ट्रिपलेट्स भाग 4 Raj Phulware द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

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ट्रिपलेट्स भाग 4

ट्रिपलेट्स भाग 4

लेखक राज फुलवरे 

अध्याय 8 : अंडरग्राउंड लैब — जहाँ इंसान प्रयोग बन जाते हैं
भाग 1 : अंधेरे की सीढ़ियाँ
रात के बारह बज चुके थे।
शहर के बाहर, जर्जर फैक्ट्री के पीछे ज़मीन के नीचे जाती लोहे की सीढ़ियाँ।
राज सबसे आगे था।
उसके हाथ में टॉर्च, आँखों में आग।
राज (धीमी आवाज़ में):
“यहीं से मेरी ज़िंदगी छीनी गई थी।”
अमर ने वायरलेस चेक किया।
अमर:
“तीन गार्ड… कैमरे एक्टिव हैं।”
प्रेम ने मुस्कराने की कोशिश की।
प्रेम:
“तो स्वागत ज़ोरदार होगा।”
सीढ़ियों से नीचे उतरते ही—
लोहे के दरवाज़े के पीछे मशीनों की आवाज़।
भाग 2 : प्रयोगशाला — जिंदा कब्र
दरवाज़ा खुलते ही बदबूदार हवा बाहर आई।
काँच के केबिन।
अंदर लोग—आधे बेहोश, आधे टूटे हुए।
राज की मुट्ठियाँ भींच गईं।
राज:
“ये लोग… मेरे जैसे हैं?”
अमर ने सिर हिलाया।
अमर:
“हाँ… फेंके हुए बच्चे… भूले हुए लोग।”
अचानक सायरन बजा।
ALERT! ALERT!
प्रेम ने चिल्लाया—
प्रेम:
“हम पकड़े गए!”
भाग 3 : पहली गोली
धड़ाम!
गोली दीवार में लगी।
अमर ने राज को धक्का दिया।
अमर:
“कवर लो!”
राज ने पहली बार बंदूक उठाई।
हाथ काँपा।
राज (खुद से):
“आज या कभी नहीं।”
धाँय!
एक गार्ड गिर पड़ा।
राज सन्न रह गया।
राज:
“मैंने… मार दिया?”
प्रेम ने कंधा थपथपाया।
प्रेम:
“तूने किसी को बचाया है।”
भाग 4 : डॉक्टर एन. चंद्रन का प्रवेश
धीमे तालियों की आवाज़।
डॉक्टर एन. चंद्रन (मुस्कराते हुए):
“शानदार… मेरा सबसे सफल प्रयोग लौट आया।”
राज आगे बढ़ा।
राज (गुस्से में):
“मैं इंसान हूँ… प्रयोग नहीं!”
डॉक्टर हँसा।
डॉक्टर:
“इंसान? तुम तो कचरा थे… मैंने तुम्हें ताकत दी।”
अमर ने बंदूक तानी।
अमर:
“एक कदम और… गोली चलेगी।”
डॉक्टर ने बटन दबाया।
भाग 5 : कैदियों का विद्रोह
केबिन खुल गए।
लोग बाहर निकले—डरे हुए, घायल, लेकिन जिंदा।
डॉक्टर:
“देखो राज… तुम्हारे जैसे बीस और।”
राज की आँखों में आँसू और आग दोनों।
राज:
“अब कोई प्रयोग नहीं होगा!”
उसने हथकड़ी तोड़ी।
एक कैदी चिल्लाया—
“आज़ादी!”
पूरी लैब गूँज उठी।
भाग 6 : विश्वासघात
अचानक—
पीछे से गोली चली।
प्रेम गिर पड़ा।
राज (चीखकर):
“प्रेम!!!”
शूटर—
अमर का जूनियर ऑफिसर।
ऑफिसर:
“सॉरी सर… डील बड़ी थी।”
अमर की आँखें लाल हो गईं।
अमर:
“वर्दी बेच दी?”
अमर ने गोली चलाई।
ऑफिसर गिर पड़ा।
भाग 7 : समय खत्म
डॉक्टर भागने लगा।
राज ने पीछा किया।
लैब में आग लग चुकी थी।
सायरन—SELF DESTRUCT INITIATED
प्रेम (कमज़ोर आवाज़ में):
“राज… मुझे छोड़ना मत…”
राज ने प्रेम को उठाया।
राज:
“कोई नहीं छूटेगा!”
अमर रास्ता साफ़ करता गया।
भाग 8 : आमना-सामना
लिफ्ट के पास डॉक्टर खड़ा था।
डॉक्टर:
“अगर मैं मरा… सबूत खत्म!”
राज ने बंदूक फेंक दी।
राज:
“तू ज़िंदा रहेगा… जेल में।”
डॉक्टर हँसा और चाकू निकाला।
धक्का—
दोनों नीचे गिरे।
आख़िरी पल में अमर ने ट्रिगर दबाया।
डॉक्टर गिर पड़ा… हमेशा के लिए।
भाग 9 : बाहर की रोशनी
धमाका।
फैक्ट्री ढह गई।
तीनों भाई ज़मीन पर पड़े—साँस लेते हुए।
एम्बुलेंस की आवाज़।
प्रेम ने मुस्कराकर कहा—
प्रेम:
“भाई… अब घर चलें?”
राज ने आसमान की ओर देखा।
राज:
“हाँ… माँ इंतज़ार कर रही होगी।”


अध्याय 9 : सच की अदालत और पहचान की वापसी


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भाग 1 : सुबह जो सब कुछ बदल दे

सुबह की पहली धूप अस्पताल की खिड़की से अंदर आई।
मशीनों की बीप–बीप के बीच प्रेम की आँखें खुलीं।

प्रेम (धीमी आवाज़ में):
“मैं… ज़िंदा हूँ?”

बगल में बैठा राज तुरंत उठ खड़ा हुआ।

राज (भावुक होकर):
“हाँ भाई… अब कोई तुझे हमसे अलग नहीं कर सकता।”

अमर कुर्सी से उठा।

अमर:
“डॉक्टर ने कहा है—तू मजबूत है। बिल्कुल माँ जैसा।”

प्रेम हल्की हँसी हँसा।

प्रेम:
“तो फिर… माँ कहाँ है?”

कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।


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भाग 2 : माँ का सच

अमर ने धीरे से कहा—

अमर:
“माँ… ज़िंदा है।”

राज और प्रेम दोनों चौंक गए।

राज:
“क्या?!”

अमर ने फ़ाइल मेज़ पर रखी।

अमर:
“डॉक्टर एन. चंद्रन के पुराने रिकॉर्ड में… एक महिला—सरस्वती देवी।
तीन बच्चों को जन्म दिया था।
एक को मजबूरी में छोड़ना पड़ा।”

राज की आँखों से आँसू बहने लगे।

राज (काँपती आवाज़ में):
“तो… मैं छोड़ा हुआ नहीं था… मजबूर किया गया था।”

प्रेम ने उसका हाथ पकड़ा।

प्रेम:
“अब हम पूरे हैं।”


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भाग 3 : मीडिया की अदालत

अस्पताल के बाहर कैमरों की भीड़।

रिपोर्टर 1:
“क्या आप वही अमर–प्रेम हैं जिन पर हत्या के आरोप लगे थे?”

रिपोर्टर 2:
“तीसरा हमशक्ल कौन था?”

अमर सामने आया।

अमर (शांत लेकिन सख़्त):
“हम आरोपी नहीं… शिकार थे।
और आज पूरा सच सामने आएगा।”


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भाग 4 : कोर्टरूम — इंसाफ की ज़मीन

कोर्ट खचाखच भरी थी।

जज साहब ने हथौड़ा बजाया।

जज:
“मामला नंबर 317—राज्य बनाम अमर, प्रेम और राज।”

सरकारी वकील खड़ा हुआ।

वकील:
“तीनों पर गंभीर आरोप—हत्या, चोरी—”

अमर बीच में बोला।

अमर:
“इजाज़त हो तो सबूत पेश किए जाएँ।”

स्क्रीन ऑन हुई।

लैब के वीडियो।
डॉक्टर के कन्फेशन।
कैदियों की गवाही।

पूरा कोर्ट सन्न।


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भाग 5 : राज की गवाही

राज गवाही के लिए खड़ा हुआ।

राज:
“मुझे बचपन में फेंका गया।
डॉक्टर ने मुझे हथियार बनाया।
मैंने गलत किया…
लेकिन अब मैं सच के साथ हूँ।”

जज ने पूछा—

जज:
“क्या पछतावा है?”

राज की आँखें झुक गईं।

राज:
“हर उस इंसान के लिए…
जिसे मैंने डराया।”


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भाग 6 : फैसला

कुछ पल की खामोशी।

जज:
“अमर और प्रेम—निर्दोष।
राज—सुधार गृह, पुनर्वास और सरकारी संरक्षण।”

कोर्ट में हलचल।

प्रेम ने राज को गले लगा लिया।

प्रेम:
“तू अकेला नहीं जाएगा।”

अमर ने कहा—

अमर:
“हम इंतज़ार करेंगे।”


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भाग 7 : माँ से मुलाक़ात

एक छोटे से आश्रम में—
सफेद साड़ी में एक बूढ़ी औरत।

माँ (काँपती आवाज़ में):
“क… कौन?”

राज आगे बढ़ा।

राज:
“माँ… मैं राज…
आपका छोड़ा हुआ नहीं… खोया हुआ बेटा।”

माँ की आँखों से आँसू बह निकले।

माँ:
“मेरे तीन बेटे…”

तीनों ने चरण छुए।

वक़्त जैसे थम गया।


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भाग 8 : नया नाम, नई पहचान

सरकारी कागज़।

अधिकारी:
“अब राज का नया नाम—
राज अमरचंद्रन।”

राज मुस्कराया।

राज:
“पहली बार… पूरा नाम मिला।”


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भाग 9 : भविष्य की ओर

समुद्र किनारे तीनों बैठे।

सूरज डूब रहा था।

प्रेम:
“अब क्या करेंगे?”

अमर ने कहा—

अमर:
“मैं पुलिस में रहूँगा… लेकिन सच के लिए।”

राज ने आसमान देखा।

राज:
“मैं उन बच्चों के लिए काम करूँगा…
जो फेंके जाते हैं।”

प्रेम मुस्कराया।

प्रेम:
“और मैं… कहानी लिखूँगा।”

तीनों हँसे।


अध्याय 10 : ट्रिपलेट्स — अंत नहीं, एक नई शुरुआत
भाग 1 : जेल नहीं, सुधार गृह
सफेद दीवारें।
खुली खिड़कियाँ।
यह जेल नहीं थी—यह सुधार गृह था।
राज पेड़ के नीचे बैठा बच्चों को पढ़ा रहा था।
राज (मुस्कराते हुए):
“गलती इंसान से होती है…
पर वही इंसान उसे ठीक भी कर सकता है।”
एक बच्चा बोला—
बच्चा:
“भैया, क्या आप कभी बुरे थे?”
राज कुछ पल चुप रहा।
राज:
“मैं खोया हुआ था…
बुरा नहीं।”
भाग 2 : बाहर की दुनिया
अमर वर्दी में खड़ा था।
छाती पर ईमानदारी की चमक।
अमर (कॉन्स्टेबल से):
“कानून सिर्फ़ सज़ा नहीं देता…
रास्ता भी दिखाता है।”
प्रेम पास में कैमरा लिए खड़ा।
प्रेम (हँसते हुए):
“भाई, ये लाइन दोबारा बोलो… फिल्म में डालूँगा।”
अमर मुस्कराया।
अमर:
“डायलॉगबाज़।”
भाग 3 : मुलाक़ात
हर रविवार।
राज बाहर आता।
तीनों एक बेंच पर बैठते।
प्रेम:
“कहानी का नाम सोच लिया।”
राज:
“क्या?”
प्रेम:
“ट्रिपलेट्स।”
अमर ने सिर हिलाया।
अमर:
“सच बिकता नहीं…
पर याद रहता है।”
भाग 4 : समाज की प्रतिक्रिया
अख़बार की हेडलाइन—
“अपराधी नहीं, शिकार थे तीन भाई”
टीवी डिबेट।
एंकर:
“क्या समाज राज को माफ़ करेगा?”
अमर टीवी बंद कर देता।
अमर:
“समय जवाब देगा।”
राज शांत।
राज:
“माफी नहीं…
मौका चाहिए।”
भाग 5 : माँ का सपना
आश्रम में माँ दीया जला रही थी।
माँ:
“हे भगवान…
मेरे बच्चों को रास्ते पर रखना।”
तीनों चरण छूते।
माँ (राज से):
“तू अंधेरे में पला…
पर उजाला बन गया।”
राज की आँखें भर आईं।
भाग 6 : रिहाई
तीन साल बाद।
अधिकारी फ़ाइल बंद करता है।
अधिकारी:
“राज अमरचंद्रन—
आप पूरी तरह मुक्त हैं।”
राज बाहर आया।
अमर और प्रेम खड़े थे।
राज ने दोनों को गले लगाया।
राज:
“अब कोई दीवार नहीं।”
भाग 7 : नया काम
एक बोर्ड—
“ट्रिपलेट्स फाउंडेशन — परित्यक्त बच्चों के लिए”
प्रेम उद्घाटन भाषण देता है।
प्रेम:
“हम कहानी नहीं बेचते…
हम ज़िंदगी बनाते हैं।”
अमर रिबन काटता है।
भाग 8 : आख़िरी दृश्य
तीनों एक छत पर खड़े।
शहर की रोशनी।
राज:
“अगर हम तीन अलग पले…
फिर भी एक हो सके—”
अमर:
“तो हर टूटा इंसान जुड़ सकता है।”
प्रेम:
“बस एक सच चाहिए।”
कैमरा ऊपर उठता है।
आवाज़ गूंजती है—
“यह कहानी अपराध की नहीं…
पहचान की है।”
— समाप्त —