इंतेक़ाम - भाग 32 Mamta Meena द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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इंतेक़ाम - भाग 32

उधर जब रोमी ने विजय के पास फोन किया तो फोन नर्स ने उठाया क्योंकि मोबाइल विजय की जेब में ही था, फोन उठाते ही नर्स ने विजय के बारे में सब कुछ कह दिया की विजय का एक्सीडेंट हो गया है और एक औरत उसे अस्पताल लेकर आई है,,,,,

यह सुनकर रोमी भी बोली मैं अभी आती हूं और वह जल्दी से अस्पताल पहुंच गई,,,,,

निशा को देखकर रोमी का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया और बह पागलों की तरह चिल्लाते हुए कहने लगी जरूर डायन ने ही कुछ किया है मेरे विजय को पता नहीं कब पीछा छोड़ेगी मनहूस कहीं मर तो नहीं जाती,,,,

यह सुनकर निशा को विजय की चिंता थी इसलिए वह कुछ नहीं बोली, लेकिन रोमि का बोलना जारी था तो निशा रोमी की तरफ गुस्से में देखते हुए बोली कि अपनी जवान बंद रख वरना बोलने लायक भी नहीं रहेगी,,,,,

निशा को ऐसे गुस्से में देखकर रोमी ने चुप रहना ही बेहतर समझा,,,,

लगभग 2 घंटे के बाद डॉक्टर बाहर आया तो रोमी और निशा दोनों ही डॉक्टर की तरफ बागी और डॉक्टर से विजय के बारे में पूछा,,,,

तब डॉक्टर ने कहां माफ करना विजय की जान तो बच गई है लेकिन उसकी गर्दन के ऊपर के हिस्से को छोड़कर उसके नीचे का सारा इसका बेजान हो गया है,,,,

यह सुनकर रोमी और निशा दोनों ही घबरा गई ,तब डॉक्टर बोला अब तो बस वह एक जिंदा लाश बन कर रह गया है बह ने तो अपने हाथों से कुछ खा सकता है ना कुछ भी सकता है,,,,

तब निशा बोली लेकिन डॉक्टर साहब इसका कोई इलाज नहीं है क्या रुपए चाहे कितनी ही रुपए लग जाए लेकिन क्या वह विजय पहले की तरह सही सलामत नहीं हो सकता,,,,

तब डॉक्टर बोला ऐसे मामलों में अधिकतर है इलाज नामुमकिन है बस अगर भगवान की दुआ हो तो मुश्किल से एक दो पर्सेंट लोग ही अपनी पहली वाली स्थिति में आ सकते हैं आगे कुछ कह नहीं सकते हैं,,,,,,

यह कहकर डॉक्टर चला गया रोमी और निशा दौड़कर विजय के कमरे में गई,,,,

रोमी विजय को देखकर उसके पास जाकर रोते हुए बोली विजय डार्लिंग यह तुम्हें क्या हो गया है मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूंगी तुम जल्दी ही ठीक हो जाओगे,,,,

निशा बस विजय को एकटक देखे ही जा रही थी उसने कुछ नहीं कहा,,,,

भई विजय की नजर भी निशा पर थी निशा को देखकर उसके चेहरे से आवाज नहीं निकल रही थी लेकिन वह लगातार रोते हुए कुछ कहने की कोशिश कर रहा था जैसे बहुत कुछ कहना चाहता हैं लेकिन कह नहीं पा रहा हूं,,,,

तब निशा ने कुछ नहीं कहा और वह वापस अपनी फ्लैट पर आ गई, घर आकर वह कमरे में बंद होकर घंटों तक रोई आज भी उसके दिल में उतना ही विजय के लिए प्यार था जितना पहले था बह नहीं देख सकती थी विजय को ऐसी हालत में, विजय ने उसके साथ कुछ भी किया लेकिन विजय उसका पहला पति और उसका प्यार था उसका सिंदूर था,,,,

वह ऐसे कैसे विजय को इस हालत में देख सकती है लेकिन वह करें भी तो क्या करें क्योंकि उसके आत्मसम्मान पर इतनी ठेस पहुंची थी कि वह किसी से बात करना ही नहीं चाहती थी,,,,

अगर उसने विजय की कुछ देर रुक कर बात सुन ली होती तो विजय की ऐसी हालत ना होती वह अपने आप को कोसे जा रही थी कि विजय की इस हालत की चाहे जैसे भी हो लेकिन वह ही जिम्मेदार है,,,,,,

वह घंटों रोती रही जैसे ही दरवाजे पर किसी की दस्तक हुई तो उसने दरवाजा खोला तो देखा कि उसके दोनों बच्चे खड़े हुए थे,,,,

वे दोनों घबराते हुए कहने लगी क्या हुआ मम्मा आप रो क्यों रही हो हमने कितना बोला कि दरवाजा खोलो लेकिन आप ने दरवाजा खोला ही नहीं,,,,,

यह सुनकर निशा ने कोई जवाब नहीं दिया और अपने दोनों बच्चों को गले लगा लिया,,,,