रुबिका के दायरे - भाग 2 Pradeep Shrivastava द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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रुबिका के दायरे - भाग 2

भाग -2

महबूबा ने रूबिका पर जब बहुत ज़्यादा दबाव डाला तो उसने मन ही मन सोचा यह तो बिल्कुल गले ही पड़ गई है। अपनी बात पूरी सुनाए बिना मानेगी नहीं। चलो सुन ही लेती हूँ। उसने महबूबा से कहा, “ठीक है, इतना कह रही हो तो बताओ, लेकिन इस तरह बात-बात में मज़हब का सहारा नहीं लिया करो। इतनी पढ़ी-लिखी तो हूँ ही कि कौन-सी बात मज़हब की, क़ौम की है, कौन-सी नहीं, यह अच्छी तरह समझती हूँ।”

यह सुनते ही महबूबा ने कहा, “अल्लाह का शुक्र है कि तुम बात सुनने को तैयार हुई। देखो अभी बीते दिनों तुमने टीवी चैनलों, सोशल मीडिया पर तो यह देख ही लिया कि हल्द्वानी के बनभूलपुरा, गफूर, इंदिरा नगर, और उसके आसपास की सभी बस्तियों के लोगों ने मिलकर बस्ती को ख़ाली कराने के सरकार के आदेश के विरुद्ध बड़ा आंदोलन किया। 

“क़रीब चालीस से पचास हज़ार लोगों ने आंदोलन में शिरकत की। सरकार कहती है कि वह पूरी बस्ती ग़ैर-क़ानूनी है, सरकार की ज़मीन पर है। और अवैध बस्ती को अब वहाँ से हटना पड़ेगा। अब तुम ही बताओ बस्ती के क़रीब पचास हज़ार लोग कहाँ जाएँगे? 

“वो सब सालों साल से वहाँ रहते चले आ रहे हैं, अब वह अपने घर, काम-धंधा छोड़ कर कैसे जा सकते हैं। इसलिए हम सबक़ो सरकार को रोकने के लिए जल्दी से जल्दी एक और शाहीन बाग़ खड़ा करना ही पड़ेग।”

महबूबा की बातों से रुबिका खीझ उठी। उसने कहा, “ओफ़्फ़ो कब-तक शाहीन बाग़ खड़ा करते रहेंगे, किस-किस बात के लिए शाहीन बाग़ खड़ा करेंगे, अरे जैसे बाक़ी लोग देश में रह रहे हैं, हम-लोग भी उसी तरह शान्ति से क्यों नहीं रह पाते? दुनिया में हम-लोग उपद्रवियों के रूप में क्यों बदनाम होते जा रहे हैं, कभी यह भी सोचो।”

रूबिका की यह बात महबूबा को काँटे-सी चुभ गई। वह भड़कती हुई बोली, “रुबिका तुम यह क्या काफ़िरों जैसी बातें कर रही हो? हम पर ज़ुल्म पर ज़ुल्म किए जा रहे हैं, और हम बोलें भी न। तुम उल्टा क़ौम को ही कटघरे में खड़ा कर रही हो। यह तुमको इतने ही दिनों में हो क्या गया है?” 

“मुझे कुछ नहीं हुआ है। न ही मैं क़ौम या किसी को कटघरे में खड़ा करने की सोचती हूँ, और मैं अच्छी तरह जानती हूँ कि पूरा वाक़या क्या है . . .” 

रूबिका भी तैश में आ गई। उसने कहा, “जब उन्नीस सौ उनसठ के नोटिफ़िकेशन के हिसाब से ज़मीन रेलवे की है तो वह तो उसे लेकर ही रहेगा। लोगों को वह ज़मीन आज नहीं तो कल ख़ाली करनी ही पड़ेगी। यदि हम वाक़ई अपनी क़ौम की भलाई चाहते हैं तो हमें सरकार से यह माँग करनी चाहिए कि वहाँ के लोगों को कहीं और बसने की जगह दे दे। और साथ ही पर्याप्त समय भी कि लोग वहाँ पर जाकर बस सकें। 

“नियम-क़ानून के हिसाब से भी सुप्रीम कोर्ट में सरकार जीतेगी ही जीतेगी। ऐसे में एक और शाहीन बाग़ खड़ा करने की कोशिश में बेवजह का तमाशा खड़ा करके हम वहाँ के लोगों के लिए और बड़ी मुसीबत खड़ी करेंगे। 

“वह लोग इस धोखे में आ जाएँगे कि ऐसे शाहीन बाग़़ खड़ा होने से वह ग़लत होने के बावजूद क़ानून के शिकंजे से बच जाएँगे, जब कि बात इसके एकदम उल्टी है। जब हक़ीक़त से उनका सामना होगा, उन्हें वहाँ से छोड़कर जाना ही होगा तो सोचो उनके ऊपर क्या बीतेगी। 

“इस तरह तो हम उन्हें और भी ज़्यादा नुक़्सान पहुँचाएँगे। एक तरह से उन पर दो-तरफ़ा मार पड़ेगी। इसलिए मैं कहती हूँ कि अगर तुम लोग सच में उन लोगों की मदद करना चाहते हो तो सरकार से केवल इतनी माँग करो कि उन्हें कहीं और बसने देने के लिए ज़मीन दे दे, मकान बनाने के लिए आर्थिक मदद भी कर दे। सरकार अगर इतना कर देगी तो उनके लिए इससे ज़्यादा बड़ी और कोई मदद नहीं हो सकती, समझी।”

रुबिका की बातों से महबूबा एकदम हैरान होती हुई बोली, “तुम कैसी बातें कर रही हो, वह लोग वहाँ से हटे ही क्यों? जानती हो वह लोग देश की आज़ादी के पहले से वहाँ रह रहे हैं। आज जो रेलवे विभाग उन्नीस सौ उनसठ के नोटिफ़िकेशन के आधार पर कह रहा है कि यह ज़मीन उसकी है, उसी रेलवे ने उन्नीस सौ चालीस में उन लोगों को लीज़ पर दी थी। 

“और जब इतने बरसों से वह सभी लोग हाउस-टैक्स, बिजली, पानी का बिल देते आ रहे हैं, ख़ुद सरकार ने ही वहाँ डेवलपमेंट के तमाम काम करवाए हैं तो फिर वह बस्ती अवैध कैसे हो गई। सीधी-सी बात तुम समझती क्यों नहीं कि सीधे-सीधे क़ौम पर ज़ुल्म किया जा रहा है।”

महबूबा की बात, आवाज़ में साफ़ झलकते क्रोध को समझते हुए रुबिका ने कहा, “महबूबा देखो मैं बेवजह की बहस में नहीं पड़ना चाहती। इतने नियम-क़ानून हैं, फिर भी सही क्या है, ग़लत क्या है, यह सब मेरी तरह तुम भी अच्छी तरह जानती हो, फिर भी ग़लत बात करती जा रही हो। 

“तुमसे प्रोफ़ेसर सईद या जो लोग भी एक और शाहीन बाग़ खड़ा करने की बात कर रहे हैं, क्या उन्हें यह नहीं मालूम कि जब रेलवे ने उन्हें जगह लीज़ पर दी थी तब अँग्रेज़ों की सरकार थी, उनका क़ानून था। देश उनके हाथों में था। 

“उन्नीस सौ सैंतालीस के बाद देश आज़ाद हो गया। इसके साथ ही अँग्रेज़ों का क़ानून, उनके नियम उनके साथ चले गए। आज़ादी के बाद देश ने अपने हिसाब से नियम-क़ानून बनाए। रेलवे भी उन्हीं में से एक है। 

“लीज़ को सरकार किसी भी समय ख़त्म भी कर सकती है। टैक्स देने का मतलब यह नहीं है कि मालिक हो गए। बिजली, पानी का बिल तो जो लोग किराए पर रहते हैं, वह भी देते हैं, तो क्या वो मालिक बन जाएँगे? 

“और नियम तो इसी देश में यह भी है न कि सरकार किसी भी तरह के विकास कार्य के लिए किसी भी ज़मीन, प्रॉपर्टी का अधिग्रहण कर सकती है। काशी और अयोध्या में देख नहीं रही हो, सैकड़ों साल पुराने मकान, मंदिर आदि जो कुछ भी वहाँ के विकास में आड़े आए उनका सरकार ने अधिग्रहण कर लिया, लोगों को पैसा दे कर कहीं और बसा दिया। 

“सभी ख़ुशी-ख़ुशी चले भी गए, एक बार कहने को भी लड़ाई-झगड़ा फ़साद या आंदोलन-फान्दोलन किसी ने खड़ा किया? क्योंकि इन लोगों ने क़ानून के हिसाब से जो भी हो रहा था उसे मुआवज़ा लेकर होने दिया। 

“ऐसा ही कोई रास्ता यहाँ क्यों नहीं निकाला जाता? मैं साफ़-साफ़ कहती हूँ कि लोग निकालना चाहेंगे तो बड़ी आसानी से निकल आएगा, जैसे अयोध्या, काशी में निकला। 

“मैं बिना संकोच के यह कहती हूँ कि यह हो तभी पाएगा जब सईद जैसे लोग एक और शाहीन बाग़ खड़ा करने से बाज़ आएँगे। 

“जब उस दिन जुलूस में मैंने केवल महिलाओं को कैंडिल लिए हुए देखा तो मुझे तुरंत ही शाहीन बाग़ याद आ गया। ऐसे ही तमाशा वहाँ भी शुरू हुआ था। 

“सईद जैसे लोगों ने औरतों को आगे कर दिया, ख़ुद पीछे खड़े होकर अपने-अपने स्वार्थों की दुकान चमकाते रहे। शाहीन बाग़ में तो नहीं लेकिन यहाँ हल्द्वानी के जुलूस को देखकर मुझे बार-बार हरि सिंह नलवा और सलवार कुर्ता पहने मुस्लिम मर्द याद आते रहे। मैं यही सोचती रही कि मुस्लिम मर्दों की ऐसी हरकतों के कारण ही हरि सिंह ने उन्हें सलवार कुर्ता पहनाया होगा।”

यह सुनते ही महबूबा ने अजीब सा मुँह बनाते हुए कहा, “हरि सिंह नलवा, यह तुम किस काफ़िर का नाम ले रही हो, हल्द्वानी, मुस्लिम मर्दों के सलवार कुर्ता से एक काफ़िर का क्या लेना देना?” 

महबूबा की आवाज़ में तल्ख़ी का आभास कर रुबिका कुछ देर उसे देखती रही, उसने मन ही मन सोचा कि क़ौम पर ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के नाम पर झूठी साज़िशों का हिस्सा नहीं बन रहे होते, अपनी पढ़ाई ठीक से कर रहे होते तो यह सब पता होता। उसे चुप देखकर महबूबा ने कहा, “तुम कुछ बोलती क्यों नहीं, यह काफ़िर कौन है, जिसने तुम्हारे दिमाग़ में क़ौम के ख़िलाफ़ ज़हर भर दिया है।”

महबूबा की सख़्त लहजे में कही गई यह बात रुबिका को चुभ गई, “उसने भी उसी लहजे में कहा, “तुम बार-बार फ़ालतू की बातें नहीं करो तो अच्छा है। क़ौम के बारे में जितना तुम सोचती हो, उससे कहीं ज़्यादा मैं सोचती हूँ, उसकी भलाई कैसे हो सकती है यह तुमसे ज़्यादा ही जानती हूँ।”

रूबिका की इस बात से रूम का माहौल और गर्मा गया। तनावपूर्ण हो गया। महबूबा ने तीखे लहजे में कहा, “जब जानती हो, तो क़ौम पर इतनी बड़ी आफ़त आने के बाद भी उसकी मदद के लिए आगे क्यों नहीं आ रही हो? यह केवल हल्द्वानी की ही बात नहीं है, हम शाहीन बाग़ खड़ा नहीं करते रहेंगे तो यह पूरे देश में ऐसे ही चलने लगेगा। रोज़ ही कोई ना कोई बस्ती ग़ैर-क़ानूनी होती चली जाएगी। 

“इसलिए हमें शुरू में ही अपना विरोध इतना तेज़ और भयानक करना चाहिए कि कोई भी सरकार हमारी क़ौम की किसी भी बस्ती को ग़ैर-क़ानूनी घोषित कर ख़ाली कराने से पहले हज़ार बार सोचे। अगर हम चुप रहे तो यह सिलसिला रुकने वाला नहीं। 

“इसीलिए हमेशा की तरह क़ौम की फ़िक्र करने वाला हर कोई, मैं, बहुत फ़िक्रमंद हैं और क़ौम के एक-एक आदमी को जोड़ रहे हैं। ऐसे माहौल में किसी हरि सिंह नलवा-अलवा की बात करना भी किसी कुफ़्र से कम नहीं है।”