श्रापित एक प्रेम कहानी - 20 CHIRANJIT TEWARY द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

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श्रापित एक प्रेम कहानी - 20

रूम में जाकर एकांश वृंदा को सुला देता है। और वसे जाने लगता है पर वृंदा एकांश का हाथ पकड़ लेती है और निंद में बड़बड़ाती है।


वृदां :- कर लो न एकांशहा 
 तेरे बाप का 
क्या जाता है।



 एकांश वृंदा का हाथ प्यार से छुड़ाता है और हल्की मुस्कान के साथ वहा से निकल जाता है। सुबह हो जाती है। वृंदा अभी तक सोयी हुई थी। वही हवेली के बाहर आलोक और संपूर्ण भी सोया हुआ था। आलोक का एक हाथ संपूर्णा के कुर्ती के अंदर संपूर्णा के वक्ष पर था जिससे संपूर्णा की कुर्ती उसके कमर से ऊपर था और संपूर्णा की गोरी कमर दिख रही थी । आलोक उठकर देखता है के वो संपूर्णा के साथ सोया हुआ था और उसका एक हाथ संपूर्णा के वक्ष पर था। 


आलोक जैसे ही अपना हाथ संपूर्णा के वक्ष से बाहर निकालने जाता है तो उसका हाथ संपूर्णा के अंतर वस्त्र से अटक जाता है। आलोक जोर लगता है तो संपूर्ण की भी निंद खुल जाती है। तो आलोक एक दम सहम जाता है। संपूर्णा देखता है के आलोक का हाथ उसके वक्ष पर था। और आलोक बहुत घबराया हुआ था। संपूर्णा आलोक के हाथ को जो संपूर्ण के वक्ष पर था धिरे से अपने अंतर वस्त्र को ऊपर उठाती है और आलोक के हाथ को निकाल देती है और आलोक की और देखती है। 



आलोक अपनी आंखें सरमा से निचे करके रखा था । आलोक संपूर्णा से कहता है ---


आलोक :- संपूर्णा वो़... मैं 


इतना बोलकर आलोक वहां से उठकर जाने लगता है तो संपूर्णा आलोक का हाथ पकड़ कर रोक लेती है और कहती हैं---


संपूर्णा: :- आलोक जो कुछ भी हुआ उसमे तुम्हारी कोई गलती नहीं है। कल रात को तुम बहुत नशे में थे और मेरे ऊपर गिर कर सो गए थे तो मैं तुम्हें यहां अकेले छोड़ कर नहीं गयी और मेैं भी यही तुम्हारे साथ ही सो गयी। 



आलोक कहता है ---

आलोक :- संपूर्णा तुम्हें यहाँ नहीं सोना चाहिए था। तो आज तुम...... 



इतना बोलकर आलोक बात को बदल कर कहता है----



आलोक :- एकांश मेरा बहुत अच्छा दोस्त है। और मैं तुमसे प्यार भी करता हूं पर मैंने एकांश के भरोसे को तोड़ दिया। जब भी तुम्हें दैखता हूँ , मैं अपने आपको रोक नही पाया पर अगर 
किसीने तुम्हें और मुझे यहाँ देख लिया तो पता नहीं क्या होगा। 



संपूर्णा कहती है----


संपूर्णा :- तुम चिंता मत करो यहां कौई नही आता है और तुम ऐसे अपने आप को दोष मत दो। तुमने किसी का भरोसा नहीं तोड़ा है। जो भी हुआ वो अंजाने में हुआ प्यार मे हुआ आलोक मैं... मैं... तुमसे बहोत प्यार करती हूँ। तो इसमे गलत क्या है। 



आलोक चुप रहता है। संपूर्णा फिर कहती है-----


संपूर्णा: :- क्या तुम अब भी मुझसे नाराज हो उस दिन के बाद मैने तुमसे मिलने की बहोत कोशिस की पर कभी मिल नही पाया हर बार तुम अपने दोस्तों के साथ रहते हो । उस दिन जब मैंने आपको उस लड़की के साथ देखा तो पता नही मुझे क्या हो गया और मैं आप से अलग हो गई पर आलोक जब मुझे पता चला के वो लड़की तुम्हारी रिस्तेदार थी तब तक तुमने तो मेरी और देखना भी बंद कर दिया आलोक तुम भी तो मुझसे प्यार करते हो ये क्या तुम्हारे जीवन में कोई और है ? 



आलोक कहता है---


आलोक :- नहीं संपूर्ण ऐसी कोई बात 
नहीं है । मैं तब भी तुमसे प्यार करती था और अब भी सिर्फ़ तुम्ही से ही प्यार करता हूँ। 



संपूर्णा पुछती है---


संपूर्णा : - तो फिर क्या बात है आलोक।


 आलोक कहता है---


आलोक :- संपूर्णा तुम एकांश की बहन हो और अगर उसे ये बात पता चली तो पता नहीं वो मेरे बारे में क्या सोचेगा। 



संपूर्णा कहती है---


संपूर्णा :- अभी किसी को कुछ पता नहीं चलेगा। जब समय आएगा तब बताऊंगी तुम टेंशन मत लो। 




इतना बोलकर संपूर्णा आलोक को गले लगाती हैं और कहती है--- 


संपूर्णा :- आई लव यू आलोक । 


आलोक भी संपूर्णा को गले से लगा लेता है और कहता है--


आलोक :- आई लव यू टु संपूर्णा। 


पर आलोक अभी भी सोच में था। संपूर्णा आलोक से कहती है---


संपूर्णा : - आप अभी भी रात के बारे में सोच रहे हो क्या। 

आलोक हां में अपना सर हिलाते हुए कहता हैं।

आलोक :- हां संपूर्णा ... वो मेरा हाथ...! 
संपूर्णा :- आलोक तुम अभी तक यही सोच रहे हो । 


इतना बोलकर संपूर्णा आलोक के होंट को चुमने लगती है और आलोक के हाथ को अपने कुर्ती के अंदर घुसा देती है। जिसे आलोक का हाथ संपूर्णा के कमर को छु रहा था। चुम्बन करने के बाद संपूर्णा आलोक से कहती है---


संपूर्णा : - जब मैं ही तुम्हारी हूं तो मेरा हर चिज पर तुम्हारा हक है। तुम मुझे कहीं पर भी छू सकते हो।

संपूर्णा के चुम्बन करने से आलोक को अब अच्छा महसूस हो रहा था और आलोक कहता है---

आलोक :- थैंक्स संपूर्णा मुझे प्यार करने के लिए और मुझे इस दोषी भावनाओं से बहार लाने के लिए। 


इतना बोलकर आलोक अपना हाथ जो कुर्ती के अंदर था वो धिरे धिरे संपूर्णा के कमर के ऊपर तक पँहुच जाता है और संपूर्णा के उभार को स्पर्श करने लगता है जिससे संपूर्णा की सांसे तेज हो जाती है और बेकाबू हो जाती है आलोक संपूर्णा को वही पर लिटा देता है और संपूर्णा का गोरी कमर जिससे कमीज ऊपर हो चुकी थी को देख कर आलोक भी बेकाबू हो जाता है।


 आलोक संपूर्णा के कमर पर चुम्बन करने लगता है। जिस संपूर्णा तड़प उठती हैं। आलोक का दौनो हाथ संपूर्ण के उभार पर था जिसे आलोक जोर से 
सहलाने लगता है। जिससे संपूर्णा के मुह से चिख निकल जाती है। दोनो एक दुसरे को पागलो की तरह चुमने लगता है। संपूर्णा आलोक के कमीज को उतर देती है और आलोक के वक्ष को चुमने लगती है ।

आलोक संपूर्णा का कुर्ती उतार देता है संपूर्णा आलोक के ऊपर अब अर्ध नग्न थी आलोक का दोनो हाथ संपूर्णा के उभार पर था। दोनो एक दुसरे में इतना खो गए थे की वो भूल गए थे के वो एक पेड़ के निचे बिचाली में सोया है। दोनो की गरम गरम सांसे चलने लगी थी। दोनो ही एक दसरे को चुमते चुमते कराहने लगता हैं। अब आलोक संपूर्णा को निर्वस्त्र कर देता है।


 संपूर्णा अब आलोक के सामने पुरी तरह से निर्वस्त्र में थी। संपूर्णा का गोरा बदन सूरज की किरनो में चमक रहा था। आलोक संपूर्णा के बदन को देखने लगता है। संपूर्णा के उभार आलोक को बहोत ही सुंदर लग रहा था आलोक से अब रह नहीं जा रहा था वो अब संपूर्णा के साथ वो सब करना चाहता था आलोक का हाथ अब संपूर्णा के शरीर के हर जगह पर जा रहा था । संपूर्णा अब आलोक के सामने पूरी तरह से नग्न थी। संपूर्णा और आलोक अब दोनो ही संभोग करने के लिए तड़प उठते हैं। आलोक संपूर्णा की ख़ूबसूरती देखकर मदहोस हो गया था। 


संपूर्णा के मुह से अब सिसकीया आने लगती है। संपूर्णा आलोक की और प्यार से देखती है और संपूर्णा आलोक से कहती है आलोक अब क्यों रुक गए आओ ना मेरे साथ वो सब किजिये। संपूर्णा के मुह से इतना सुनने के बाद अब आलोक से भी रहा नहीं जा रहा था और रह भी कैसे पाता दोनो इतने दिन बाद बिछड़कर जो मिल रहे थे आलोक संपूर्णा के उपर लेट जाता है और संपूर्णा से संभोग करने लगता है दोनो ही एक दुसरे के साथ संभोग मे खो जाता है संपूर्णा आलोक को कसके पकड़ी हुई थी और सिसकियां ले रही थी संपूर्णा अब आलोक के उपर थी और संभोग कर रही थी आलोक का दोनो हाथ संपूर्णा के वक्ष पर था और उसे सहला रहा था जिससे संपूर्णा और मदहोस होकर जोर जोर से संभोग करने लगती है । समय काफी बित चुका था पर दोनो अब भी वही सब करने मे मग्न था । अब जैसे ही दौनो सांत होने को होता है के वहां चतुर की आवाज आने लगती है जो आलोक को पुकारे हुए इधर ही आ रहा था। 



आलोक झट से उठता है और संपूर्णा के निचे का वस्त्र ऊपर कर देता है चतुर का आवाज और तेज सुनाई देने लगता है दोनो घबरा जाता है के कहीं चतुर उन दोनो को ऐसी हालत में ना देख ले। तभी आलोक संपूर्णा को कुर्ती पहना देता है और सलवार को संपूर्णा के हाथ दे कर कहता है----


आलोक :- संपूर्णा तुम यही छुप जाओ मैं चतुर को यहां से लेकर चला जाउगां 
तब तुम निकल कर यहां से चली जाना।


To be continue...258