भूल-127
एडविना माउंटबेटन के लिए विशेष प्रबंध
एडविना को सन् 1960 में उनकी मरजी के मुताबिक समुद्र में दफनाया गया था—माउंटबेटन के नौसेना के कॅरियर को श्रद्धांजलि। समुद्र में उनके मृत शरीर को ले जानेवाले ब्रिटिश युद्धपोत ‘वेकफुल’ के रक्षार्थ साथ गया था भारतीय युद्धपोत ‘त्रिशूल’—नेहरू के नेतृत्व में भारत ने उन्हें इतनी इज्जत बख्शी थी। लेडी माउंटबेटन की बेटी लेडी पामेला हिक्स का भी कहना है, “1960 में एडविना की मृत्युपर उनकी इच्छा के अनुसार उन्हें समुद्र में दफनाया गया था। उनके शोक-संतप्त परिवार के उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने के बाद वहाँ से वापस चले जाने के बाद भारतीय युद्धपोत ‘त्रिशूल’ ने चुपचाप हमारा स्थान ले लिया और पंडितजी के निर्देश पर लहरों पर गेंदे के फूल बिखेरे गए।” (यू.आर.एल.100)
इसकी तुलना नेहरू द्वारा सरदार पटेल, नेताजी सुभाष, डॉ. आंबेडकर और डॉ. राजेंद्र प्रसाद की मृत्यु के बाद उनके साथ किए गए बरताव के साथ करें, जिसके बारे में हम पहले बता चुके हैं।
वेब पर उपलब्ध कई पुस्तकों और सामग्रियों, जिनमें एलेक्स वॉन टुंजेलमेन की ‘इंडियन समर : द सीक्रेट हिस्टरी अॉफ द एंड ऑफ एन एंपायर’ भी शामिल है, के अनुसार, माउंटबेटन के कई प्रेम-प्रसंग थे, जबकि एडविना एक बेहद अमीर परिवार से ताल्लुक रखती थीं, खुद को व्यस्त रखती थीं और उनके कई प्रेमी थे—नेहरू भी उनमें से एक थे। लेकिन क्या एडविना बेहद खूबसूरत थीं? शायद ही (लेकिन उनका रंग गोरा था)। कुछ ऐसा, जिसके आगे ‘भूरे साहब’ झुक जाते थे।
फ्रांसवा गोतिए ने लिखा—“परेशानी यह नहीं है कि उन दोनों (नेहरू और लेडी माउंटबेटन) के बीच शारीरिक संबंध थे या नहीं, परेशानी यह है कि यह ‘प्रेम-संबंध’ नेहरू के उस घातक आकर्षण का एक प्रतीक है, जो नेहरू गोरी चमड़ी के लिए रखते थे; क्योंकि एडविना अपनी खूबसूरती के लिए नहीं जानी जाती थीं, बल्कि वे अपनी कामुकता और असंगतता के लिए अधिक जानी जाती थीं। परेशानी यह नहीं है कि क्या माउंटबेटन जोरू का गुलाम था या नहीं, बल्कि परेशानी यह है कि भारत के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया गया था, क्योंकि नेहरू ने विभाजन और ब्रिटिशों की शर्तों को स्वीकार कर अपनी कमजोरी को हावी होने दिया था।” (एफ.जी.2)
‘वन लाइफ इज नॉट एनफ’ में नटवर सिंह लिखते हैं— “वर्ष 1961 में महारानी एलिजाबेथ द्वितीय गणतंत्र दिवस परेड की मुख्य अतिथि थीं। लॉर्ड माउंटबेटन ने नेहरू को इस बात के लिए राजी कर लिया था कि महारानी और राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद मिलकर परेड की सलामी लेंगे। यह एक बेतुका प्रस्ताव था। मैंने इस बारे में अपने कई सहयोगियों से बात की। सबने इसके प्रति अस्वीकृति ही प्रकट की। मैंने एस. राधाकृष्णन के बेटे एस. गोपाल से भी बात की। माहौल को देखते हुए नेहरू ने विचार को त्याग दिया। मैं सबसे अधिक चिंतित हुआ नेहरू पर माउंटबेटन के प्रभाव को देखकर, जो सचमुच उनके इशारों पर नाच रहे थे। वे माउंटबेटन की कमियों की चकाचौंध से बेखबर थे। उनकी पत्नी (एडविना) नेहरू के प्रेम में पड़ चुकी थीं और नेहरू उनके। वर्ष 1960 के प्रारंभ में बोर्नियो में एडविना माउंटबेटन की मृत्यु होने पर नेहरू ने संसद् में उन्हें श्रद्धांजलि दी। यह अभूतपूर्व था।” (के.एन.एस./42)
एलेक्स वॉन टुंजेलमेन ने लिखा—
“ ...‘कृपया इस बात को अपने तक ही रखें, लेकिन वे (एडविना) और जवाहरलाल एक साथ कितने अच्छेलगते हैं।’ उन्होंने (माउंटबेटन ने) अपनी बड़ी बेटी पैट्रिशिया को लिखा— ‘वे वास्तव में एक-दूसरे को बेहद प्रेम करते हैं और पैमी और मैं वह सबकुछ कर रहे हैं, जो हम सावधानी से कर सकते हैं...और दिन के समय जवाहर और एडविना स्ट्रॉबेरी की झाड़ियों के पीछे चले गए और शाम के समय शिमला की वादियों में गाड़ी में बैठकर घूमते दिखाई दिए।” (टुंज/323)
बख्तियार आगे जोड़ते हैं— “उन दिनों में नेहरू और एडविना के बीच जबरदस्त प्रेम चल रहा था और कहा जाता है कि माउंटबेटन ने भी इसके लिए मौन स्वीकृति दे रखी थी। इसके अलावा, जिन्ना को पत्रों का एक छोटा सा ढेर सौंपा गया था, जो एडविना ने जवाहर को लिखे थे। एडविना के एक पत्र में लिखा था— ‘डिकी (माउंटबेटन) आज रात को बाहर होंगे। आप रात 10 बजे के बाद आ जाएँ।’ एक में था— ‘आप अपना रुमाल भूल गए और इससे पहले कि डिकी उसे देखे, मैंने उसे छिपा दिया।’ तीसरे में लिखा था— ‘मेरे पास शिमला की खुशनुमा यादें हैं, सवारी और आपका छूना।’” (टुंज/208-09) (संयोग से, जिन्ना ने उन पत्रों का दुरुपयोग नहीं किया)
(1948 में) हीथ्रो में नेहरू का आधिकारिक स्वागत हुआ; लेकिन वे पहले माउंटबेटन के छोटे से फ्लैट पर पहुँच गए। एडविना के लिए आधी रात को उनका आना बेहद खुशनुमा लगा था। अगले दिन वे उन्हें ब्रॉडलैंड्स ले गईं। डिकी ने यह सुनिश्चित किया कि वह इस दौरान जान-बूझकर गायब रहें।” (टुंज/337)
21 फरवरी, 1960 को जब बोर्नियो के एक इंडोनेशियाई होटल में एडविना की मृत्यु हुई तो उनके चारों ओर कई पत्र बिखरे हुए पाए गए। कहा जाता है कि वे नेहरू के प्रेम-पत्र थे। (वॉल्प2/474)
नेहरू के सचिव ‘मैक’ एम.ओ. मथाई ने लिखा— “एक बात, जिस पर मेरा ध्यान हमेशा जाता था, वह यह थी कि नेहरू जब भी लेडी माउंटबेटन के साथ में खड़े होते थे तो वे बेहद प्रसन्न प्रतीत होते थे।” (मैक/209)
एम.ओ. मथाई ने यह भी लिखा— “एक बार लंदन के ‘इंडिया हाउस’ में आयोजित एक समारोह में, जिसमें एटली और कई अन्य गण्यमान्य व्यक्ति भी मौजूद थे, नेहरू और लेडी माउंटबेटन एक कोने में बैठकर बातें कर रहे थे। कृष्णा मेनन मेरी ओर आए और कहा कि लोग इस बात पर टिप्पणी कर रहे हैं और मुझसे अनुरोध किया कि मैं बीच में व्यवधान डालूँ, ताकि नेहरू को वहाँ से हटाया जा सके।” (मैक/14)
रुस्तमजी ने लिखा— “जे.एन. (जवाहरलाल नेहरू) के भीतर भी विदेशी महिलाओं से प्रभावित होने की विशिष्ट भारतीय कमजोरी थी (गोरी मेम)। वे उनकी पसंदीदा थीं।” (रुस्त/64)
“असम के एक दौरे के दौरान उन्होंने (नेहरू ने) मुझे यह बात सुनिश्चित करने के लिए कहा कि उन्होंने शिलांग में जिन अॉर्किड का अॉर्डर दिया था, वे लंदन में लेडी माउंटबेटन तक सुरक्षित पहुँचें।” (रुस्त/39)
स्टेनली वोलपर्ट ने नेहरू और एडविना को नई दिल्ली में एक साथ एक समारोह में देखा और लिखा—
“मैं उस शाम नेहरू को इतना अधिक खुश देखकर बहुत आश्चर्यचकित था। वह (नेहरू) और एडविना बिल्कुल किशोर वय प्रेमियों की तरह व्यवहार कर रहे थे—एक- दूसरे को छूना, एक-दूसरे के कानों में फुसफुसाना, हँसना, हाथों में हाथ डालना।...लॉर्ड माउंटबेटन अकसर खुद नेहरू और अपनी पत्नी के बीच के पत्राचार को ‘प्रेम-पत्र’ कहकर पुकारते थे और वे औरों से बेहतर जानते थे कि एडविना अपने ‘जवाहा’, वह नेहरू को प्यार से इसी नाम से बुलाती थीं, को कितना पसंद करती थीं। नेहरू की बेटी इंदिरा इसीलिए उनसे नफरत करती थीं।” (वॉल.2/8)
तथाकथित तौर पर स्वतंत्रता के बाद नेहरू लगभग प्रतिवर्ष एडविना के साथ रहने के लिए लंदन जाते थे या फिर वे उनके साथ रहने के लिए भारत आती थीं। कहा तो यह भी जाता है कि इसके अलावा, लंदन में उच्चायुक्त के रूप में तैनात कृष्णा मेनन का एक और काम होता था—हवाई अड्डेपर किसी भी समय नेहरू का स्वागत करना और उन्हें गाड़ी से एडविना के एकांत में बने घर (ब्रॉडलड्सैं) तक ले जाना, जहाँ नेहरू और एडविना निजता का पूरा लाभ उठाते थे।” (वॉल.2/10)
स्टेनली वॉलपर्ट ने लिखा—
“नेहरू एक बार फिर लंदन के लिए उड़े। कृष्णा मेनन हमेशा की तरह रॉल्स लेकर हवाई अड्डे के बाहर उनका इंतजार कर रहे थे और वे आधी रात से पहले उन्हें लेकर एडविना के घर पहुँच गए। इंदिरा ‘उस माउंटबेटन महिला’ के प्रति नेहरू की दीवानगी को लेकर बेहद दुःखी थीं!” (वॉल.2/443)
“जवाहर ने इस बारे में एडविना से बात करने की कोशिश की कि वे डिकी (माउंटबेटन) के घर वापस जाने (जून 1948 में) के बाद उसके साथ रहें, क्योंकि अब तक उसे पता चल चुका था कि उनका हृदय सिर्फ उसके लिए धड़कता है। निश्चित रूप से, माउंटबेटन को भी इस बात का पता था कि ‘ये दोनों प्रेमी हैं’, जैसाकि उनके बाकी सभी मित्रों को पता था। एडविना की बहन मैरी इसके लिए नेहरू से नफरत करती थी।... इसके बावजूद वह उसे चाहता था। उसे उसकी जरूरत थी। वह उसके आगे याचना करता था।...” (वॉल्प2/435)
एम.जे. अकबर कभी टाटा स्टील के मुख्य कार्यकारी अधिकारी रहे रूसी मोदी और नेहरू की नैनीताल में हुई एक मुलाकात के बारे में लिखते हैं, जहाँ पर नेहरू अपने पिता और यू.पी. के राज्यपाल सर होमी मोदी के साथ ठहरे हुए थे—
“सर होमी समय के बेहद पाबंद थे और घड़ी के 8 बजाते ही उन्होंने अपने बेटे को प्रधानमंत्री के कमरे में जाकर उन्हें यह बताने के लिए कहा कि रात्रिभोज तैयार है। रूसी मोदी उनके कमरे की तरफ बढ़े। दरवाजा खोला तो जवाहरलाल और एडविना को आलिंगन की स्थिति में पाया। रूसी मोदी को देखते ही जवाहरलाल बुरी तरह से घबरा गए। रूसी ने जल्दी से दरवाजा बंद किया और बाहर चले गए।” (अकब/391)
के. नटवर सिंह ने लिखा— “मैंने एक बार नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी पंडित से पूछा कि क्या उनके भाई और एडविना के प्रेम-संबंधों की बात वास्तव में सच है? वे खुद एक देवी थीं और बातचीत में बिल्कुल स्पष्ट थीं। उन्होंने मुझसे कहा, ‘निश्चित रूप से है। और यह उनके लिए अच्छा है।’ (नट1)
एडविना के साथ नेहरू के पत्राचार में राष्ट्रीय महत्त्व के मामले भी शामिल होते थे, क्योंकि वे अपनी सोच को उनके साथ साझा करते थे। इसी वजह से वे महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक महत्त्व के हैं और सिर्फ व्यक्तिगत ही नहीं हैं, जिनका कोई महत्त्व न हो। इसके बावजूद उन्हें बिल्कुल राजवंश की निजी संपत्ति के रूप में देखा जाता है और उन्हें एक रहस्य बनाकर ही रखा गया है। वॉलपर्ट ने अपनी पुस्तक ‘नेहरू : ए ट्रिस्ट विद डेस्टिनी’ की प्रस्तावना में उल्लेख किया है कि उन्होंने पत्रों को हासिल करने का प्रयास किया, लेकिन असफल रहे।” (वॉल.2/8)
यह देखते हुए कि वे दोनों वयस्क थे—इसके व्यक्तिगत कोण पर किसी को कोई परेशानी नहीं है। लेकिन क्या ऐसे किसी संबंध के परिणामस्वरूप नेहरू या भारत के राजनीतिक कल्याण से समझौता हो सकता था? एडविना माउंटबेटन, जिनके नेहरू के साथ संबंध को लेकर बहुत कुछ लिखा जा चुका है, हो सकता है कि उन्होंने ही माउंटबेटन के कहने पर नेहरू को कश्मीर मसले को संयुक्त राष्ट्र में ले जाने को राजी किया हो! लेकिन निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता। नेहरू के पक्ष में रहनेवाले मौलाना आजाद ने अपनी आत्मकथा में इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया है कि कैसे नेहरू जैसा एक व्यक्ति माउंटबेटन के शिकंजे में था! वे नेहरू के दूसरों की बातों में आ जाने की कमजोरी का उल्लेख करते हैं और उन्हें भी लगता है कि कहीं लेडी माउंटबेटन का कारक जिम्मेदार तो नहीं है!” (आजाद/198)
कहा जाता है कि माउंटबेटन ने खुद इस बात को स्वीकार किया था कि उन्होंने नेहरू के मन में क्या चल रहा है, यह जानने के लिए और जब वे अपनी बात को मनवाने में नाकाम रहते तो उस बात को मनवाने के लिए अपनी पत्नी एडविना का इस्तेमाल किया। माउंटबेटन के जीवनी लेखक फिलिप जिगलर ने कहा कि माउंटबेटन ने अपनी पत्नी और नेहरू के बीच प्रेम-संबंधों को प्रोत्साहित किया—इस हद तक।