नेहरू फाइल्स - भूल-119 Rachel Abraham द्वारा कुछ भी में हिंदी पीडीएफ

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नेहरू फाइल्स - भूल-119

भूल-119 
सरदार पटेल की पुत्री मणिबेन के प्रति दुर्व्यवहार 

सरदार पटेल की इकलौती पुत्री मणिबेन ने 16 वर्ष की उम्र में ही खादी को अपना लिया था और अहमदाबाद के गांधी आश्रम में नियमित रूप से काम करने लगी थीं। सन् 1921 के बाद से सरदार पटेल द्वारा धारण किए गए अधिकांश वस्त्र मणिबेन के द्वारा काते गए सूत से बने होते थे। जब वे सिर्फ 17 वर्ष की थीं, तभी उन्होंने अपने पिता की सहमति से अपनी सारी सोने की चूड़ियाँ, कुंडल एवं सभी आभूषणों को कपड़े की एक पोटली में बाँधा और उन्हें स्वतंत्रता के उद्देश्य के लिए गांधी आश्रम को दान दे दिया। 

नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी के उलट, मणिबेन एक स्वतंत्रता सेनानी थीं और उन्होंने सक्रिय रूप से असहयोग आंदोलनों में भाग लिया था। सन् 1928 में बारदोली सत्याग्रह के दौरान उन्होंने कई अन्य महिलाओं के साथ शिविरों में मदद की। सन् 1930 में नमक सत्याग्रह और उसके बाद भी उनकी सक्रिय भूमिका के चलते उन्हें कई बार गिरफ्तार किया गया और जेल भेजा गया। जनवरी 1932 में उन्हें कस्तूरबा गांधी के साथ बारदोली में आयोजनों पर लगे प्रतिबंध को तोड़ने पर गिरफ्तार किया गया। वे मई 1932 में रिहा हुईं। लेकिन खेड़ा में प्रतिबंध को तोड़ने पर उन्हें जुलाई 1932 में एक बार फिर गिरफ्तार कर लिया गया और 15 महीने की सजा सुनाई गई, जिसे उन्होंने बेलगाम जेल में बिताया। दिसंबर 1938 में राजकोट के गाँवों में लोगों को भड़काने में उनकी भूमिका के लिए एक बार फिर उन्हें गिरफ्तार किया गया। गांधी उनके काम से बेहद प्रभावित थे। उन्होंने कहा था कि वे अपनी प्रतिभा दिखा रही हैं। उन्होंने उनके जैसी बेटी नहीं देखी थी। साबरमती जेल में मणिबेन के बंदी रहने के दौरान सरदार पटेल ने अपनी बेटी को लिखा— “दूसरी महिला कैदियों का ध्यान रखें, यह सुनिश्चित करें कि वे जब अंदर गई थीं, उससे अधिक बहादुर होकर बाहर आएँ।...” (आर.जी.2/एल-3423) 

मणिबेन को गांधी के ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ में भाग लेने के चलते दिसंबर 1940 में गिरफ्तार किया गया और बेलगाम जेल भेज दिया गया। मई 1941 में जेल से रिहा होने पर उन्होंने दोबारा गिरफ्तार होने का मन बनाया; लेकिन गांधी ने उनके बिगड़ते हुए स्वास्थ्य को देखते हुए उन्हें मना किया। बाद में सन् 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान मणिबेन को लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा। उन्हें अगस्त 1942 में कस्तूरबा गांधी के साथ गिरफ्तार करके पुणे के आगा खाँ पैलेस में हिरासत में रखा गया था, जहाँ गांधी को बंदी बनाया गया था। मणिबेन को मार्च 1944 में रिहा कर दिया गया। लेकिन उन्हें मई 1944 में गुजरात के बारदोली में दोबारा गिरफ्तार किया गया और सूरत जेल भेज दिया गया। फिर उन्हें सूरत से यरवदा जेल भेज दिया गया। 

नीचे दिया गया वाकया उन पर आधारित एक आँखों-देखा उदाहरण है, जिसका वर्णन श्री बलराज कृष्ण ने किया है (आई.एफ.जे./9) (बी.के./494-5)— 
सरदार पटेल ने स्वतंत्रता संग्राम में गांधी के साथ शामिल होने के बाद अपनी बेहद लाभकारी वकालत छोड़ दी। उन्होंने कोई संपत्ति या बचत भी नहीं रखी। आजादी के बाद भी वे और उनकी बेटी मणिबेन ने सादा जीवन जीना जारी रखा। बेहद गंभीर हृदयाघात के बाद जब पटेल देहरादून के सर्किट हाउस में स्वास्थ्य-लाभ ले रहे थे तो महावीर त्यागी उनसे मिलने गए। 

संयोग से, महावीर त्यागी (1899-1980) देहरादून के लोकप्रिय सांसद थे। वे ब्रिटिश भारतीय सेना में थे और 13 अप्रैल, 1919 को जलियाँवाला बाग नर-संहार के चलते इस्तीफा देने से पहले पर्शिया में तैनात थे। बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा में उनका कोर्ट-मार्शल किया गया और सारे वेतन-भत्ते जब्त करने के बाद उन्हें बलूचिस्तान से वापस भारत भेज दिया गया। भारत वापस लौटने पर त्यागी स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए। 

मणिबेन को फटी हुई खादी की एक साड़ी, जिस पर एक बड़ा सा पैबंद लगा हुआ था, पहने देखकर महावीर त्यागी ने मजाक में कहा, “मणिबेन, आप खुद को ‘महान्’ समझती हैं, क्योंकि आप एक ऐसे व्यक्ति की बेटी हैं, जिसने एक साल के भीतर ही एक पूरा ‘साम्राज्य’ (अनगिनत रियासतों का विलय करके) खड़ा कर दिया। ऐसा (साम्राज्य) तो राम या कृष्ण या फिर अशोक या अकबर या फिर ब्रिटिशों का भी नहीं था! एक ऐसे व्यक्ति, जो बड़े-बड़े राजाओं और महाराजाओं का ‘सरदार’ है, की बेटी के रूप में क्या आपको ऐसी साड़ी पहनने में शर्म नहीं आती? अगर आप मेरे शहर में निकल जाएँ तो लोग आपको भिखारी समझ लेंगे और आपके हाथों में कुछ पैसे रख देंगे।”

पटेल ने भी मजाक का हिस्सा बनते हुए कहा, “बाजार लोगों से भरा हुआ है। शाम तक तो उसके पास अच्छी-खासी रकम जमा हो जाएगी।” 

तब डॉ. सुशीला नैयर बीच में बोलीं, “त्यागी, मणिबेन अपना पूरा दिन सरदार साहब की देखभाल में बिताती हैं। इसके बाद वे अपनी डायरी लिखने और चरखा कातने के लिए समय निकालती हैं। उनके द्वारा काते गए सूत से ही सरदार साहब के कपड़े सिलते हैं, क्योंकि वे खादी भंडार से कपड़ा नहीं खरीदते। जब उनकी धोती और कुरते फट जाते हैं तो मणिबेन उनमें से अपने कपड़े सिल लेती हैं।” 

मणिबेन अविवाहित रहीं और सन् 1950 में अपने पिता की मृत्यु होने तक उनकी सेवा की। यहाँ पर विभिन्न स‍्रोतों के आधार पर मणिबेन से संबंधित एक चौंकानेवाला प्रकरण है, विशेषकर ‘आनंद डेरी’ के लिए प्रसिद्ध डॉ. वर्गीज कुरियन की आत्मकथा ‘आई टू हैड ए ड्रीम’ से— 
सरदार पटेल की पत्नी झाबेरबा की मृत्यु सन् 1909 में ही हो गई थी और उसके बाद उनकी बेटी मणिबेन ने ही उनकी देखभाल की थी, जिन्होंने अविवाहित रहने का फैसला किया था। मणिबेन एक समर्पित देशभक्त और एक समर्पित कांग्रेस कार्यकर्ता थीं, जिन्होंने देश को और स्वतंत्रता संग्राम को अपना सर्वस्व सौंप दिया। सरदार पटेल के पास कोई बैंक बैलेंस या संपत्ति नहीं थी। हालाँकि, वे एक सफल अधिवक्ता के रूप में अच्छा पैसा कमा रहे थे, लेकिन एक बार स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने के बाद उन्होंने सबकुछ त्याग दिया। सरदार गांधीवादी सादगी के उत्कृष्ट उदाहरण थे। वे कहते थे कि “बापू ने कहा है कि जो राजनीति में हैं, उन्हें संपत्ति नहीं रखनी चाहिए और मेरे पास एक भी नहीं है।” उस समय आदर्श ऐसे थे। अब इसकी तुलना आज के करोड़पति नेताओं से करिए। 

जब सरदार पटेल की मृत्यु हुई तो उन्होंने अपनी बेटी के लिए कुछ नहीं छोड़ा। सरदार पटेल के न रहने पर उन्हें घर खाली करना पड़ा। वे बिना पैसे और घर-बार के अकेले रहने को मजबूर थीं। सरदार ने अपनी मृत्यु के बाद नेहरू को एक बैग और एक पुस्‍तक देने का निर्देश दिया था। 

बंबई में सरदार पटेल के देहावसान के बाद मणिबेन दिल्ली पहुँचीं, नेहरू से मुलाकात का समय लिया और उनसे मिलीं। उन्होंने बैग और पुस्‍तक उनके हवाले कर दी। ऐसा लगता है कि वह पुस्‍तक एक बहीखाता था और उस बैग में 35 लाख रुपए थे। उन्हें सौंप देने के बाद उन्होंने इंतजार किया कि नेहरू सहानुभूति व्यक्त करेंगे और यह पूछेंगे कि वे आगे क्या करना चाहती हैं? वे कहाँ रहेंगी? उनकी आर्थिक स्थिति? क्या वे कुछ चाहती हैं और वे उनके लिए क्या कर सकते थे? लेकिन नेहरू ने जरा भी दिलचस्पी नहीं दिखाई और चुप रहे। मणिबेन कुछ समय बाद निराश होकर वहाँ से चली आईं। 

वे अपने चचेरे भाई के साथ रहने अहमदाबाद चली गईं। न तो नेहरू और न ही कांग्रेस पार्टी ने उनका हाल-चाल पता करने की जहमत उठाई। उस महिला, जिसने अपना सर्वस्व इस देश पर न्योछावर कर दिया और एक ऐसे व्यक्ति की बेटी, जिसने भारत को वह बनाया, जो आज है, के साथ ऐसा बरताव! अब इसकी तुलना नेहरू के राजवंश से करें, जिसने तमाम फायदे उठाए, जबकि दूसरों ने बलिदान दिए।