नेहरू फाइल्स - आकलन Rachel Abraham द्वारा कुछ भी में हिंदी पीडीएफ

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नेहरू फाइल्स - आकलन

[ 13 नेहरू का आकलन करना ]

क्या कोई देश तब भी महानता पा सकता है, अगर उनके नेता लिलिपुट हों? इसके बिल्कुल उलट, क्या किसी देश के नेताओं को तब भी महान् कहा जा सकता है, अगर कोई देश बरबादी के कगार पर जा रहा हो या बेहद गरीब ही बना रहे और उसके पास जो हो सकता था, उसके मुकाबले बेहद कम पा सके? 

आप सामान्य शब्दों में बात करके किसी व्यक्ति का उचित मूल्यांकन नहीं कर सकते हैं, जैसे— “वह एक महान् देशभक्त था। उसने इतना अधिक बलिदान किया। उन्होंने भारत की एकता सुनिश्चित की (जैसे किसी और के नेतृत्व में भारत टूट गया होता)। उन्होंने भारत को एक लोकतांत्रिक देश बनाया। वे भारत की अंतरराष्ट्रीय नीति के संस्थापक थे...इत्यादि।” 

हम जब भी भारत के किसी राजनेता की ‘महानता’ की बात करते हैं तो अकसर वह ‘परिभाषित महानता’ होती है, न कि ‘तथ्यात्मक और भौतिक उपलब्धियों के आधार पर महानता का किया गया मूल्यांकन’। एक निष्पक्ष आकलन के लिए आपको चाहिए एक उचित दृष्टिकोण, नियमों का एक सेट तथा ‘क्या करें’ और ‘क्या नहीं’। 

आकलन हेतु नियम 
“नीतियों और कार्यक्रमों को उनके परिणामों के बजाय उनके इरादों से आँकना एक बड़ी गलती है।” 
—मिल्टन फ्रीडमैन 
अर्थशास्त्र के ‘नोबेल पुरस्कार’ विजेता 

क्या करें 
नियम 1 (क्या करें) 
किसी राष्ट्रीय नेता का मूल्यांकन करते समय देश के लिए उनके योगदान का कुछ महत्त्वपूर्ण मानकों के आधार पर आकलन करें, जैसे जी.डी.पी., प्रति व्यक्ति आय, पड़ोसी देशों के साथ संबंध, आंतरिक सुरक्षा की स्थिति, बाह्य‍ सुरक्षा की स्थिति, साक्षरता का स्तर, सभी स्तरों पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की उपलब्धता और फैलाव, बुनियादी ढाँचा, औद्योगिकीकरण, कृषि विकास, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य पैरामीटर, बोलने की स्वतंत्रता, संस्थानों की गुणवत्ता, नौकरशाही की गुणवत्ता, पुलिस और आपराधिक न्याय प्रणाली, जीवन की गुणवत्ता, पर्यावरण इत्यादि। उस नेता के कार्यकाल के प्रारंभ में उन मानकों के पैरामीटर को तय करें, साथ ही उनके कार्यकाल के अंत में भी। फिर अंतर देखें! 

नियम 2 (क्या करें)
 उपर्युक्त अपने आप में पूर्ण  नहीं है। कुछ विकास ऐसा होता है, जो समय के बीतने के साथ ही होता है। महत्त्वपूर्ण  यह है कि जितना विकास हो सकता था या होना चाहिए था, उतना हुआ या नहीं? उदाहरण के लिए, 17 वर्षों में 5 आई.आई.टी. खोले गए। क्या वे 50 नहीं होने चाहिए या हो सकते थे? संभावित 50 के मुकाबले सिर्फ 5 ही क्यों खोले गए? इसका आकलन करना आवश्यक है। ऐसा करने के लिए ऐसे विकासशील, बढ़ते हुए देशों को भी तय करें, जिनके मुकाबले आप अपने प्रदर्शन को आँकना चाहें। बिल्लकु उतने ही समय के दौरान उन देशों के विकास का भी आकलन करें। अब तुलना कीजिए! 

क्या न करें 
नियम 3 (क्या न करें) 
व्यक्तिगत के साथ राजनीतिक या पेशे को न मिलाएँ। खराब राजनीतिक प्रदर्शन को व्यक्तिगत रिश्तों के बीच लाना और इसका उलटा करने का कोई उद्देश्य नहीं है। अगर आप एक राजनीतिज्ञ का मूल्यांकन कर रहे हैं तो राजनीतिक योगदान का मूल्यांकन करें। बाकी के पहलुओं का मूल्यांकन किया जा सकता है, लेकिन अलग से, ताकि मुद्दे आपस में मिल न जाएँ। उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति के रूप में गांधी का मूल्यांकन एक राजनीतिक गांधी से बिल्कुल अलग होना चाहिए। 

नियम 4 (क्या न करें) 
महानता का लोकप्रियता से कोई लेना-देना नहीं है—मीडिया को प्रबंधित किया जा सकता है, लोकप्रियता को खरीदा जा सकता है, आम जनता के साथ हेर-फेर की जा सकती है और उसे धोखा दिया जा सकता है; न ही महानता का संबंध चुनाव जीतने और लंबे समय तक सत्ता में बने रहने से होता है। मिस्र के हुस्नी मुबारक ने 41 वर्षों तक राज किया—क्या उन्हें महान् कहा जा सकता है? लीबिया के गद्दाफी दशकों से राज कर रहे थे—क्या वे इससे महान् बन गए हैं? चुनाव जीतने के बाद आप जनता और देश के लिए क्या करते हैं, वह महत्त्वपूर्ण है। अगर आपने वास्तव में कुछ नहीं किया तो आपने लोगों का और देश का बेहद कीमती समय ही बरबाद किया है। 

नियम 5 (क्या न करें) 
ऐसे सामान्य विवरणों या विशेषताओं पर भरोसा न करें और वास्तविक तुलनात्मक स्थिति का आकलन न करें। उदाहरण के लिए, ऐसे बयान जैसे— ‘वे एक महान् लोकतंत्रवादी, पूर्ण धर्मनिरपेक्ष, बेहद ईमानदार, वैज्ञानिक मस्तिष्कवाले व्यक्ति, जो बच्‍चों से बेहद प्रेम करते थे और जिन्होंने देश पर अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया’ या ‘वे मेरे नायक थे, उन्होंने कई पीढ़ियों को प्रेरित किया और लोग उन्हें प्रेम करते थे,’ मूल्यांकन में जरा भी मददगार नहीं होते हैं। 

नियम 6 (क्या न करें) 
व्यक्ति ने जो कुछ भी लिखा या बोला या दावा किया, उस पर भरोसा न करें। कोई व्यक्ति बड़ी-बड़ी बातें कर सकता है और बड़े दावे कर सकता है; लेकिन असली परीक्षा वह होती है कि उन्होंने देश और देशवासियों के लिए क्या अलग किया है? सिर्फ मूल्यांकन करना ही बहुत नहीं है। क्या व्यक्ति ने जो कहा, वह कर दिखाया? क्या उन्होंने उन लक्ष्यों को पाने में मदद की, जिनकी उन्होंने बात की थी? 

मैं लोकतांत्रिक होने को लेकर बड़े-बड़े दावे कर सकता हूँ। लेकिन क्या मेरा वास्तविक आचरण लोकतांत्रिक है? क्या मैं दूसरों की राय का सम्मान करता हूँ? या मैं तानाशाह के रूप में काम करता हूँ? क्या मैं भाई-भतीजावाद से ऊपर हूँ? या मैं खुद को आगे बढ़ाता हूँ? मैं सामाजिक अन्याय के खिलाफ बड़ी-बड़ी बातें तो कर सकता हूँ, लेकिन क्या मेरे कार्यकाल में इसमें काफी कमी आई है? केवल बात करना ही काफी नहीं है। 
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कोई भी नेता जब तक नियम 1 और 2 पर उच्‍च अंक प्राप्त नहीं करता है, उसे महान् नहीं माना जा सकता है। यह पूरी तरह से तार्किक है। आप सचिन तेंदुलकर के क्रिकेट का मूल्यांकन उनके व्यक्तिगत आचरण से नहीं करेंगे, बल्कि आप मैदान पर उनके प्रदर्शन, उनके द्वारा बनाए गए रनों के आधार पर करेंगे। 

इन मानदंडों के आधार पर कहा जा सकता है कि सिंगापुर के ली कुआन यू वास्तव में एक महान् नेता थे। 

आप व्यावसायिक प्रदर्शनों के लिए रतन टाटा का मूल्यांकन रतन टाटा को एक व्यक्ति के रूप में लेकर नहीं करते हैं, बल्कि टाटा समूह—उसके वास्तविक व्यवसाय और आर्थिक प्रदर्शन के आधार पर करते हैं। जब रतन टाटा ने कार्यभार सँभाला था, तब टाटा समूह का व्यापार एवं उसकी वित्तीय स्थिति कैसी थी और जब उन्होंने अपना पद छोड़ा, तब क्या स्थिति थी तथा उसकी तुलना अन्य व्यापारिक घरानों की प्रगति के मुकाबले कैसी रही! अगर टाटा समूह के प्रदर्शन का मूल्यांकन बुरे के रूप में किया जाता है तो रतन टाटा का प्रदर्शन भी निश्चित ही खराब आँका जाएगा। आप रतन टाटा के बुरे प्रदर्शन का ठीकरा उनके मातहतों या फिर उनके सहयोगियों के सिर पर फोड़ने का प्रयास नहीं कर सकते, या फिर उसकी तुलना उनके व्यक्तिगत गुणों से नहीं कर सकते।

 यह बिल्कुल सही तरीका है। आप रतन टाटा या मुकेश अंबानी या नारायण मूर्ति का मूल्यांकन उन कंपनियों का मूल्यांकन करके कर सकते हैं, जिनका नेतृत्व उनके हाथों में है। अगर कंपनियाँ अच्छा कर रही हैं तो आप इसका श्रेय उन्हें देते हैं। लेकिन ऐसा बहुधा ही होता है कि कोई कंपनी बहुत बुरा कर रही हो या दिवालिया हो जाए और फिर भी आप उसका नेतृत्व करने वाले व्यक्ति का मूल्यांकन अच्छे और सक्षम के रूप में करें। यह बड़ी अजीब बात है कि यह सामान्य दृष्टिकोण एक राजनेता का मूल्यांकन करते समय पता नहीं कहाँ चला जाता है! हो सकता है कि कोई देश पूरी तरह से बरबाद हो गया हो, लेकिन उसका नेता महान् हो! 

उपर्युक्त नियमों के आधार पर नेहरू का मूल्यांकन 

उपर्युक्त नियमों को ध्यान में रखते हुए और ऊपर दरशाई गई नेहरूवादी दौर की प्रमुख भूलों के आधार पर अगस्त 1947 से लेकर मई 1964 तक का नेहरू का 17 वर्ष लंबा पूरा-का-पूरा कार्यकाल ही एक बड़ी आपदा था! नेहरू मूल्यांकन के उपर्युक्त नियम 1 एवं नियम 2 दोनों पर ही खरे नहीं उतरते हैं। सभी महत्त्वपूर्ण मामलों में नेहरू की बैलेंस शीट लाल रंग से रँगी हुई है। 

करोड़ाें भारतीयों, विशेषकर गरीबों, के लिए जवाहरलाल नेहरू अपने शानदार इरादों के बावजूद चौतरफा विफल ही साबित हुए और वे अनजाने में ही भारत की दुर्गति की नींव रख रहे थे। अफसोस की बात यह रही कि नेहरू के राजवंश ने उनके द्वारा की गई गड़बड़ियों को दूर करने के बजाय उस कलंकित नींव को और अधिक मजबूत करने का ही काम किया। 

रीडिफ.कॉम में राजीव श्रीनिवासन के एक लेख के अनुसार— “नेहरू खुद ही देश के लिए लगभग हर तरीके से एक बड़ी आपदा थे। नेहरू ने अपने पीछे एक भ्रष्ट, पक्षपाती, क्षय होती स्टालिनवादी विचारधारा को छोड़ा। गौर से देखने पर स्पष्ट होता है कि नेहरू व्यावहारिक तौर पर लगभग हर क्षेत्र में पूरी तरह से गलत थे। मुझे इस बात का पूरा यकीन है कि उनके इरादे नेक थे, लेकिन नतीजे अपनी कहानी खुद कहते हैं। यह स्पष्ट है कि इस देश ने नेहरू पर भरोसा करने की एक बड़ी कीमत चुकाई है। हमने उन पर आँख मूँदकर भरोसा किया और वे बदले में कैसे साबित हुए, आंशिक तौर पर ही वे उस भरोसे पर खरे उतरे।” (डब्‍ल्यू.एन.6) 

फ्रांसवा गोतिए ने लिखा— “कांग्रेस ने आज नेहरू को एक आइकन बना दिया है और अपनी 125वीं जयंती समारोहों के माध्यम से इसे बनाए रखने की कोशिश कर रही है, जिसमें दुनिया की ज्यादा दिलचस्पी नहीं होगी, क्योंकि नेहरू भारत के अतीत हैं। सोवियत मॉडल, भारत की प्राचीन आध्यात्मिकता और जो कुछ भी हिंदू है उसका अपमान, सफेद हाथी जैसे विशालकाय राष्ट्रीयकृत उद्योगों को खड़ा करना, विशेषाधिकार प्राप्त वी.आई.पी. राजनेताओं की जमात बनाना, जो किसी के प्रति जवाबदेह नहीं, चुनावों में हित साधने के लिए मुसलमानों का तुष्टीकरण करना, विनाशकारी हिंदी-चीनी भाई-भाई की नीति, लंबी-चौड़ी नौकरशाही और भ्रष्टाचार, अमेरिका का अविश्वास आदि। इस प्रकार नेहरू ने आंदोलनों और घिसे-पिटे ढर्रे की शुरुआत कर भारत को भारी नुकसान पहुँचाया, जिसने न केवल उस काल में भारी नुकसान किया, बल्कि यह आज भी बरकरार है और देश को पीछे धकेल रहे हैं; लंबे समय तक उनकी निरर्थकता समझ आई है।” (एफ.जी.2) 

परिभाषा से ‘महानता’ 

अकसर भारत में हम जब भी किसी राजनेता की ‘महानता’ के बारे में बात करते हैं तो वह ‘परिभाषा से महानता’ होती है, न कि ‘तथ्यात्मक और भौतिक उपलब्धियों के आधार पर महानता का किया गया मूल्यांकन’! आप नेहरू का मूल्यांकन ऊपर दिए गए नियम 3 से नियम 6 ‘क्या नहीं करना चाहिए’ के आधार पर करते हैं। लोग, यहाँ तक कि बुद्धिजीवी, सामाजिक टिप्पणीकार, राजनेता, वरिष्ठ पत्रकार और लेखक—सभी उनका महिमामंडन करने को सामान्य बात बोलते हैं, हालाँकि वे उनकी कुल नाकामियों को अपने सामने देख रहे होते हैं। 

दुर्भाग्य से, इसके चलते उन्हें एक ऐसा कद प्राप्त हो गया, जिसके लायक वे थे नहीं। असत्यता हमेशा देश के लिए नुकसानदेह होती है। वे अपनी खुद की झूठी छवि को लेकर इतने गुमान में थे कि घमंड के साथ अपनी ‘बुद्धिमत्ता’ का उपयोग करते रहे, दूसरों को नीचा दिखाते तथा नजरअंदाज करते रहे और एक के बाद एक बड़ी गलती करते रहे। उन्हें रोकनेवाला कोई था ही नहीं। इसने अंततः नुकसान तो देश को ही पहुँचाया। वह सिर्फ इतने पर ही नहीं रुके। उनका आभामंडल ऐसा बना दिया गया कि उनके वंशज खुद को उस पद के लिए ही पैदा हुआ होना मानने लगे। इसलिए वे लोग, जो किसी भी राष्ट्रीय नेता की अनुचित प्रशंसा करते हैं या उनका गुणगान करते हैं, वास्तव में देश का नुकसान ही कर रहे हैं। अगर नेहरू मोतीलाल के बेटे नहीं होते और अगर गांधी ने उनका राजतिलक करके थोपा नहीं होता तो नेहरू आज कहाँ होते! 

मूल्यांकन में मदद करने के लिए वैकल्पिक स्थितियाँ 

अगर हम उपर्युक्त नियम 1 और नियम 2 को ध्यान में रखते हुए मूल्यांकन करने के लिए स्थितियों को लेते हैं तो निम्नलिखित सवालों के सामने आने की पूरी उम्मीद है—
 . जब नेहरू ने प्रधानमंत्री के रूप में कार्यकाल सँभाला था, उसकी तुलना में क्या नेहरू के कार्यकाल के अंत में भारत की सीमाएँ अधिक सुरक्षित और शांतिपूर्ण थीं? इसका मतलब हुआ, क्या हमारी बाह्य‍ सुरक्षा अच्छी थी? 
इसका जवाब होगा—एक बड़ी न। कृपया भूल#33-47 देखें। 
. क्या नेहरू के कार्यकाल के अंत तक उनकी प्रतिष्ठित विदेश नीति के फलस्वरूप भारत अपने सभी पड़ोसी देशों का अच्छा मित्र था?
 नहीं। तिब्बत जैसे मित्र गायब हो गए थे। कभी मित्र रहा चीन दुश्मन बन चुका था, श्रीलंका आपको भाव नहीं देता था, पाकिस्तान एक दुश्मन ही बना रहा। कृपया भूल#48-58 देखें। 
. क्या भारत अपनी विदेश नीति और उपलब्धियों के चलते सन् 1964 तक और अधिक सम्मानित राष्ट्र बन चुका था? 
दुर्भाग्य से, नहीं। यह बेइज्जती करने की एक चीज बन गया, एक ऐसा देश, जिसे दूसरे नजरअंदाज करते रहे। एक अंतरराष्ट्रीय भिखारी बन गया।
. क्या नेहरू के कार्यकाल के अंत में हमारी आंतरिक सुरक्षा तब से बेहतर थी, जब उन्होंने पद सँभाला था? 
एक बार फिर नहीं। कृपया भूल#59-63 देखें। 
. क्या नेहरू के 17 वर्षों के लंबे शासन के दौरान देश में गरीबी कम हुई? 
नहीं। गरीबी और दुःख कई गुना बढ़ गए। कृपया भूल#64-70 देखें। 
. क्या भारत नेहरू के कार्यकाल के दौरान खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बन गया? 
नहीं, बल्कि यह करोड़ों भूखे लोगों का घर बन गया, एक अंतरराष्ट्रीय भिखारी! कृपया भूल#66 देखें। 
. क्या भारत नेहरू के कार्यकाल में एक औद्योगिक राष्ट्र बन गया था? 
नहीं। वास्तव में नेहरू के समाजवादी प्रेम और निजी क्षेत्र पर लगाई गई कई पाबंदियों के चलते भारत का औद्योगिक विकास रुक गया था। ब्रिटिश ऋण-पुनर्भुगतान द्वारा केवल अन्य सार्वजनिक क्षेत्रों में व्यापक रूप से अक्षम सार्वजनिक क्षेत्र का विस्तार हुआ। सार्वजनिक क्षेत्र पैसा हजम करनेवाला सफेद हाथी साबित हुआ। कृपया भूल#65 देखें। 
. दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों की तुलना में क्या भारत ने आर्थिक मोरचे पर बेहतर प्रदर्शन किया? 
नहीं। भारत उनसे कहीं अधिक पिछड़ गया था, हालाँकि भारत ने उनके मुकाबले कहीं अच्छी स्थिति में प्रारंभ किया था। कृपया भूल#67-68 देखें। 
. क्या भारत आजादी के 17 साल बाद एक समृद्ध देश के रूप में उभर पाया था? 
निश्चित रूप से नहीं। कृपया भूल#64-70 देखें। 
. क्या भारत की साक्षरता दर में नाटकीय रूप से परिवर्तन हुआ? 
नहीं। कृपया भूल#79 देखें। 
. क्या देश से अस्पृश्यता का अभिशाप खत्म हो गया था? क्या दलितों की स्थिति सुधरी थी? 
नहीं। कृपया भूल#63, 75 देखें। 
. क्या अल्पसंख्यक, जिनमें मुसलमान भी शामिल थे, अधिक सुरक्षित महसूस करते थे? 
नहीं। कृपया भूल#63 देखें। 
. क्या आम आदमी को न्याय और सुरक्षा प्रदान करनेवाली आपराधिक न्याय प्रणाली में सुधार हुआ? 
नहीं। हमने दमनकारी औपनिवेशिक व्यवस्था को अपनाया तथा स्थिति को और अधिक बदतर बना दिया। कृपया भूल#71-72 देखें।
. क्या बाबूवाद सेवा-परायण और गरीबों के प्रति सहानुभूति रखनेवाला बन गया? नहीं। नेहरू के राज में होनेवाली सबसे बुरी चीज और जिसे इंदिरा, संजय एवं राजीव के दौर में भी पाला-पोसा गया, वह था भारत का बाबूवाद, आई.ए.एस.-आई.पी.एस.- आई.एफ.एस.-आई.आर.एस. का गठजोड़, जो आपराधिक न्याय प्रणाली और उसके नीचे की नौकरशाही से जुड़े थे। बाबूवाद समाजवाद, विकास की खराब दर, निरंतर गरीबी, अन्याय और दुःख से बेहद नजदीक से जुड़ा है। यह अधिक भ्रष्ट, खुदगर्ज, उदासीन और शातिर बन गया। कृपया भूल#71-74 देखें। 
. क्या राजनीतिक और नौकरशाही व्यवस्था में भ्रष्टाचार तथा बेईमानी में कमी आई? 
नहीं, बल्कि यह और अधिक बदतर हो गई। कृपया भूल#73-74 देखें। दुर्भाग्य से, यह ‘नहीं’ की एक पूरी शृंखला है! उपर्युक्त स्थितियाँ संपूर्ण नहीं हैं, बल्कि उदाहरणार्थ हैं। 

एक तो चोरी, ऊपर से सीनाजोरी 

सपने देखने वाला और आदर्शवादी या फिर ‘अनभिज्ञता का नवाब’ 
कश्मीर, भारत-चीन युद्ध, अर्थव्यवस्था और इसी क्रम में कई अन्य मुद्दों से निबटने के नेहरू के त्रुटिपूर्ण तरीकों का बचाव कर पाने में असमर्थ रहने के बाद उनके प्रशंसकों ने एक बिल्कुल ही नया बहाना तलाशा है—नेहरू सपने देखनेवाले और आदर्शवादी थे! ‘सपने देखनेवाले’ का आशय यह होता है कि उनकी सोच बहुत बड़ी थी और ‘आदर्शवादी’ का अर्थ यह था कि वे उच्‍च सिद्धांतोंवाले, उच्‍च नैतिक मानकोंवाले एवं निष्कलंक सुसंस्कृत व्यक्ति थे और इसी वजह से उन्हें अपने सिद्धांतहीन विरोधियों की चालों में आकर कुछ मामलों में मुँह की खानी पड़ी।

 नेहरू एक सपने देखने वाले और आदर्शवादी तो थे नहीं, बल्कि जैसेकि किसी ने उनके लिए बिल्कुल ठीक कहा है, ‘अनभिज्ञता के नवाब’ थे। 

अगर नेहरू ने लाखों लोगों को उन सपनों को साकार करने में मदद की होती, जो उन्होंने आजादी के समय देखे थे, तो निश्चित रूप से एक सपना देखनेवाले के रूप में नेहरू की बहुत सराहना होती। बड़े अफसोस की बात है कि लाखों लोगों के अच्छे सपने दुःस्वप्न में बदल गए! क्या जिम्मेदारी के शीर्ष पद पर बैठे व्यक्ति का सपना देखना एक अभिजात विलासिता और आसक्ति है, जिसे सिर्फ लुटियंस दिल्ली के एक विशेष माहौल द्वारा ही वहन किया जा सकता है? 

वी.पी. मेनन ने बिल्कुल ठीक ही टिप्पणी की थी, “भारत के आगे जो काम पड़े हैं, उसमें उसे सरदार (पटेल) के गर्भित शब्दों कि ‘वास्तविकताओं की अनदेखी करना मूर्खता होगी; अगर ठीक और सही तरीके से तथ्यों का सामना नहीं किया जाए तो वे अपना बदला जरूर लेते हैं।’ याद किए जाएँगे।” (वी.पी.एम.1/335) 

‘आदर्शवाद’ और ‘उच्‍च सिद्धांतों’ के बारे में बात करते हुए क्या कोई यह सवाल उठा सकता है कि वे कौन से उच्‍च सिद्धांत थे, जिन्होंने नेहरू को भारत-चीन सीमाओं से जुड़े विवाद का बातचीत के जरिए हल तलाशने से रोका था? वे उदात्त आदर्श क्या था, जिसने नेहरू को हमारे शांतिपूर्ण पड़ोसी तिब्बत को एक राष्ट्र के रूप में मिटाने की अनुमति दी थी? ऐसी कौन सी सैद्धांतिक मजबूरियाँ थीं, जिनके चलते नेहरू ने तिब्बत के बार-बार आग्रह करने के बावजूद इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में उठाने से इनकार कर दिया? वे कौन से उच्‍च नैतिक मानदंड थे, जिन्होंने नेहरू को यह सुनिश्चित करने से रोक दिया कि श्रीलंका अपने तमिल नागरिकों के साथ उचित व्यवहार करे? यह कैसा आदर्शवाद था, जिसके तहत उन्होंने अपनी बेटी को भाई-भतीजावाद का सबसे बड़ा उदाहरण बनाकर आगे बढ़ाया? भ्र्रष्टों को बचाने के दौरान उनकी वह महान् नैतिकता कहाँ चली गई थी, जिसका प्रयोग उन्होंने अपने कुछ सहयोगियों पर किया? क्या भारत-चीन युद्ध में पराजय के बाद उनका प्रधानमंत्री के पद पर बने रहना उचित था? आखिर क्यों उनके कुछ कामों की सांस्कृतिक ‘चतुराई’ सवालों के घेरे में है? 

अभिनव प्रति तथ्यात्मक 

“राजनीति में मूर्खता कोई बाधा नहीं है।” 
—नेपोलियन बोनापार्ट 

तथ्यों के आधार पर नेहरू का गुणगान करने में असफल रहने के बाद उनके कई समर्थकों ने खुद ही यह धारणा बना ली कि नेहरू ने जो कुछ कर दिखाया, उसे कोई और कर ही नहीं सकता था तथा कुछ अभिनव प्रति तथ्यात्मकों के साथ सामने आए, जैसे— “अगर नेहरू नहीं होते तो भारत एकजुट और धर्मनिरपेक्ष नहीं रह पाता! अगर नेहरू नहीं होते तो देश में लोकतंत्र का नामोनिशान नहीं होता और नागरिक स्वतंत्रता का आनंद लेने से वंचित रह जाते।...” (लेकिन भूल : 95-105 एक बिल्कुल ही अलग कहानी सामने लाते हैं।) अगर तथ्य आपके लिए मददगार साबित नहीं हो पा रहे हैं तो अनुमानों और संभावनाओं का सहारा लें। 

अगर कोई एक वैकल्पिक प्रति तथ्यात्मक बात रखे और यह तर्क दे कि नेहरू के स्थान पर अगर कोई दूसरा व्यक्ति (कहने को जैसे सरदार पटेल या सी. राजगोपालाचारी या डॉ. बी.आर. आंबेडकर) भारत का प्रधानमंत्री होता तो क्या भारत अधिक एकजुट, अधिक सुरक्षित, अधिक धर्मनिरपेक्ष एवं सांप्रदायिकता से मुक्त, अधिक लोकतांत्रिक तथा और अधिक समृद्ध नहीं होता और इस बात की पूरी संभावना है कि भारत सन् 1964 में ही पहली पंक्ति के देशों की श्रेणी में शामिल हो गया होता! 

निष्कर्ष 
नेहरू का नेतृत्व न सिर्फ उपलब्धियों की न्यूनता, बल्कि क्षमता और वास्तविकता के बीच के बड़े अंतर या फिर अन्य तुलनीय देशों के मुकाबले खराब प्रदर्शन के मामले में अतुलनीय है; बल्कि उनके द्वारा की गई गलतियाँ भी अद्वितीय हैं। बाकी के नेता भी गलती करते हैं, लेकिन नेहरू ऐसा करने में उन सबसे कहीं आगे हैं। नेहरूवादी भूलों की संख्या, सीमा और व्यापकता को कोई टक्कर ही नहीं दे सकता। व्यापक? अन्य नेता एक, दो या फिर तीन मोरचों पर भूल करते हैं, लेकिन नेहरू नहीं। उनका दायरा तो 360 डिग्री का था। उन्होंने वास्तव में हर क्षेत्र में गलतियाँ कीं (तथा उप-क्षेत्रों में भी और बहुत से तरीकों से भी)—बाह्य‍ सुरक्षा, आंतरिक सुरक्षा, विदेश नीति, अर्थव्यवस्था, शिक्षा, संस्कृति, ...यह एक अंतहीन सूची है। उनके रिकॉर्ड का एक परीक्षण आपकी साँसों को फुलाकर रख देगा। 

नेहरू ने अपने पीछे एक विषाक्त राजनीतिक (वंशवादी और अलोकतांत्रिक), आर्थिक (समाजवादी और गरीबी—स्थायी), औद्योगिक (अक्षम और बोझिल सार्वजनिक तथा राज्य क्षेत्र), कृषि (उपेक्षित और भूखा, भारत को एक दयनीय रूप से गरीब और भूखा राष्ट्र तथा एक अंतरराष्ट्रीय भिखारी दरशानेवाली), भौगोलिक और बाहरी सुरक्षा (अधिकांश सीमाएँ असुरक्षित और एक कमजोर राष्ट्र, जो अपनी रक्षा करने में असमर्थ है), प्रशासनिक (अक्षम और भ्रष्ट बाबूवाद), ऐतिहासिक (मार्क्सवादी, वामपंथी और नकारात्मकतावादी विकृतियाँ), शैक्षिक (अभिजात वर्ग और कोई सार्वभौमिक साक्षरता नहीं) तथा सांस्कृतिक (भारतीय विरासत पर कोई गर्व नहीं) विरासत छोड़ी। 

निश्चित रूप से, इस सच्‍चाई के बावजूद कि नेहरू के दौरे की बैलेंस शीट पूरी तरह से लाल रंग से रँगी हुई थी, इस बात को भी झुठलाया नहीं जा सकता कि नेहरू अच्छा करना चाहते थे—यह एक बिल्लकु अलग बात है कि अर्थशास्त्र, विदेशी मामलों, बाहरी सुरक्षा, आंतरिक सुरक्षा, धार्मिक व सांस्कृतिक मुद्दों और कई अन्य चीजों को लेकर उनकी समझ बिल्लकु गलत थी, जिसके परिणामस्वरूप कई ऐसी नीतियाँ अपनाई गईं, जो देश के लिए बेहद घातक साबित हुईं। इसके अलावा उनका इरादा नेक था, लकिन फिर नरक का रास्ता अकसर अच्छे इरादों से ही बनता है। 

नेहरू की मृत्यु से ठीक तीन महीने पहले सांसद डॉ. बी.एन. सिंह ने कहा, “अगर आप ग्रामीण भारत की एक झलक भी देखते हैं तो आपको और भी अधिक भयानक मंजर दिखाई देंगे— हर गाँव में बयाँ न की जानेवाली गरीबी और दुःख, आधी से भी अधिक आबादी के लिए 19 व 31 नये पैसे के बीच की दैनिक आय; राष्ट्रीय आय में वृद्धि से अधिक जनसंख्या वृद्धि, अभी भी 70 से 80 प्रतिशत के बीच निरक्षरता, समाज के भीतर फंगस की तरह फैलता जातिवाद का दंश, कहीं महामारी तो कहीं अकाल का तांडव, पुलिस विभाग में भ्रष्टाचार, सरकार में रिश्वत, उच्‍च राजनीति में कुटिलता और संरक्षण, नीचे के स्तर पर डराना व धमकाना और लोगों के चेहरों पर निराशा व हताशा को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।” (डब्‍ल्यू.एन16) 

आवश्यक: नेहरूवाद और वंशवाद से मुक्ति 

कोई भी कह सकता है—नेहरू का ही रोना क्यों? उन्हें गए हुए तो लंबा अरसा हो गया। शारीरिक रूप से गए हुए लंबा अरसा हो चुका; लेकिन दुर्भाग्य से, उनकी अधिकांश सोच और नीतियाँ अभी भी जीवित हैं। यह समझना बेहद आवश्यक है कि उन्होंने गलत रास्ते का अनुसरण किया और राष्ट्र को उन विचारों से स्वतंत्रता प्राप्त करने तथा आगे बढ़ने की आवश्यकता है। यहाँ कुछ भी व्यक्तिगत नहीं है। एक व्यक्ति के रूप में किसी के पास नेहरू के खिलाफ कुछ भी नहीं है; लेकिन अगर उनकी नीतियों के कारण करोड़ाें लोग पीड़ित हुए और उनकी नीतियों की निरंतरता के चलते करोड़ाें लोग पीड़ित हैं तो यह एक मृत ऐतिहासिक प्रश्न नहीं है। 

स्वतंत्रता का अर्थ सिर्फ राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं है। व्यक्तियों के लिए सार्थक स्वतंत्रता भूख से मुक्ति, गरीबी से मुक्ति, असुरक्षा से मुक्ति, अपमान के जीवन से मुक्ति, अन्याय से मुक्ति, हमारे महानगरों, शहरों, कस्बों और गाँवों की बदबूदार गंदगी से मुक्ति, बीमारी से मुक्ति, भ्रष्टाचार से मुक्ति, भाई-भतीजावाद से मुक्ति निरक्षरता से मुक्ति, कुशासन से मुक्ति, गुंडागर्दी से मुक्ति, जीवन में आगे बढ़ने की स्वतंत्रता, समृद्ध होने की स्वतंत्रता, गुणवत्तापूर्ण जीवन जीने की स्वतंत्रता और अपने वंशजों के लिए गुणवत्तापूर्ण जीवन निर्मित करने की स्वतंत्रता है। 

और इन स्वतंत्रताओं को हासिल करने की दो पूर्वापेक्षाएँ हैं—नेहरूवादी दिखावे से मुक्ति या दूसरे शब्दों में कहें, तो नेहरूवाद से मुक्ति; और वंशवाद से छुटकारा यानी कि वंशवाद को खत्म करना—न सिर्फ राष्ट्रीय स्तर पर, बल्कि राज्य स्तर पर भी राजवंशों से मुक्ति। 

सीता राम गोयल ने ‘नेहरूवाद’ पर विचार किया— “आज मैं जवाहरलाल नेहरू को एक फूले हुए गोरे साहब के रूप में देखता हूँ और नेहरूवाद को सभी साम्राज्यवादी विचारधाराओं, इसलाम, ईसाई धर्म, गोरे लोगों पर निर्भरता और साम्यवाद के संयुक्त अवतार के रूप में देखता हूँ, जो विदेशी आक्रमणों के बाद इस देश में अपने पाँव पसार चुका है। और मेरे मन में इस बात को लेकर तनिक भी संदेह नहीं है कि अगर भारत को जीवित रहना है तो नेहरूवाद को मरना ही होगा। निश्चित तौर पर, यह पहले से ही भारतीय लोगों, उनके देश, उनके समाज, उनकी अर्थव्यवस्था, उनके पर्यावरण और उनकी संस्कृति पर किए गए अपने पापों के बोझ तले मर रहा है। मेरी सिर्फ इतनी सी प्रार्थना है कि नेहरूवाद के सभी रूपों के प्रति एक सचेत अस्वीकृति उसके पतन की गति को और बढ़ा देगी तथा ऐसा करना हमें उस नुकसान से बचाएगा, जो इसके रहने देने पर भविष्य में पैदा हो सकते हैं।” (एस.आर.जी./56)