों के प्राण में भय संचार करके मनुष्यों के कंठ में उपस्थित राजाओं से बोला, 'यह अश्वमेध यज्ञ कुरुक्षेत्रनिवासी एक उच्छवृत्ति बदान्य ब्राह्मण के एक प्रस्थ सत्तु दान के समतुल्य भी नहीं है।
नकुल ने यह बात कही तो उपस्थित ब्राह्मणगण उसे सुनकर अत्यंत विस्मित होकर उससे पूछा, 'नकुल! तुम कौन हो और कहाँ से यहाँ आकर इस यज्ञ की निंदा कर रहे हो? तुम्हारे पराक्रम और शास्त्रज्ञान के बारे में हम नहीं जानते। हमने शास्त्र और विधान के अनुसार यज्ञ का कार्य संपादित किया है। इस यज्ञ में महात्माओं को यथाविधि पूजित किया गया है, मंत्रोच्चारण करके आहुति दी गयी है और महाराज युधिष्ठिर ने सात्विक भाव से विविध धनरत्न आदि दान करके ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, ज्ञाति एवं आत्मीय, पवित्र हव्य वस्तुओं से देवता और शरणागत सभी को संतुष्ट किया है। फिर तुम इस यज्ञ की निंदा क्यों कर रहे हो? तुम्हें सुबुध्द जानकर तुम्हारी बात पर हमारा अविश्वास नहीं हो रहा, इसलिए हम तुमसे अनुरोध करते हैं कि, तुमने जो कुछ देखा और सुना है वह सब बताओ, विशेषतः दरिद्र तथापि बदान्य ब्राह्मण की अतिथि सेवा के संबंध में हमें बताओ।' ब्राह्मणों ने यह बात कही तो नकुल मुस्कान के साथ उनसे बोला, 'हे विप्रगण! मैंने आपको मिथ्या नहीं कहा। वास्तव में आपका यह अश्वमेध यज्ञ कुरुक्षेत्रनिवासी एक उच्छवृत्ति ब्राह्मण के एक प्रस्थ सत्तु दान के समतुल्य नहीं है। अब वह बदान्य ब्राह्मण जिस प्रकार स्त्री, पुत्र एवं पुत्रवधू के साथ स्वर्गारोहण कर चुके हैं और जिस प्रकार मेरे इस शरीर का आधा भाग एवं सिर सुवर्णमय हो गया है, वह विचित्र बात आपको विस्तार से बता रहा हूँ, सुनिए –
"पूर्वकाल में धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में एक धर्मपरायण ब्राह्मण उच्छवृत्ति अवलंबन करके जीविका निर्वाह करते थे। उनके एक पत्नी, एक पुत्र एवं एक पुत्रवधू थी। वह ब्राह्मण प्रतिदिन के षष्ठांश में सपरिवार एक साथ भोजन करते थे। कुछ-कुछ दिनों में यदि उन्हें खाद्यसामग्री जुटाने में असमर्थता हो जाती तो सपरिवार उपवास करते थे।
एक समय भयंकर दुरभिक्ष उपस्थित हुआ। उस समय उस ब्राह्मण के पास कोई संचित खाने का वस्तु नहीं थी और देश का संचित सारा अन्न क्रमशः खत्म हो जाने पर ब्राह्मण सपरिवार प्रतिदिन क्षुधा से अत्यंत पीड़ित होकर कठिनाई से जीवन यापन करने लगे। बहुत दिनों के उपवास के बाद एक दिन शुक्ल पक्ष की दोपहर में अत्यंत क्लान्त एवं क्षुधित होकर भोजन जुटाने के लिए विभिन्न स्थानों पर भ्रमण किया, किन्तु उच्छवृत्ति द्वारा कहीं कुछ भी भोजन न जुटा पाने पर उन्हें परिवार के साथ अत्यंत कष्ट से प्राण धारण करना पड़ा।
आखिर में एक दिन के षष्ठांश व्यतीत हो जाने पर उन्होंने किसी प्रकार एक प्रस्थ जौ जुटा लिया। उनके परिवार के सभी ने उसे देखकर अत्यंत प्रसन्न होकर उस जौ से सत्तु तैयार किया।
तत्पश्चात वह ब्राह्मण एवं उनका परिवार जप, आह्निक एवं होमकर्म संपादित करके उस सतु को भाग बाँटकर खाने के उपक्रम में थे, इतने में एक अतिथि ब्राह्मण अत्यंत क्षुधित होकर उनके पास उपस्थित हुए।
विशुद्धचित्त श्रद्धावान जितेन्द्रिय ब्राह्मण एवं उनका परिवार उस अतिथि ब्राह्मण को देखते ही अत्यंत आनंदित होकर उनका स्वागत करके कुशल प्रश्न किया और उनके समक्ष अपना गोत्र एवं ब्रह्मचर्य का परिचय देकर उन्हें कुटिर में लाये। तब वह उच्छवृत्तिधारी ब्राह्मण आगत अतिथि को आसन देकर विनीत भाव से बोले, 'मैंने नियम अनुसार यह पवित्र सत्तु संग्रह किया है, आप अनुग्रह करके इस सत्तु को ग्रहण करें।
ब्राह्मण ने यह बात कहकर अतिथि को अपना भाग का सत्तु दिया तो अतिथि ने भोजन किया, किन्तु उससे उनकी कोई तृप्ति न हुई। उच्छवृत्ति ब्राह्मण अतिथि को अतृप्त देखकर उनके तृप्ति साधन के विषय में चिंता करने लगे तो उनकी पत्नी ने उनसे कहा, 'आप अतिथि को मेरे भाग का सत्तु दिजिए, यह इतना भोजन कर ले तो निश्चय ही संतुष्ट होकर चले जायेंगे।
पतिपरायणा ब्राह्मणी ने यह कहा तो ब्राह्मण ने अपनी क्षुधित अस्थिचर्मसार वृद्धा स्त्री से कहा, 'स्त्री का भरण-पोषण स्वामी का अवश्य कर्तव्य है। अतएव, मैं कैसे तुम्हारा थोड़ा आहार ग्रहण करूँ? धर्म, अर्थ, काम, सेवा, संतान एवं पितृकर्म सब स्त्री के अधीन हैं। जो व्यक्ति स्त्री की रक्षा नहीं कर सकता, उसे इहलोक में अपयश और परलोक में घोर नरक भोगना पड़ता है।
महात्मा ब्राह्मण ने यह कहा तो ब्राह्मणी ने उनसे कहा, 'हम दोनों का धर्म एवं अर्थ एक है। अतएव, आप प्रसन्न होकर मेरे भाग का यह सत्तु अतिथि को दिजिए।' स्त्रीजाति का सत्य, धर्म, स्वर्ग एवं अन्य अभिलषित विषय सब पति के अधीन हैं। पति ही स्त्री का परम देवता है। अतएव, मेरे भाग का यह सत्तु अतिथि ब्राह्मण को देकर मुझे अनुगृहीत करना आपका अवश्य कर्तव्य है।' 'जब आप स्वयं जर्जर, दुर्बल एवं क्षुधित होकर भी अपना भाग का सत्तु अतिथि को दे चुके हैं, तो मेरे भाग का सत्तु देने में बाधा क्या है?' ब्राह्मणी ने इस प्रकार अपने भाग का सत्तु अतिथि को देने का अनुरोध किया तो ब्राह्मण हृष्टचित्त होकर वह सत्तु अतिथि ब्राह्मण को देकर बोले, 'आप इस सत्तु को भी भोजन करें।' तब अतिथि ने वह सत्तु भी भोजन किया तो उनकी तृप्ति न हुई। उच्छवृत्ति ब्राह्मण ने ऐसा देखकर अत्यंत चिंतित हो गये।
तब ब्राह्मण के पुत्र ने उनसे कहा, 'पिता जी! आप मेरे भाग का यह सत्तु अतिथि को दिजिए। मेरे मत में अतिथि को यह सत्तु देने से उस से बढ़कर पुण्य के कार्य कुछ नहीं है। आपको सदैव यत्न सहित रक्षा करना मेरा अवश्य कर्तव्य है। साधु पुरुष सदैव वृद्ध पिता की सेवा करना चाहते हैं। वृद्ध पिता का पालन पुत्र का अवश्य कर्तव्य है। आप इस मेरे भाग के सत्तु से अतिथि को तृप्त करके संतुष्ट होकर जीवित रहें तो बहुत तपस्या का अनुष्ठान कर सकेंगे। दूसरों के प्राण रक्षा करने से बढ़कर मनुष्य का परम धर्म कुछ नहीं है।
ब्राह्मण के पुत्र ने यह कहा तो ब्राह्मण ने उनसे कहा, 'बालक! यदि तुम्हारी आयु हजार वर्ष हो जाय तो भी तुम्हें मेरे बालक के समान ही ज्ञान होंगे। बालक की क्षुधा अत्यंत प्रबल होती है। मैं वृद्ध हो चुका हूँ, अतः मेरे लिए अनाहार में प्राण धारण करना कठिन नहीं है। तुम बालक हो, अतएव तुम्हारा यह सत्तु अतिथि को दान न करके तुम्हारा भोजन ही आवश्यक है। मैं वृद्ध हूँ इसलिए मुझे क्षुधा में तुम्हारे समान कष्ट भोगना नहीं पड़ता और मैंने दीर्घकाल तपस्या की है इसलिए मृत्यु से भी भयभीत नहीं हूँ।' ब्राह्मण के पुत्र ने पिता के वचन सुनकर कहा, 'मैं आपका पुत्र हूँ। आपको रक्षा करना मेरा अवश्य कर्तव्य है। मैं आपका आत्मस्वरूप हूँ, अतः मेरे द्वारा आत्म रक्षा करने से आपकी आत्मा द्वारा आत्म रक्षा होगी। अतएव आप मेरे इस सत्तु को अतिथि को देकर आत्मरक्षा करें।
ब्राह्मण के पुत्र ने यह कहा तो ब्राह्मण परम तुष्ट होकर पुत्र से बोले, 'बालक! तुम मेरे जैसा सच्चरित्र एवं जितेन्द्रिय हो। अब मैं तुम्हारा यह सत्तु अतिथि को दे रहा हूँ।' यह कहकर ब्राह्मण ने पुत्र के भाग का सत्तु अतिथि को दिया तो अतिथि ने तत्काल वह सत्तु भोजन किया। किन्तु उसके बाद भी उनकी पूर्ण तृप्ति न हुई। उच्छवृत्ति ब्राह्मण ने ऐसा देखकर अत्यंत लज्जित एवं चिंतित हो गये।
तब उनकी पुत्रवधू आनंदित मन से अपना भाग का सत्तु श्वशुर को देकर बोलीं, 'आप इस सत्तु को अतिथि को दिजिए। इससे उस ब्राह्मण की संतुष्टि के कारण आपके पुत्र द्वारा मेरे गर्भ में संतान प्राप्ति एवं आपके आशीर्वाद से मुझे अक्षय स्वर्ग लोक प्राप्त होगा। मेरे गर्भ में आपका पौत्र जन्म लेगा तो आप पवित्र लोक को जायेंगे। शास्त्र में धर्म त्रिवर्ग एवं दक्षिण आदि त्रिविध अग्नि के समान त्रिविध स्वर्ग निश्चित है। वह त्रिविध स्वर्ग पुत्र एवं प्रपौत्र के प्रभाव से प्राप्त होता है। पुत्र द्वारा पितृऋण से मुक्ति मिलती है और पौत्र एवं प्रपौत्र द्वारा साधुसंनिविष्ट लोकसमूह प्राप्त होता है।
पुत्रवधू ने यह कहा तो ब्राह्मण ने उनसे कहा, 'तुम उपवास के कारण शीर्ण एवं क्षुधा से अत्यंत पीड़ित हो गयी हो। इस अवस्था में मैं कैसे तुम्हारे भाग का सत्तु लेकर धर्म पथ से विच्युत होऊँ? अतएव मुझे तुम्हारा सत्तु लेने का अनुरोध करना तुम्हारा उचित नहीं है। तुम तपस्या में अनुरक्ता एवं व्रतचारीण होकर प्रतिदिन के षष्ठांश में सबके साथ भोजन करती हो। आज मैं तुम्हें अनाहार में रखकर कैसे प्राण धारण करूँ? तुम अभी बालिका हो, क्षुधा में तुम्हें अत्यंत कष्ट हो रहा है, अतएव अब तुम्हारी रक्षा करना मेरा अवश्य कर्तव्य है।
ब्राह्मण ने यह कहा तो उनकी पुत्रवधू बोलीं, 'आप मेरे गुरु के गुरु एवं देवता के भी देवता हैं। इसी लिए मैं अपना चतुर देकर आपका हित साधने का प्रयास कर रही हूँ। गुरु की सेवा करने से देह, प्राण एवं धर्म सबकी रक्षा होती है। अब आप मुझे अपनी प्रति एकांत भक्तिमती एवं रक्षणीय समझकर इस सत्तु को अतिथि को दिजिए।' पुत्रवधू ने यह कहा तो ब्राह्मण परम तुष्ट होकर बोले, 'बालिके! तुम्हारी तुल्य सुशील एवं धर्मपरायणा नारी विरल ही मिलती है। अतएव मैं तुम्हारा सत्तु अतिथि को दे रहा हूँ।' यह कहकर उन्होंने वह सत्तु अतिथि को दिया।
तब वह अतिथि उच्छवृत्ति ब्राह्मण की उस असामान्य अतिथिपरायणता को देखकर अत्यंत तुष्ट होकर ब्राह्मण से बोले, 'हे धर्मिक! मैं तुम्हारे कष्टार्जित पवित्र दान से तुम्हारा प्रति अत्यंत प्रीति हो गयी है। देवगण भी तुम्हारे इस दान की अत्यंत प्रशंसा कर रहे हैं। देखो, आकाश से पुष्पवृष्टि हो रही है। देवता, ऋषि एवं गंधर्व तुम्हें स्तुति कर रहे हैं। देवदूत तुम्हारे दान को देखकर विस्मयापन्न हो गये हैं और ब्रह्मर्षिगण आकाश में स्थित होकर तुम्हारा दर्शन प्राप्त करने को उत्सुक हैं। तुमने बहुत युग ब्रह्मचर्य, दान, यज्ञ, तपस्या एवं विशुद्ध धर्म का अनुष्ठान करके पितृगण का उद्धार साधन हुया है। देवगण तुम्हारी तपस्या एवं दान के प्रभाव से तुम्हारा प्रति अत्यंत प्रीति हो गयी है। अतएव अब तुम परम सुख से स्वर्ग को जाओ। तुमने इस कष्ट के समय विशुद्ध चित्त से मुझे सब कुछ दान करके अति दुर्लभ स्वर्गलोक को जीत लिया है।
क्षुधा में मनुष्य का ज्ञान, धैर्य एवं धर्मबुद्धि लोप हो जाती है। अतएव जो व्यक्ति भूख को जीत लेता है, वह स्वर्ग जय करने में समर्थ होता है। जिसके दान में श्रद्धा होती है, उसकी धर्मप्रवृत्ति कभी नष्ट नहीं होती। तुमने स्त्री-पुत्र के स्नेह का परित्याग करके केवल धर्म को श्रेष्ठ जानकर प्रसन्न चित्त से मुझे सत्तु दान किया। उसी दान के फल से तुम्हें विपुल पुण्य लाभ हुआ है।
मनुष्य धर्म अनुसार उपार्जन करके श्रद्धासहित उपयुक्त समय में सत्पात्र को दान दे तो पुण्यफल प्राप्त करता है। श्रद्धा से श्रेष्ठ कुछ नहीं है। स्वर्गद्वार अति दुर्गम स्थान है, लोभ उस द्वार का अर्गल स्वरूप है। मोहन्ध व्यक्ति वहाँ जाना तो दूर, देख भी नहीं पाते। तपस्यानिरत जितेन्द्रिय ब्राह्मणगण यथाशक्ति दान करके अनायास स्वर्गलोक को जा सकते हैं। जिसके पास हजार स्वर्ण संचित हों, वह शत स्वर्ण दान करके जो पुण्यफल प्राप्त करता है, जिसके पास शत स्वर्ण संचित हों वह दश स्वर्ण दान करके वैसा पुण्यफल प्राप्त कर सकता है। और जिसके पास थोड़ा भी धन संचित न हो वह उपयुक्त पात्र को एक अंजलि जल दान करके भी समान पुण्यफल प्राप्त करने में समर्थ होता है।
एक बार महाराज रंतिदेव अत्यंत निर्धन होकर विशुद्ध चित्त से जल दान किया था, इसलिए उसी पुण्यफल से उन्हें स्वर्ग प्राप्त हुआ था। अतएव न्यायसम्मत भाव से लब्ध वस्तु से श्रद्धा सहित अल्प मात्रा वस्तु दान करके धर्म की प्रीति साधन किया जा सकती है, अन्याय से लब्ध महामूल्य वस्तु प्रचुर दान करके भी वैसी प्रीति साधन नहीं हो सकती। महाराज नृग ने ब्राह्मणों को असंख्य गौ दान करके प्रभूत पुण्य संचय किया था, किन्तु एक बीमार गौ दान करने पर उन्हें नरक भोगना पड़ा। महाराज शिबि ने अपना मांस दान करके पवित्र लोक जाकर स्वर्ग सुख भोग रहे हैं। मनुष्य केवल ऐश्वर्य के प्रभाव से पुण्य लाभ नहीं कर सकता।
न्यायपरायण व्यक्ति उपयुक्त काल में सत्पात्र को दान करके अनायास स्वर्ग लाभ में समर्थ होता है। तुमने इस सत्तु दान करके जिस प्रकार पुण्यफल प्राप्त किया, बहुत दक्षिणा, विविध राजसूय एवं अश्वमेध यज्ञ के अनुष्ठान से भी वैसा पुण्य लाभ नहीं होता। तुमने इस सत्तु दान करके अक्षय ब्रह्मलोक जीत लिया है। इसलिए तुम्हारे एवं तुम्हारे परिवार के लिए दिव्य यान उपस्थित है, अतएव तुम सपरिवार उस दिव्य यान पर आरोहण करके ब्रह्मलोक को जाओ। मैं धर्म के ब्राह्मण वेश में यहाँ आकर तुम्हें परीक्षा की। तुमने अपने पुण्य बल से स्वयं एवं परिवार का उद्धार साधन किए। तुम्हारी कीर्ति इहलोक में चिरस्थायी होगी। अब तुम स्त्री, पुत्र एवं पुत्रवधू के साथ स्वर्गारोहण करो।'
अतिथिरूपी धर्म ने यह कहा तो वह उच्छवृत्ति ब्राह्मण स्त्री, पुत्र एवं पुत्रवधू के साथ दिव्य यान पर चढ़कर स्वर्गारोहण कर गये। मैं उस ब्राह्मण के घर में रहता था। वे स्वर्गारोहण कर गये तो मैं गर्त से निकलकर उस अतिथि के भुक्तावशेष सत्तु पर लोटपोट करने लगा। तब उस उच्छवृत्ति ब्राह्मण की तपस्या एवं उसके उस सत्तु के घ्राण एवं उसके आश्रम में आकाश से वर्षित दिव्य पुष्प के गंध के प्रभाव से मेरा सिर एवं आधा शरीर सुवर्णमय हो गया। मैंने ऐसा देखकर परम तुष्ट होकर बाकि अंग सुवर्णमय करने की आशा में उसके बाद से बारंबार विभिन्न तपोवन एवं यज्ञस्थलों पर भ्रमण कर रहा हूँ, किन्तु कहीं मेरी अभिलाषा पूरी नहीं हुई। अब कुरुराज युधिष्ठिर के इस यज्ञ का वृत्तांत सुनकर बहुत आशा लेकर यहाँ आया भी तो अभिलाषा पूरी न कर सका। इसी कारण मैं हँसते-हँसते आपसे कहता हूँ कि यह महायज्ञ उस महात्मा उच्छवृत्ति ब्राह्मण के एक प्रस्थ सत्तु दान के भी समतुल्य नहीं है।” नकुल ने यज्ञभूमि स्थित ब्राह्मणों को यह कहकर प्रस्थान किया।
हे महाराज! धर्मराज युधिष्ठिर के अश्वमेध यज्ञ के अंत में उस यज्ञस्थल पर जो आश्चर्यजनक घटना घटी थी, वह घटना मैंने आपको विस्तार से बता दी। अतएव यज्ञ ही श्रेष्ठ जानकर गर्व करना आपका कर्तव्य नहीं है।
असंख्य महर्षि यज्ञ अनुष्ठान न करके केवल तपस्या के प्रभाव से स्वर्ग गये हैं। सर्वभूते अहिंसा, संतोष, सरल व्यवहार, तपस्या, इन्द्रिय जय एवं सत्य, इनमें से कोई भी यज्ञ से कम नहीं है।
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(धीरे-धीरे)