मेरा रक्षक - भाग 9 ekshayra द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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मेरा रक्षक - भाग 9

9. दर्द 

 

थोड़ी देर बाद मीरा को एहसास हुआ कि रणविजय उसे गले लगकर ही सो चुका है। पर रणविजय ने तो बोला था उसे नींद नहीं आती।

 
मीरा ने रणविजय को आराम से सुलाने की कोशिश की पर रणविजय ने मीरा को बहुत जोर से पकड़ रखा था जैसे एक बच्चा अपनी मां का पल्लू डर की वजह से पकड़ कर लेटा है।
 
मीरा ने Ms. Rosy और जॉन को बुलाने के लिए दरवाजे के बाहर देखा पर दोनों वहां से जा चुके थे। अब मीरा क्या करे?
 
 
रणविजय मीरा को गले लगाकर सो गया था।
लेकिन ये कोई आम गले लगना नहीं था — उसमें एक कशिश थी, एक टूटापन था, एक ऐसा दर्द था जो शायद शब्दों में कह पाना उसके बस में नहीं था।
 
मीरा चुपचाप बैठी रही, रणविजय के शरीर की गर्मी अपने सीने पर महसूस करती रही। रणविजय का चेहरा अब भी हल्का-सा डरा हुआ था, लेकिन उसकी सांसें थोड़ी शांत हो चुकी थीं। उस वक़्त मीरा को ऐसा महसूस हुआ जैसे वो किसी मासूम से बच्चे को गोद में लेकर बैठी हो, जो बस सुकून की तलाश में था।
 
"ये वही रणविजय है?" मीरा ने अपने दिल में सवाल उठाया।
वही रणविजय, जिसके नाम से शहर कांपता है। जो एक इशारे में खून कर दे, जिसकी आंखों में अक्सर आग दिखती है।
 
लेकिन अब… उसकी आंखें बंद थीं और चेहरा उसके कंधे से चिपका हुआ। उसकी गिरफ्त में कोई हथियार नहीं, सिर्फ मीरा की कमर थी, जिसे वो ऐसे पकड़े हुए था जैसे अगर छोड़ दिया… तो सब बिखर जाएगा।
 
मीरा की उंगलियां अनजाने में ही उसके बालों में चलने लगीं।
हर स्ट्रैंड के साथ जैसे वो उसके दुख को सुलझा रही हो।
 
 
"कितना कुछ छिपा है इस इंसान के अंदर…" वो सोचती रही।
 
 
कमरे में हल्की नीली रोशनी जल रही थी। खिड़की से आती हवा के झोंके उसके बालों को चेहरे पर उड़ा रहे थे, लेकिन वो हिली तक नहीं। रणविजय की नींद अब गहरी होती जा रही थी। वो उसकी छाती पर सिर रखकर सो गया था, जैसे सालों की थकान एक ही रात में उतार देना चाहता हो।
 
 
मीरा की सांसें तेज़ चल रही थीं। दिल अजीब सा घबराने लगा था। एक अनजानी हलचल… जो उसने कभी महसूस नहीं की थी।
 
 
"क्या हो रहा है ये?" उसने खुद से पूछा।
लेकिन जवाब किसी के पास नहीं था। शायद उस रात चांद भी सिर्फ देख रहा था… चुपचाप।
 
 
"मीरा..." रणविजय ने नींद में ही उसका नाम बुदबुदाया।
 
 
मीरा की आंखें फटी की फटी रह गईं। दिल एक पल को जैसे रुक गया।
वो कुछ कह नहीं सकी। बस अपने हाथ को उसकी पीठ पर रखकर हल्के से सहलाने लगी।
 
 
 
थोड़ी देर बाद रणविजय की पकड़ थोड़ी ढीली हुई। शायद वो नींद के गहरे समुंदर में उतर चुका था।
मीरा धीरे-से उसे बिस्तर पर लिटाने लगी… लेकिन जैसे ही वो थोड़ा हटी, रणविजय की भौंहें सिकुड़ गईं।
वो डर गया था फिर से। रणविजय ने फिर से मीरा की कमर  पर अपनी पकड़ मज़बूत कर ली। 
 
 
 
"मैं यहीं हूँ…" मीरा ने उसके कान में फुसफुसाया और उसका हाथ पकड़ लिया।
रणविजय की भौंहें फिर से शांत हो गईं। चेहरा सुकून से भर गया।
 
 
मीरा वहीं बैठ गई, हाथ उसके हाथ में थामे।
 
 
"कौन कहता है ये दरिंदा है?" वो सोचती रही।
 
 
"ये तो टूटा हुआ इंसान है… और इंसानों को मरहम की जरूरत होती है, बंदूक की नहीं।"