दिल ने जिसे चाहा - 7 R B Chavda द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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दिल ने जिसे चाहा - 7

अब रुशाली की ज़िंदगी एक तय रूटीन में ढल चुकी थी — हर सुबह उठकर अस्पताल जाना, मरीज़ों की देखभाल करना, और साथ ही उन गलियारों से होकर गुज़रना जहाँ से अक्सर मयूर सर का आना-जाना होता था।

अब तो उसे अस्पताल की दीवारों में भी मयूर सर की मौजूदगी महसूस होती थी। कई मरीज़ों ने मयूर सर की खूब तारीफ़ की थी —
"वो बहुत ही अच्छे डॉक्टर हैं...",
"उनके इलाज से ही आराम मिला...",
"इतने समझदार और विनम्र डॉक्टर कम ही होते हैं..."

रुशाली का दिल हर बार उनके नाम पर और तेज़ी से धड़कने लगता।
वो सोचती —
"कोई इंसान इतना संजीदा, इतना अच्छा और ऊपर से इतना सुंदर भी कैसे हो सकता है?"

"डॉक्टर हैं, अच्छा रैंक भी लाया है परीक्षा में, और ऊपर से इतने सीधे-सादे लगते हैं..."

जब उसने एक दिन गूगल पर उनका नाम खोजा, तो एक वीडियो मिला — मयूर सर का इंटरव्यू।
वो उस वीडियो को कई बार देख चुकी थी। हर बार बस एक ही बात मन में आती —
"कम से कम उनकी आवाज़ तो सुनने को मिल जाती है..."

उस वीडियो में जब मयूर सर मुस्कुराकर बोले थे —
"मरीज़ों का भरोसा ही मेरी सबसे बड़ी ताक़त है..."
तो जैसे रुशाली का दिल थम सा गया था।

हालाँकि वो उसी अस्पताल में काम कर रही थी, लेकिन अब तक मयूर सर से एक ही बार आमना-सामना हुआ था।
वो अब हर दिन यही सोचती —
"पता नहीं फिर कब मिलना होगा उनसे..."

और फिर एक दिन...

सुबह-सुबह अस्पताल के अधीक्षक (सुपरिंटेंडेंट) का बुलावा आया।
रुशाली थोड़ी घबरा गई —
"कुछ गलती तो नहीं हो गई मुझसे?"

जब वह उनके कमरे में पहुँची, तो उन्होंने मुस्कराते हुए एक लिफ़ाफ़ा उसकी ओर बढ़ाया।

रुशाली ने धीरे से वो पत्र खोला... और जैसे ही पढ़ना शुरू किया, उसकी आँखों में चमक आ गई।

"आपके कार्य की सराहना करते हुए, आपको एक वरिष्ठ डॉक्टर के सहायक के रूप में नियुक्त किया जाता है..."

और वह डॉक्टर कौन थे?

"डॉ. मयूर"

हाँ, वही... मयूर सर!
रुशाली के हाथ काँपने लगे।
दिल जैसे अचानक किसी और ही दुनिया में पहुँच गया हो।

उसने अधीक्षक के सामने अपनी ख़ुशी छुपा ली, लेकिन जैसे ही घर पहुँची —
वो खुशी से झूम उठी।
नाचने लगी, खिलखिलाने लगी और फिर आँखों से आँसू बहने लगे — खुशी के आँसू।

"रुशाली... अब तू मयूर सर के साथ काम करेगी... रोज़! उनके करीब होगी..."

वो खुद से बातें करने लगी —
"अब तुझे अच्छे से तैयार होकर जाना होगा, समझी?"
"और हाँ, अब तुझे उन्हें जानने का मौका भी मिलेगा..."

रुशाली खुद से ही मुस्कुराकर बातें करती रही, जैसे कोई छोटी बच्ची अपनी पसंदीदा गुड़िया से मिल रही हो।

उसे दो दिन बाद ही मयूर सर के साथ काम शुरू करना था।
इन दो दिनों में उसने सब सोच लिया —
क्या पहनना है, कैसे बात करनी है, कैसी मुस्कान रखनी है... सब कुछ।

फिर आया वो दिन — पहला दिन।

रुशाली को ज़्यादा संवरना आता नहीं था, लेकिन आज उसने अपने सबसे अच्छे कपड़े निकाले। बालों को हल्के से सलीके में बाँधा, और चेहरे पर हल्की मुस्कान ली।

लेकिन मन में एक डर था...
"कहीं मेरा शर्मीला स्वभाव मयूर सर को पसंद ना आए तो?"
"अगर मैंने कुछ ग़लत बोल दिया तो?"
"अगर मेरे मन की बात उनके सामने आ गई तो क्या होगा?"

हर सवाल उसके दिल की धड़कनों को और तेज़ कर रहा था।
फिर भी, उम्मीदें उससे बड़ी थीं।

वो अस्पताल पहुँची। हाथ में फ़ाइल थी, चेहरे पर हल्की घबराहट... लेकिन दिल में एक नाम था — मयूर सर।

अब उसे सीधा मयूर सर के कक्ष में जाना था।
हर कदम जैसे एक नए एहसास से भरा हुआ था।

जैसे ही वह उनके कक्ष के दरवाज़े पर पहुँची...

दरवाज़े पर रुशाली का हाथ बढ़ा...

और फिर — एक शायरी, जो रुशाली के दिल से निकली ..


 “ख्वाबों में जिसे रोज़ देखा,
आज सामने उसका दर खुला है,
दिल काँप रहा है, पर मुस्कुराना भी ज़रूरी है।
ये फासला जो कल तलक था अजनबी,
अब हर रोज़ का हिस्सा बनने जा रहा है।”



रुशाली के दिल में हज़ारों सवाल हैं, लेकिन एक उम्मीद भी —
कि शायद ये क़रीबियाँ कुछ कह जाएं,
शायद वो पहली मुलाक़ात, कुछ बदल जाए।
अब सब कुछ उस पल पर टिका है,
जब दरवाज़ा खुलेगा और मयूर सर सामने होंगे...


---

क्या होगा जब रुशाली का सामना होगा मयूर सर से?
पहले दिन की मुलाक़ात कैसी रहेगी?
क्या मयूर सर को कुछ एहसास होगा रुशाली की नज़रों में छुपे जज़्बात का?

जानिए अगली कड़ी में...

…जारी है…