बारिश पर Your Dreams द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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बारिश पर

बारिश पर
आफिस आने - जाने के लिए मेट्रो पकड़ना और आराम से बैठकर या तो ऊंघते हुए या कुछ पढ़ते हुए या पूरे रास्ते भीड़ को कोसते हुए खड़े होकर सफर करना । किसी तरह से शाम को घर पहुंचकर खाना और सो जाना ... भागम - भाग • टाइम से नौकरी की जिम्मेवारी निभाने पहुच जाना और के सिवाय और कुछ नहीं था उसकी जिंदगी में मां लड़की ढूंढ रही थीं कि अब शादी हो जानी चाहिए । वह क्या चाहता है , उससे न तो कभी पूछा गया , न कभी उसने बताया ; या शायद उसे खुद ही नहीं पता था कि वह क्या चाहता है । भागते - दौड़ते , शोरगुल और न समझ आने वाली बेचैनी के साथ जी रहा था । दरवाजे बंद होने की घोषणा हुई । वह दरवाजे के पास ही खड़ा था । सीढ़ियों से भागती , सांसों को उखड़ने से बचाने का प्रयास करती , वह दौड़ी चली आ रही थी दरवाजा बंद होने ही वाला था । उसने अपना बैग दरवाजे . के बीच में फंसा दिया । दरवाजा खुल गया , वह लपकती हुई अंदर घुस गई । जीन्स के ऊपर पिंक कलर का शॉर्ट कुर्ता पहना था । कंधे पर मल्टीकलर स्टोल झूल रहा था सांवली रंगत में चांदनी - सी चमक रही थी । कंधे तक कटे बाल , कानों में झूलते ईयररिंग्स और बड़ा - सा लैदर बैग । देर तक वह उखड़ी सांसों को संभालती रही । भीड़ इतनी थी कि सटकर खड़े रहने के सिवाय और कोई विकल्प नहीं था । वह चाह रहा था कि खुद को थोड़ा समेट ले , पर स्पर्श सुकून दे रहा था । देख रही थी वह उसकी तरफ । आंखों ही आंखों में उसने धन्यवाद कहा । उन आंखों में सिवाय आभार के उसके लिए कुछ भी तो नहीं था , पर वह बह गया । क्या वह पल भर का उसका देखना , उसकी उन चाहतों को आकार दे सकता है जिसके बारे में आज तक उसे खुद ही पता न था । स्टेशन पर उतर वह भीड़ में न जाने कहा गुम हो गई । रास्ते एक हों तो मुलाकातों में रवानगी आते देर नहीं लगती । बातचीत का सिलसिला मेट्रो के अलावा व्हाट्सएप चैट पर आ गया । पहले इधर - उधर की बातों से संवाद का सिलसिला शुरू हुआ , फिर फोन पर हंसी की फुलझड़ियों के बीच रोजमरों की बातें शेयर की जाने लगीं । शाम को कॉफी पीने चलें ? " उसने पूछा था । ग्रीन पेस्टल कलर का खादी का कुर्ता पहना हुआ था उसने । कानों में ऑक्सीडाइज्ड बालियां झूल रही थीं । बिल्कुल सादा रूप था पर आंखों की कशिश बहा ले जाने वाली थी हमेशा की तरह । कॉफी के हर घूंट के साथ वह चीज स्टिक को परियों जादुई छड़ी की तरह घुमाती किस्से सुना रही थी । वह वशीभूत - सा बैठा सुन रहा था । उसकी दुनिया अजनबी नहीं रही थी , वह बिना दस्तक दिए , आने की अनुमति मांगे बिना ही उसके मन पर अपना कब्जा जमा चुकी थी " हम यूं ही कभी - कभी मिल सकते हैं क्या ? " पूछते समय अपने स्वर में लरजते कंपन को महसूस किया उसने । वह उसे किसी भी हाल में खोना नहीं चाहता था , क्योंकि अब उसे पता था कि वह क्या चाहता है । वह मुस्कराई , " हां , मिल सकते हैं । वैसे मेट्रो में तो अक्सर मुलाकात हो ही जाती है , फिर क्या कॉफी पीने के लिए मिलना जरूरी है ? " उसकी आंखों में शरारत थी । " चलो मिल लेंगे यूं भी कभी - कभी , पर नो कमिटमेंट । दोस्ती जैसा अहसास पंख दे , उड़ान दे , यही चाहती हूं । अगर ऐसा कर सको तो तुम भी उड़ सकते हो मेरे साथ । " कैफे से बाहर आए तो बारिश की बूंदें भिगोने लगीं । उसने हथेलियां फैला दीं और बोली , " देव बाबू , भीगेंगे मेरे साथ इस खुशनुमा बारिश में ? " वह तो कब से भीग रहा था उसकी आंखों की मदहोशी में । उसने भी अपनी हथेलियां फैला दीं । बारिश की बूंदें मोती की तरह फिसलने लगीं । सच बारिश भी क्या कभी इतनी खुशनुमा होती है