एक कॉल बाकी है... mood Writer द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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एक कॉल बाकी है...


वो पहली बार Instagram की एक स्टोरी पर reply से शुरू हुआ था।
"Nice song choice 😄", उसने लिखा था।
और फिर गानों की बातें चाय तक जा पहुँचीं।

रोज़ रात 11 बजे के बाद उनकी बातें शुरू होती थीं।
दिनभर की थकान, कॉलेज के assignments, दोस्ती की शिकायतें — सब कुछ उन्हीं बातों में बह जाता था।

वो कहते थे, "कभी मिलोगी न, तो हम साथ बैठकर चुपचाप चाय पिएँगे।"
और वो मुस्कुरा देती थी, "मैं बहुत बोलती हूँ, तुम बोर हो जाओगे।"


---

फिर एक दिन अचानक उसने reply करना बंद कर दिया।
कोई status नहीं, कोई online नहीं — सिर्फ़ "seen" और "silence"।

वो समझ नहीं पाई — गलती क्या हुई थी?
बहुत कोशिश की, एक message, दो, फिर call...
लेकिन जवाब सिर्फ़ "ringing..." तक ही सीमित रह गया।


---

6 महीने बीत गए।
वो move on करने की कोशिश कर रही थी, पर हर चाय का कप उसे उसी इंसान की याद दिलाता।

और एक दिन…
रात के 11:01 पर मोबाइल बजा – "Incoming call – Unknown Number."

वो चौंकी, पर दिल ने कहा – “उठा ले।”
फोन उठाया – आवाज़ आई – "बस एक कॉल बाकी रह गया था..."

"माफ करना, उस वक़्त मैं ख़ुद से भी दूर चला गया था। लेकिन तुमसे दूर जाकर जाना कि, तुममें ही मेरा घर था।"

“बस एक कॉल बाकी रह गया था…”
उसने कहा।
आवाज़ काँप रही थी, पर सच्ची थी।

मैं कुछ देर चुप रही... फिर पूछा —
“क्यों किया था ऐसा? बिना कुछ कहे चले गए?”

वो रुका... जैसे शब्द तलाश रहा हो।
“कभी-कभी खुद से दूर जाना जरूरी लगने लगता है, और उसी चक्कर में सबसे दूर चला जाता है इंसान... तुमसे भी।”


---

हमने फिर बात करना शुरू कर दिया।
वो फिर रात 11 बजे का notification आने लगा,
"Goodnight? या अभी भी जाग रही हो?"
मैं मुस्कुरा देती — “जग रही हूँ, और तुम भी...”


---

कुछ हफ्तों बाद, उसने कहा —
“मिलते हैं ना, पहली बार... उसी चाय वाली टपरी पर, जो हम बातें करते थे।”
मैंने बिना कुछ सोचे, "हाँ" कह दिया।
दिल धक-धक कर रहा था, पर चेहरा शांत था।


---

मुलाकात का दिन।
मैं समय से थोड़ी पहले पहुँच गई।
बारिश की हल्की बूंदें, वो पुरानी लकड़ी की बेंच, और मेरी हथेलियों में बसा Nervousness।

वो आया —
वही आँखें, वही हँसी, पर थोड़ी थकी हुई सी।
हम दोनों मुस्कराए — कोई Hi, Hello नहीं हुआ।

बस वही पहली बात: “Chai milegi yahaan achhi?”
मैं हँस पड़ी — "Mujhe to sabse achhi yahaan hi lagti है।"


---

हम चाय पीते रहे, बात करते रहे —
जैसे कुछ बदला ही ना हो।
लेकिन दिल में कहीं एक डर भी था —
क्या ये फिर से अधूरा हो जाएगा?

वो बोला —
“मैं वापस आया हूँ... पर ये वादा नहीं कि perfect रहूंगा। पर कोशिश करूँगा कि अब silence ना रहे।”


---

मैंने चाय का आखिरी घूँट लिया और कहा —
“सिर्फ वादे मत करना, आना... बस आना।”


---

अब रोज़ नहीं, पर कभी-कभी मिलते हैं।
हम officially कुछ नहीं हैं, पर दिल unofficially फिर उसी जगह जा बैठा है।
जहाँ “seen” नहीं होता, सिर्फ “समझा” जाता है।”


---

क्योंकि कभी-कभी, एक कॉल ही काफी होता है,
ज़िंदगी की सबसे लंबी कहानी को
फिर से शुरू करने के लिए...
"हमने साथ चलने का वादा नहीं किया,
बस इतना तय हुआ कि जब भी ज़रूरत हो —
हम एक-दूसरे की कहानी में लौट सकते हैं।"
Happy ending.. ... .. ..