पहली रात की सुहागरात - भाग 8 Sujata Sood द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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पहली रात की सुहागरात - भाग 8


रात के सन्नाटे में हवेली की सीढ़ियाँ ठंडी पड़ चुकी थीं।
अदित्य अब भी वहीं खड़ा था, और ऊपर बालकनी में खड़ी रूहाना... उसकी तरफ देखकर मुस्करा रही थी, जैसे कोई खेल शुरू करने वाला हो।

“उस आँसू का रंग लाल क्यों था?”
अदित्य की आवाज़ अब सख़्त थी।

रूहाना ने बिना पलक झपकाए कहा —
“तुम्हें कभी गुलाब की जड़ से रिसता लाल रस देखा है? बस... वैसा ही था।”

“तुम कोई गुलाब नहीं हो,” अदित्य ने तड़पते हुए कहा।

“फिर क्या हूँ?” उसकी मुस्कान अब हल्के सवाल में बदल गई।

“पता नहीं...”
अदित्य ने गहरी साँस ली,
“पर जो भी हो... इंसान नहीं लगती।”

रूहाना एक पल को चुप रही, फिर आँखें बंद कीं।
“शायद ठीक कह रहे हो। लेकिन कभी-कभी इंसान दिखते हैं... पर होते नहीं। और कभी... जो इंसान नहीं दिखते, वो सबसे ज़्यादा इंसान होते हैं।”

अदित्य के पास जवाब नहीं था।
वो बस उसे देखता रहा —
उसके बाल, उसकी आँखे, उसकी बातों का जहर... और उनके पीछे छिपा कोई सच, जो अब भी धुंध में था।


अगली सुबह…

गांव में खबर फैल गई कि **भोला और करन** लापता हैं।
उनकी माँओं का रो-रोकर बुरा हाल था।

“हमने मना किया था, हवेली मत जाना...”
“अब हमारे बच्चों को कौन लौटाएगा?”

ठाकुर ने पंचायत बुलवाई, और इस बार पुजारी ने वही बात दोहराई —
“अब और इंतज़ार नहीं किया जा सकता… उस औरत को बाँधना होगा!”

गांव में *काली चादर वाले चार लोग* दिखे, जो पुजारी के कहने पर बाहर से बुलाए गए थे —
तांत्रिक विद्या में माहिर।
उनके साथ एक और औरत थी — बूढ़ी, घूंघट में, हाथों में जपमाला।

वो चुपचाप हवेली के बाहर बैठ गई और बुदबुदाने लगी —
“लौट आ… पहचान मुझे… मैं तुझे तेरे नाम से जानती हूँ…”

उधर हवेली में, रूहाना को बेचैनी हो रही थी।

आईना बार-बार धुंधला हो रहा था।
खिड़कियाँ अपने-आप खुल रही थीं।
मिट्टी की दीवारों से सरसराहटें उठ रही थीं — जैसे कोई पुरानी आत्मा उसे पुकार रही हो।

उसने बाल खोले, आँखें बंद कीं, और फिर वही सपना… वही बच्ची… और एक नाम…

“**शिवाया…**”

रूहाना की साँस अटक गई।

“क...कौन शिवाया?” उसने खुद से पूछा।

कमरे की दीवार से एक फुसफुसाहट आई —
**“तू ही… तू ही है वो… तू ही शिवाया थी…”**

रूहाना ने अपना सिर पकड़ लिया,
“नहीं! मैं रूहाना हूँ! बस रूहाना!”

लेकिन उसकी धड़कनें कह रही थीं कि कोई सच उसके खून में उतर चुका है।


बाहर…
वो बूढ़ी औरत अब भी माला फेरते हुए सिर्फ एक ही बात बोल रही थी —

**“शिवाया… तेरे खून का प्यासा तेरी ही रूह का हिस्सा है…”**

पुजारी ने पूछा, “तुम कौन हो?”

उसने आँखें खोलीं —
“जो उसके जन्म से पहले उसकी मौत का वक्त तय कर चुकी थी… और अब वक्त पास है।”

“क्या मतलब?” पुजारी चौंका।

“मतलब ये... कि उस हवेली में जो बैठी है — वो **ख़ुद एक पुरानी सज़ा है**, और उसकी उम्र जितनी भी हो... उसकी यादें उससे भी पुरानी हैं।”

“क्या आप जानती हैं कि वो क्या है?”

बूढ़ी औरत ने कहा —
“वो अब भी नहीं जानती कि वो क्या है।
पर जब उसे पता चलेगा...
तो तुम सब ये गाँव छोड़ चुके होगे, या… मिट चुके होगे।”

अंदर हवेली में…

रूहाना ने एक लाल संदूक खोला —
जिसमें रखा था एक पुराना, जला हुआ **दुल्हन का जोड़ा**
और उसके साथ एक पायल… टूटी हुई।

“ये किसका है…” वो बुदबुदाई।

और फिर उसे लगा… कमरे में कोई और भी है।

“कौन है?” वो मुड़ी।
कोई नहीं।

लेकिन नीचे से हल्की सी हँसी की आवाज़ आई —
**एक बच्ची की…**

अदित्य उसी वक़्त हवेली के बाहर आया था।
उसने देखा — बुज़ुर्ग तांत्रिका उसे एकटक घूर रही थी।

“क्या आप जानती हैं वो कौन है?”
उसने सीधा सवाल किया।

बूढ़ी औरत बोली —
“नहीं बेटा… मैं नहीं जानती। पर उसका अतीत जानता है… और वो अतीत बहुत गुस्से में है।”

हवेली के एक कोने में दीवार पर दरारें पड़ती हैं…
और उसी के भीतर किसी **बंद कमरे से आवाज़ आती है —**

**“शिवाया… तेरा वक़्त आ गया है…”**

कहानी में आगे क्या होगा जाने के लिए पढ़ते रहिए....

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